दान पर पहरा या व्यवस्था की नाकामी, दर्शनार्थियों को कष्ट दे रहा काफी
अयोध्या में नई व्यवस्था ने खड़े किए कई असहज सवाल

अयोध्या में श्रीराम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। देश-विदेश से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान अर्पित करते हैं। लेकिन अब मंदिर में दान व्यवस्था को लेकर लागू किए गए नए “नो पॉकेट ड्रेस कोड” ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं दिया जा सकता।
यदि दान व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह थी, तो अचानक इतनी कठोर व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं है कि पहले की व्यवस्था में ऐसी कमियां थीं जिन्हें समय रहते दूर नहीं किया गया? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
जनता का दान किसी संस्था या सरकार का निजी धन नहीं होता। यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की पूंजी होती है। उस विश्वास की रक्षा करना केवल धार्मिक ट्रस्ट ही नहीं बल्कि शासन और प्रशासन की भी नैतिक जिम्मेदारी है। यदि व्यवस्था में ऐसी आशंकाएं पैदा होती हैं कि कर्मचारियों की वेशभूषा तक बदलनी पड़ जाए, तो स्वाभाविक रूप से जनता पूछेगी कि इतने समय तक निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था क्या कर रही थी?

सरकार और संबंधित प्रबंधन का यह कहना उचित हो सकता है कि नई व्यवस्था केवल सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लागू की गई है। लेकिन यदि ऐसा है तो जनता को यह भी बताया जाना चाहिए कि पहले कौन-कौन सी कमियां चिन्हित हुई थीं, उनके कारण क्या थे और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए कौन-कौन से स्थायी कदम उठाए जा रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश में अक्सर किसी व्यवस्था में बदलाव तब होता है जब विवाद सामने आ जाता है। सवाल यह है कि क्या शासन केवल संकट आने के बाद सक्रिय होगा? क्या पहले से ऐसी मजबूत निगरानी व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकती थी जिससे इस प्रकार के कठोर कदमों की आवश्यकता ही न पड़ती?
यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश में धार्मिक संस्थाओं में होने वाले दान, उसके प्रबंधन और पारदर्शिता का प्रश्न भी है। जब करोड़ों रुपये का दान प्रतिदिन आता है, तब उसकी गिनती, सुरक्षा, लेखा परीक्षण और सार्वजनिक जानकारी की व्यवस्था भी उसी स्तर की होनी चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनके द्वारा दिया गया धन किस प्रकार सुरक्षित रखा जा रहा है और उसका उपयोग किन कार्यों में किया जा रहा है।
सरकारें अक्सर डिजिटल पारदर्शिता, सुशासन और जवाबदेही की बात करती हैं। यदि ऐसा है तो फिर धार्मिक संस्थानों के दान प्रबंधन में भी आधुनिक तकनीक, स्वतंत्र लेखा परीक्षण, नियमित सार्वजनिक रिपोर्ट और मजबूत निगरानी व्यवस्था को अनिवार्य क्यों नहीं बनाया जाता? केवल कर्मचारियों के कपड़ों में बदलाव कर देना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर दिया है। लेकिन जनता के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कौन राजनीतिक लाभ उठा रहा है, बल्कि यह है कि भविष्य में श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा कैसे होगी। राजनीतिक बयानबाजी से अधिक जरूरी है स्पष्ट जवाबदेही।
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी मजबूत करना है जिनसे करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं। यदि ऐसी संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगते हैं तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक भी होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित प्रबंधन और सरकार पूरे मामले पर विस्तृत और सार्वजनिक स्पष्टीकरण दें। यदि कोई अनियमितता नहीं हुई है तो तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि व्यवस्था में कमियां थीं तो यह बताया जाए कि उनके लिए कौन जिम्मेदार था और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए कौन-कौन से सुधार लागू किए जा रहे हैं। केवल नए नियम लागू कर देना पर्याप्त नहीं है; जनता को विश्वास दिलाना उससे कहीं अधिक आवश्यक है।
आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब उसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी समान रूप से मजबूत होगी। श्रद्धालुओं का दान विश्वास का प्रतीक है, और उस विश्वास पर उठने वाला हर प्रश्न शासन और प्रबंधन—दोनों से जवाब मांगता है। लोकतंत्र में जनता का यही अधिकार है कि वह पूछे—यदि सब कुछ ठीक था तो फिर व्यवस्था बदलने की नौबत क्यों आई, और यदि व्यवस्था ठीक नहीं थी तो इसकी जिम्मेदारी कौन स्वीकार करेगा?




