मोदी के संरक्षण में 15 लाख करोड़ का घोटाला, देश का निकाल दिया दिवाला
भारत का सबसे बड़ा घोटाला- दो-टके की कंपनी ने 4 साल में अपनी आय 15 लाख करोड़ दिखाकर किया घोटाला, अब सरकार की नींद टूटी उछला मामला

- जिस स्विस कंपनी की आड़ में सारा खेल हुआ, उसकी आय कुछ सौ करोड़
- सोने की रिफाइनिंग करने वाली 3000 करोड़ की कंपनी विदेशों से पैसा लाती रही और एजेंसियां सोती रहीं
- सारा खेल 2021 से 2025 तक चला
- 2021 में ही दीवालिया हो चुकी थी कंपनी, फिर भी एलआईसी ने शेयर खरीदे
- अब कंपनी के शेयर जमीन पर, केनरा बैंक के भी अरबों डूबे
मुंबई/ नई दिल्ली। आप कहेंगे कि केवल भारत में ही ऐसा हो सकता है, क्योंकि देश का सिस्टम चरमरा चुका है। ताजा मामला राजेश एक्सपोर्ट नाम की एक ज्वेलर्स कंपनी का है, जो बीते 4 साल में 15.15 लाख करोड़ रुपए का घोटाला कर चुका है। इस पूरे समय सेबी और डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस जैसी संस्थाएं सोती रहीं। सभी को सब-कुछ पता था और बिना सरकारी दबाव के यह हो नहीं सकता कि कोई कंपनी न केवल घोटाला करके फॉर्च्यून 500 कंपनी में सातवें पायदान पर जगह बना ले, बल्कि एलआईसी जैसी संस्था भी उसके शेयरों में 300 करोड़ का निवेश कर दे।
अब जाकर सेबी की नींद टूटी है तो भारत में बवाल मच गया है। पूरे 15 लाख करोड़ का घोटाला सामने आया है। कंपनी की औकात 3000 करोड़ की भी नहीं है, लेकिन न केवल उसने इन 4 साल में बैंकों से लोन लिया, बल्कि समूचे सिस्टम को चूना लगाकर अपनी कंपनी का विस्तार किया। अब सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट को शेयर मार्केट से बैन कर दिया है। कंपनी पर सोने के प्रसंस्करण के नाम पर देश के बाहर सोना बेचने का आरोप लगा है। सेबी मामले की जांच कर रही है तो कंपनी के मालिक राजेश मेहता खुद को जस्टिफाई करने में जुटे हैं।

हंगामा है इसलिए बरपा
1. राजेश एक्सपोर्ट का दावा है कि उसकी 99% कमाई स्विटजरलैंड की सहायक कंपनी वालकांबी एसए से हो रही है। लेकिन राजेश एक्सपोर्ट को वालकांबी एसए की वित्तीय स्थिति की जानकारी नहीं है। इस कंपनी की वित्तीय स्थिति के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध भी नहीं है।
2. राजेश एक्सपोर्ट ने अपने ऑडिट बुक में भी वालकांबी एसए के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।
3. अब सेबी का दावा है कि राजेश एक्सपोर्ट ने साल 2020-21 से 20254-25 के दौरान 4 साल में 15.15 लाख करोड़ रुपए का घोटाला किया।
4. कंपनी ने वालकांबी एसए को 114.87 बिलियन का सोना औी हीरा बेचा और 114.87 बिलियन का सोना और हीरा खरीदा। कंपनी का यह भी दावा है कि उसने वालकांबी एसए के शेयर खरीदे, लेकिन शेयर धारकों ने शेयर बेचने से इनकार कर दिया है। सेबी का दावा है कि रोजश मेहता ने बिना कोई व्यापार किए ही अपने खाते में इतनी बड़ी रकम की आय दिखा दी।
5. सेबी यह भी दावा कर रही है कि राजेश एक्सपोर्ट कंपनी के खाते से 3.39 अरब रुपए की रकम राजेश मेहता, यानी मालिक के खाते में ट्रांसफर की गई, जिसमें वायदे के कारोबार से मिली रकम भी शामिल है। इसके लिए बोर्ड और ऑडिट कमेटी की मंजूरी भी नहीं ली गई। इस तरह कई किस्तों में 9.2 अरब रुपए की रकम ट्रांसफर हुई।
6. सेबी के अनुमान के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम से कंपनी के शेयर धारकों को 127.26 अरब रुपए का झटका लगा है।

फंस गया एलआईसी का पैसा
15 लाख करोड़ का घोटाला सामने आने के बाद रोजश एक्सपोर्ट के शेयरों में गुरुवार को भारी गिरावट आई। घोटाले का राज खुलने से पहले कंपनी के जो शेयर 800 रुपए में बिक रहे थे, वे 100 रुपए से भी नीचे आ गए। भारतीय जीवन बीमा निगम ने इस दागी कंपनी में भारी-भरकम रकम लगा रखी है और उसकी हिस्सेदारी 10 फीसदी से ज्यादा है। देश के सबसे बड़े घरेलू संस्थागत निवेशक भारतीय जीवन बीमा निगम की मार्च 2026 तिमाही के आंकड़ों के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स में 10। 80 फीसदी की बड़ी हिस्सेदारी है। रिकॉर्ड बताते हैं कि भारतीय जीवन बीमा निगम सितंबर 2023 से इस कंपनी में अपनी इस भारी-भरकम हिस्सेदारी को लगातार बनाए हुए है, और उसने अपने निवेश में कोई बदलाव नहीं किया था। केनरा बैंक ने राजेश एक्सपोर्ट को दिए गए इस लोन को तनावग्रस्त कर्ज की कैटेगरी में डाल दिया था। राजेश एक्सपोर्ट्स पर केनरा बैंक का कुल 509 करोड़ रुपये का बकाया है। अब केनरा बैंक ने इस कंपनी को दिए गए अपने पूरे स्ट्रेस्ड लोन को बेचने का फैसला किया है। बैंक इस फंसे हुए कर्ज के ट्रांसफर की प्रक्रिया को एक ओपन ऑक्शन के जरिए पूरा करेगा। केनरा बैंक अब इस मामले को दिवालियापन प्रक्रिया में ले जाना चाहता है और कंपनी को दिए गए कर्ज से पूरी तरह बाहर निकलने की तैयारी में है।
1200 रुपए से शुरू किया था धंधा
60 वर्षीय राजेश मेहता का जन्म 20 जून 1964 को बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने 1980 के दशक की शुरुआत में अपने सबसे बड़े भाई से मात्र 1,200 रुपये उधार लेकर अपने भाई प्रशांत के साथ चांदी के आभूषणों का कारोबार शुरू किया था। 1995 में कंपनी ने अपना आईपीओ लाकर 10 करोड़ रुपये जुटाए और पूंजी बाजार में कदम रखा। कंपनी को सबसे बड़ी वैश्विक पहचान साल 2015 में मिली जब उसने 400 मिलियन डॉलर के ऑल-कैश डील में स्विस रिफाइनरी ‘वालकैम्बी’ का अधिग्रहण किया। फोर्ब्स के अनुसार, अक्तूबर 2019 तक मेहता की कुल संपत्ति 1.57 बिलियन डॉलर आंकी गई थी। हालांकि, राजेश मेहता 2013 में ही राजस्व खुफिया निदेशालय के द्वारा सोने की तस्करी के एक मामले में पकड़ाया था। उस पर केरल के कोच्चि में विशेष आथ्रिक क्षेत्र में एक फर्जी कारखाना खोलकर जाली कंपनियों के सहारे देश से बाहर सोना ले जाने का आरोप लगा था। डीआरआई ने इस बारे में अपनी रिपोर्ट कोच्चि के सेशंस जज के सामने रखी थी। इतना होते हुए भी तत्कालीन राज्य और केंद्र की यूपीए सरकार ने उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। उसी का नतीजा है कि राजेशर मेहता ने अब 15 लाख करोड़ का घोटाला कर दिया।
कंपनी की आई सफाई
कंपनी ने सेबी के आरोपों पर 5 सूत्रीय स्पष्टीकरण जारी किया है और सभी आरोपों का खंड़न किया है। कंपनी ने कहा है कि यह अंतरिम आदेश है और इसका अध्ययन करने के बाद विस्तृत जवाब दिया जाएगा। सेबी ने वित्त वर्ष 2021 से 2024 के बीच स्टैंडअलोन रेवेन्यू में भी 12,557 करोड़ रुपये की गड़बड़ी पकड़ी है। कंपनी ने कहा कि वह सेबी के अंतरिम आदेश के संबंध में मीडिया में आ रही सभी खबरों को खारिज करती है। राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने अपने एक्सचेंज फाइलिंग में कहा कि कंपनी जल्द ही एक अन्य स्पष्टीकरण भी जारी करेगी जो मीडिया में चल रही अनावश्यक अटकलों को स्पष्ट और समाप्त कर देगा। हालांकि, राजेश एक्सपोर्ट्स ने एसईबीआई से 3 जून, 2026 की तारीख का अंतरिम आदेश स्वीकार कर लिया।

कुछ हजार करोड़ की है वालकांबी की कमाई
राजेश एक्सपोर्ट की सहायक कंपनी वालकांबी एसए ने स्विस अधिकारियों को पेश अपने ऑडिटेड खाते में दिखाया है कि उसकी सालाना कमाई असल में कुछ सौ करोड़ की है। लेकिन, कंपनी के शेयर होल्डिंग के ढांचे को अभूतपूर्व तरीके से लाखों करोड़ का दिखाया गया। अब सेबी ने इसी पर सवाल उठाया है। उसका कहना है कि जब राजेश ज्वेलर्स का काम सोने और हीरे-जवाहरातों की सफाई और रिफाइनिंग करना है तो वह केवल प्रोसेसिंग शुल्क या वैल्यू एडीशन की फीस ही लेगा। लेकिन कंपनी के मालिक ने खुद को उस पूरे सोने का मालिक बताया है, जो विदेशों से उस तक रिफाइनिंग के लिए पहुंचा। यह बिल्कुल ऐसा है कि सड़क पर कोई टोल बूथ ऑपरेटर उसके टोल से गुजरने वाली तमाम कारों पर अपना देवा जताने लगे। अभी तक सेबी ने इस घोटाले की अपने स्तर पर जांच की है। घोटाले की आरोपी कंपनी की ओर से उसे कोई मदद नहीं मिली है। ेसबी की 100 से ज्यादा पन्ने की रिपोर्ट में राजेश ज्वेलर्स की ऑडिटर कंपनी बेंगलुरु की बीएसडी एंड कंपनी और पीवी रामन्ना रेड्डी एंड कंपनी है। सेबी ने दोनों कंपनियां पर जरूरी दस्तावेज न उपलब्ध कराने का आरोप भी लगाया है। सेबी ने अपनी जांच रिपोर्ट में यह भी कहा है कि राजेश ज्वेलर्स ने अपनी कंपनी पर 1000 करोड़ का लोन बताया है, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट में लोन देने वाले बैंक का नाम नहीं है। राजेश ज्वेलर्स ने यह भी नहीं बताया है कि कंपनी ने केनरा बैंक से लोन ले रखा है, जिसे नहीं चुकाने के एवज में कंपनी को दीवालिएपन के कगार पर खड़ा किया जा रहा है। सह सारा खेल निवेशकों की आंख में धूल झोंकने के लिए किया गया है। वित्तीय मामलों के जानकार इसे भारत में सत्यम कंप्यूटर्स का घोटाला सामने आने के बाद उससे भी बड़ा लेखा घोटाला बता रहे हैं।
1500 रुपए का बेसिक फोन रखता है राजेश
भारत का सबसे बड़ा 15 लाख करोड़ का घोटाला करने वाले राजेश मेहता ने एक इंटरव्यू में खुद को जमीन से जुड़ा और साधारण जीवनशैली का बताया था। राजेश अपने साथ मोबाइल स्मार्टफोन नहीं, बल्कि 1500 रुपए का एक बेसिक फोन रखता है। उसका कहना है कि बिजनेस अपनी जगह है, लेकिन जब बात अमीमरी दिखाने की आती है तो वह दूसरों की तरह शानदार लाइफस्टाइल की जगह साधारण जीवनशैली पसंद करता है।
डाउनग्रेड होने के बाद भी एलआईसी ने लगाया पैसा
मई 2021 को ब्रिकवर्क रेटिंग्स ने राजेश ज्वेलर्स की रेटिंग ए से घटाकर सीधे डी कर दी थी। क्रेडिट मार्के का कोई भी मामूली जानकार बता सकता है कि इस डाउनग्रेड का मतलब कंपनी वित्तीय संकट से गुजर रही है। कंपनी पर दीवालिया होने का खतरा है। ऐसा होने पर रीटेल शेयरहोल्डर्स कंपनी से अपना पैसा निकाल लेते हैं। इस खतरे के बावजूद एलआईसी ने भारत के करदाताओं का पैसा कंपनी के 8.86% शेयर में लगाए रखा। उसके बाद कंपनी में एलआईसी का शेयर बढ़कर 11.22% तक आ गया। यानी बजाय पैसा घटने के और बढ़ा। एलआईसी चाहती तो राजेश ज्वेलर्स के शेयरों के भाव 600 रुपए होने पर अपना पूरा पैसा निकाल सकती थीथी, लेकिन तब भी ऐसा नहीं किया गया। उसके बाद 4 साल तक एलआईसी का पैसा राजेश ज्वेलर्स के शेयरों में लगा रहा। अब जबकि, कंपनी पर घोटाले का दाग लग चुका है और उसके शेयरों के भाव 100 रुपए तक नीचे चले गए हैं, एलआईसी ने अपना पैसा जानबूझकर डुबो दिया है।
कमला पसंद गुटखा कंपनी ने बैंकों में डाला हवाला का पैसा बताया
हीरे बेचकर मिले 2547 करोड़, लेकिन हीरे तो बिके ही नहीं, जांच एजेंसियां सच्चाई बयान करती रहीं, सत्ता की नींद नहीं टूटी नई दिल्ली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जैसे ही कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में देश का सिस्टम दरकने लगा है, अब वही दरकता सिस्टम दिखाई दे रहा है। भारत में 15 लाख करोड़ का लेखा घोटाला सामने आने के बाद अब पता चला है कि गुटखा बनाने वाली कंपनी कमला पसंद के मालिक चौरसिया बंधुओं ने भी हीरे बेचने की आड़ में हवाला से लाए गए 2547 करोड़ रुपए से अधिक देश के बैंकों में खपा दिए। यानी यह सारा पैसा ब्लैक से व्हाइट कर लिया। मामले की जांच करने वाली सरकारी एजेंसियों ने ट्रिब्यूनल के सामने बेनामी संपत्ति एक्ट 1988 के तहत मामला पेश किया, लेकिन ट्रिब्यूनल ने उनकी भी एक नहीं सुनी। उसके बाद सरकार और कमला पसंद कंपनी के बीच मामला कुछ इस कदर सेट हुआ कि ट्रिब्यूनल के खिलाफ केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में अपील ही नहीं की और मामला रफा-दफा हो गया।
जब हीरे ही नहीं थे तो बिके कैसे?
ये मामला 2016 का है। तब कमला पसंद कंपनी के मालिक 8 चौरसिया बंधुओं ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि हीरे बेचकर उन्हें 2547 करोड़ से ज्यादा की आय हुई है। फिर उन्होंने उस रकम को न केवल बैंकिंग सिस्टम के हवाले कर दिया, बल्कि भारत की मोदी सरकार के इनकम डक्लरेशन स्कीम के तहत छूट का आवेदन भी कर दिया। असल में न तो कमला पसंद कंपनी के पास कोई हीरा था और न ही उन्हें किसी को बेचा गया। हीरे होने का बहाना तो हवाला के माध्यम से देश में आए काले धन को छिपाने का था। इस आड़ में कंपनी ने 2547 करोड़ से अधिक की काली कमाई को सफेद कर लिया। इसके बाद भारत सरकार के आयकर विभाग और बेनामी संपत्ति निरोधक दस्ते ने मामले की जांच शुरू की। पता चला कि चौरसिया परिवार ने यह रकम हवाला के जरिए मंगवाई है। हीरा बेचने का तो बस एक बहाना था। असली खेल काली कमाई का छिपाना था। कमला पसंद कंपनी के खिलाफ पहले भी जांच कर चुकी एजेंसियों का दावा है कि कंपनी के पास बेनामी स्रोत से काला धन आया था। यह काला धन अंगड़िया कहे जाने वाले किसी हवाला अपॅरेटर के माध्यम से कंपनी तक पहुंचा था। पूरा पैसा 2016-17 से 2020-21 के बीच कंपनी तक पहुंचा। आय की जानकारी देने वाली मोदी सरकार की स्कीम का फायदा उठाने के बाद कमला पसंद कंपनी ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स की स्कीम के तहत आवेदन दिया, जिसमें साल-दर-साल हीरे बेचकर 2020-21 तक हुई कमाई का ब्योरा दिया गया था। जांच एजेंसियों ने पाया कि हीरे की बिक्री की बात पूरी तरह से झूठी है। जब फेमा ट्रिब्यूनल के सामने जांच एजेंसियों ने इस मामले को पेश किया तो चौरसिया परिवार ने बेनामी संपत्ति कानून के तहत जांच एजेंसियों को चुनौती दी। फिर क्या था- ट्रिब्यूनल ने फैसला चौरसिया परिवार के पक्ष में दिया। 28 जून 2023 को बेनामी संपत्ति उम्नमूलन प्राधिकारण ने चौरसिया बंधुओं पर देश में 297 करोड़ और 358 करोड़ रुपए हवाला के माध्यम से लाने का आरोप सही पाया। लेकिन इस फैसले से पहले ही चौरसिया बंधुओं ने होशियारी दिखाते हुए 48 और 49 करोड़ से अधिक के हीरे अपने पास होने का दावा किया। उनके मुताबिक, इन हीरों को कट-पॉलिश कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में 364.91 करोड़ और 358.95 करोड़ में बेचा गया। लेकिन जब आयकर विभाग की स्पेशल टीम ने जनवरी 2020 में चौरसिया परिवार के ठिकानों पर रेड मारी तो उसे भारत में हवाला के माध्यम से बेहिसाब पैसा लाए जाने के दस्तावेज मिले। इस खेल में देश की नामी जेम्स एंड ज्यूलरी कंपनियां शामिल थीं। इन सभी ने मिलकर हवाला के माध्यम से कमला पसंद कंपनी के मार्फत काला धन मंगवाया था। चौरसिया परिवार पर आरोप है कि उन्होंने उसी पैसे को सफेद कर देश के बैंकिंग सिस्टम में डाला। इसके बदले में चौरसिया परिवार ने हवाला कारोबारी को 0.18 प्रतिशत दलाली दी।
कानपुर से शुरू हुआ कमला पसंद का कारोबार
कमला पसंद समूह 1973 में कानपुर में सड़क किनारे एक ठेला लगाता था। ग्रुप के पितामह थे कमला कांत चौरसिया। वह पान-तंबाकू का ठेला लगाते थे। इसके बाद कमलाकांत चौरसिया ने कानपुर में गुटखा बनाने की एक फैक्ट्री लगाई। फिर तो कंपनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और बीते 4 दशकों में कमला पसंद 3000 करोड़ की लागत वाली कंपनी बन गई। अब कंपनी का कारोबार कानपुर के साथ ही दिल्ली, कोलकाता और मुंबई तक में फैला है। फिलहाल, कमला पसंद का कारोबार कमला प्रसाद समूह चलाता है और कमल किशोर चौरसिया इसके मालिक हैं। समूह के पास अब राजश्री पान मसाले की भी मिल्कीयत है।
ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती नहीं दी
जांच एजेंसियों और केंद्र सरकार के आयकर विभाग ने 28 जून 2023 को पारित वैधानिक प्राधिकरण के आदेश को ट्रिब्यूनल में खारिज किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती क्यों नहीं दी गई, यह अपने आप में एक बड़ा रहस्य है। आयकर विभाग के बेनामी प्रतिबंध ब्रांच के रिव्यू पिटीशन को भी ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया।




