
आओ सनातन गुरु शिष्य की गौरव गाथा गाते हैं सुप्त उनीदें हिंदुत्व में रघुवंश मणि “”यतो धर्मःततो विजय” “का सच बतातेघोर तिमिर में चितौड़ ककरहवा के नन्हू हाथ छोड़ के पूज्य दिग्विजय उदेति हिंदू सभा का बिगुल बजाते , सन 49 में प्राकट्य रामलला के आगे शीश झुकाते,,,।।
नव देश नव विधान में घुड़सवार होके चुनावी समर सिंहासन के आगे चर्चा में आते।
सन,छाछट में विजयी श्री होके सन उन्हत्तर में पूज्य ब्रहमनाथ शिष्य ब्रह्मलीन हो जाते हैं
सन 36 में घर की देहरी छोड़ काण्डी का बैरागी विहग व्योम में उड़ जाते हैं ,सन 40 में लौट के कृपालु गोरखपुर बस त्रिपाल सी छाया बन जाते।
धर्मांतरण से आहट संत अनादिं अनंत अखंड अभेद अक्षय हिंदुत्व का पुनर्जागरण का प्रण लेते ।।
त्वरित महावीर पटना में दलित मुख्य पुजारी बनाके उडप्पी के धर्म आंदोलन में जातिदंश का जहर मिटाते
रोम रोम में राम बसे श्वास श्वास में सीता यही बाल्मीकि रामायण में हमसब गाते
वहीं दलित दादू नामदेव कबीर दक्षिण के थिलरूवर सदियों से सनातन की शोभा बढ़ाते हैं
काशी नरेश ढोम के यहां भोज प्रथा शुरू कर सबरी राम को चरितार्थ कर गुरुदेव विघटित आस्था पर अंकुश लगाते
सन 87 में स्वामी परमहंस पूज्य अद्भेत
के सानिध्य में न्याय की अर्जी लगाते।।।

एकजुट सूर्यकोटी सम तेज लालिमा लिए भगवाधारी धर्म युद्ध छेड़ जाते हैं
ललकारते आंदोलन सत्ता मोहियो के समक्ष अद्भुत शैव वैष्णव रघुकुल के लिए अडिग चट्टान बन जाते हैं
कण कण की ऊर्जा से बच्चा बूढ़े साधु संत सकल सृष्टि विराट युद्ध का शंखनाद कर जाते
द्रवित पुरोधा जामवंत से युवा शक्ति को जोड़ने शक्ति याद दिलाने एकाकी विजय पद पर बढ़ जाते
मठ मंदिर को मीनारो में ,यीशु बाइबल हाथों में चाबुक चलाते हैं
उर्ध्वगामी आदियोगी अद्भुत शक्ति सहस्त्राचार मिलन से कुंडलिनी सी जागृति सर्वत्र शक्ति संचार हो जाती है
मन के राम चित्त की चिंता हरते बारंबार ओजस्वी वाणी के सम्मोहन सुपात्र रामकाज के लिए उत्तराधिकारी पाते,,,
दीक्षा प्रस्ताव की स्वीकृति सहज रुग्ण गुरुदेव की मन मुराद बाद में संजीवनी बन जाती
“”जा पर जेको सत्य सनेहु मिले कुछ ना संदेहू”” सत्यार्थ कर जाती
तीजे पहर शैय्या सुख त्यागे घंट नादकर छोटे बाबा कान में इक्कीस दिन डंठल डालें ,बारह बरस रेणु कुंडल संभाले सन्यास पद पर कदम बढ़ाते हैं
“धर्म रक्षति रक्षितः”” का जोश भर जाते हैं
स्वसुत को एक दिन वियोगीें तात ने झाड़ू लिए मठकाज में रत देखा सजल नयन द्रवित ह्वदय वात्सल्य ने पूछा,,जीवन बसंत तज क्यों इतनी जल्दी प्यारे??
भावुक पल भांपते भाव बिह्ल गुरु पिता ने समझाया तेरा सुत तेरा रहेगा जब चाहे स्वजनों से मिल सकेगा
अलौकिक आनंद सत्य सनातन धर्म उत्थान के लिए प्रारब्ध नियत कोसों दूर लाई है ,,,
कठपुतली साध्य से हम हैं हर प्रसाद इच्छा मन सत्य प्रकाश की खोज राजेंद्र सा गुरु महिमा देव भूमि का गाने दो ,,,ये सुत यही रह जाने दो ।।।।
फाङू बान्डी का स्वादी चख यमकेश्वर का मेले की स्मृति से दोनों गुरु शिष्य “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्ग ना रोचते”” के किस्से सुनाते हैं ।।।।
पूज्य दिग्विजय ने पैतालिस वर्ष मठ संभाले,
गुरु अद्वैत भी चौतिस वर्ष रहे मठ ध्वजा लहराते
अब सौप दिए पंचों ने शाही मार्केंड्या प्रकाश सारथी दे आदित्य चहु दिशा परचम लहरा दे
इस्माइल के लिए धरने देते,वंतांगिया मुसहर के लिए दिन रात किए रहते
चार बार की विधायकी,चार बार की सांसदी सत्ता गुरु को सौंपते देखा एक कदम आगे पंचूर लाल पांच बार गुरू की कसौटी पर खरे उतरते देखा ,,,
सारे सियासी छल षड्यंत्र को गंभीर सुशील शिष्य महाकुंभ हृदय में समाते सटीक उत्तम उत्तर देकर के विपक्षी को प्रेरित कर जाते
जागर सुनते ,देवभूमि के किस्से कहते, गुरु शिष्य धर्म से लेके आध्यात्म की चर्चा करते,
सर्द 27 के किस्से भूल ना पाते हैं कैसे विधि संरक्षक ही ग्यारह दिन जेल में रखे इकतीस को और धाराएं लगाते सत्य को प्रताड़ित पर पराजित कर ना पाते हैं
लाल सफारी से ग्यारह से तीजी कार से फुर्र होके ,विरोधी को चकमा दे जाते है
विधर्मी अन्ततः इक योगी से हार ही जाते हैं
राम के लिए सत्ता ठुकराते “”कटेंगे तो बटेंगे नेक रहेंगे एक रहेंगे”” ओजस्वी गंभीर शिष्य को अद्भुत देखा
दंगाई दावानल अतीत का हिस्सा बनते देखा” पलायन नहीं पुरुषार्थ करो भावी पीढ़ी को कल के लिए संभालते देखा
माला भाला शास्त्र शस्त्र क्षमा न्याय प्रियता से राजधरम को निभाते देखा एक योगी को राजतंत्र प्रजातंत्र का हिंदू हृदय सम्राट बनते देखा ,,,
आओ सनातन गुरु शिष्य की गौरव गाथा गाते हैं सुप्त हिंदुत्व में रघुवंश मणि स्थापत्य का सच बताते हैं ।




