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दिल्ली की दोस्ती में दरार,2027 में विपक्ष की नैया कैसे होगी पार?

सत्ता का सौदा: 2027 से पहले सपा-कांग्रेस रिश्तों में उठी अविश्वास की आग

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंगलवार का दिन उस हलचल के नाम रहा जिसने 2027 की लड़ाई से पहले विपक्षी खेमे की नींद उड़ा दी। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है। दिनभर लखनऊ से दिल्ली तक बैठकों, बयानबाजियों और रणनीतिक संदेशों का दौर चलता रहा। सबसे बड़ा सवाल यही बना रहा कि क्या भाजपा को रोकने के लिए बना विपक्षी समीकरण अब टूटने की कगार पर पहुंच चुका है।

सूत्रों के मुताबिक सीट बंटवारे, नेतृत्व और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक वर्चस्व को लेकर दोनों दलों के बीच गंभीर मतभेद उभर आए हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि कांग्रेस जमीन पर कमजोर होने के बावजूद “बड़े भाई” की भूमिका चाहती है, जबकि कांग्रेस नेताओं का मानना है कि बिना राष्ट्रीय नेतृत्व के भाजपा को चुनौती देना संभव नहीं है। यही टकराव अब सार्वजनिक संकेतों में बदलता दिखाई दे रहा है।

राजधानी लखनऊ में विगत सप्ताह दिनभर राजनीतिक दफ्तरों में बैठकों का दौर चलता रहा। समाजवादी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने बंद कमरों में आगामी रणनीति पर चर्चा की। दूसरी ओर कांग्रेस खेमे से भी यह संदेश देने की कोशिश हुई कि पार्टी अब उत्तर प्रदेश में केवल सहयोगी की भूमिका में रहने को तैयार नहीं है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह टकराव केवल सीटों का नहीं बल्कि भविष्य की सत्ता की धुरी बनने का संघर्ष है।

पिछले लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने भाजपा को रोकने के लिए एक साथ आने का प्रयास किया था। उस समय मंच साझा करते हुए बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि “संविधान बचाने” और “लोकतंत्र की रक्षा” के लिए विपक्ष एकजुट है। लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। अंदरखाने यह चर्चा तेज है कि कई सीटों पर हार के बाद दोनों दल एक-दूसरे को जिम्मेदार मान रहे हैं। समाजवादी पार्टी को लगता है कि कांग्रेस का संगठन जमीनी स्तर पर कमजोर है, जबकि कांग्रेस का आरोप है कि समाजवादी पार्टी गठबंधन धर्म निभाने में असफल रही।

राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि समाजवादी पार्टी अब अपने बलबूते चुनावी तैयारी मजबूत करने में जुट गई है। पार्टी संगठन को गांव-गांव तक सक्रिय करने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। वहीं कांग्रेस भी प्रदेश में अपनी अलग पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी की सभाओं और संगठन विस्तार अभियान को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम पर तुरंत हमला बोल दिया। सत्ताधारी दल के नेताओं ने कहा कि विपक्ष केवल “सत्ता का गणित” जोड़ने में लगा है जबकि जनता विकास और स्थिरता चाहती है। भाजपा प्रवक्ताओं ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच अविश्वास इतना गहरा हो चुका है कि दोनों साथ रहकर चुनाव नहीं लड़ सकते। भाजपा नेताओं ने यह भी कहा कि विपक्षी दल केवल कैमरे के सामने एकजुट दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से एक-दूसरे को खत्म करने में लगे हैं।

समाजवादी पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के बढ़ते दखल से मुस्लिम और पारंपरिक विपक्षी मतों में बंटवारे का खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि पार्टी अब अपनी अलग राजनीतिक पहचान को और आक्रामक तरीके से सामने लाने की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल “सहयोगी दल” बनकर नहीं रह सकती और उसे उत्तर प्रदेश में पुनर्जीवित होना ही होगा।

सूत्रों का कहना है कि दोनों दलों के बीच सबसे बड़ी खींचतान सीटों की संख्या को लेकर है। समाजवादी पार्टी चाहती है कि विधानसभा चुनाव में वही नेतृत्वकारी भूमिका निभाए, जबकि कांग्रेस अधिक हिस्सेदारी मांग रही है। कई जिलों में स्थानीय नेताओं के बीच टकराव भी बढ़ता जा रहा है। जमीनी कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति है कि आखिर भविष्य में दोनों दल साथ रहेंगे या अलग-अलग रास्ता चुनेंगे।

लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि विपक्षी खेमे में नेतृत्व को लेकर अंदरूनी असुरक्षा बढ़ रही है। समाजवादी पार्टी को डर है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन का चेहरा बनकर उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। वहीं कांग्रेस को लगता है कि समाजवादी पार्टी केवल अपने जनाधार को बचाने के लिए गठबंधन का इस्तेमाल कर रही है। यही अविश्वास अब रिश्तों को कमजोर कर रहा है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह टकराव और खुलकर सामने आ सकता है। पंचायत चुनाव, संगठन विस्तार और आगामी राजनीतिक अभियानों के दौरान दोनों दलों की असली रणनीति सामने आएगी। यदि गठबंधन टूटता है तो विपक्षी मतों का विभाजन भाजपा के लिए सबसे बड़ा लाभ साबित हो सकता है। यही वजह है कि सत्ताधारी दल फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम को अपने लिए राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा गठबंधनों और विश्वासघात की कहानियों से भरी रही है। कभी साथ चलने वाले दल अचानक एक-दूसरे के सबसे बड़े विरोधी बन जाते हैं। मंगलवार की हलचल ने यह साफ कर दिया कि 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं होगी, बल्कि विपक्ष के भीतर भी नेतृत्व और अस्तित्व की जंग उतनी ही तीखी रहने वाली है।

फिलहाल जनता यह देख रही है कि जो दल सत्ता परिवर्तन का सपना दिखा रहे थे, वे खुद आपसी संशय और महत्वाकांक्षा की दीवारों में उलझते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यदि यह दरार और गहरी हुई तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया समीकरण जन्म ले सकता है, जिसका असर केवल विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

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