उत्तर प्रदेशवाराणसी

मुख्य चुनाव आयुक्त की हास्यापद दलील,लोकतंत्र की मूल भावना को ज्ञानेश बाबू रहे “लील”

 

      • लोकतंत्र के प्रहरी का पतन और भयावह सियासी खेल
      • मुख्य चुनाव आयुक्त का ‘राजनीतिक अवतार’
      • राहुल गांधी पर सख्ती, अनुराग ठाकुर पर मौन
      • भाजपा नेताओं के ही आरोप चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते
      • मतदान केन्द्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग पर शर्मनाक दलील
      • विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में धांधली!
      • 18 हजार हलफनामे दबा देने वाला आयोग
      • संवैधानिक संस्था का राजनीतिक दल में तब्दील होना
      • लोकतंत्र का गहराता संकट और भविष्य की चेतावनी

जब लोकतंत्र की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग खुद सत्ता की गोद में बैठकर राजनीतिक खिलाड़ी की तरह व्यवहार करने लगे, तब यह केवल संस्था की साख का संकट नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भयावह खतरा बन जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस ने यही तस्वीर साफ कर दी है। उम्मीद थी कि वे विपक्ष के गंभीर आरोपों का तार्किक और ठोस जवाब देंगे, लेकिन हुआ उलटा। वे पूरी तरह सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता की तरह सामने आए और धमकी भरे लहजे में बोले – “राहुल गांधी झूठे आरोप लगाकर सौ करोड़ मतदाताओं का अपमान कर रहे हैं।” सवाल उठता है कि अगर राहुल गांधी को हलफनामा देना जरूरी है, तो वही नियम अनुराग ठाकुर और भाजपा के उन नेताओं पर क्यों नहीं लागू होता जिन्होंने बिना सबूत विपक्ष पर फर्जी वोटरों का आरोप लगाया? यही दोहरा मापदंड चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को चौपट कर रहा है और यही भारत के लोकतंत्र को सबसे बड़े संकट की ओर धकेल रहा है।

* मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष पर धमकी भरे अंदाज में बोले, पर भाजपा नेताओं पर चुप्पी साधी
* नितिन गडकरी और भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा ने मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की पुष्टि की
* मतदान केन्द्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग पर सीईसी की दलील फूहड़ व हास्यास्पद
* बिहार में बाढ़-बारिश के बीच हड़बड़ी में एसआईआर कराने का तर्क संदिग्ध
* समाजवादी पार्टी द्वारा दिए गए 18 हजार हलफनामे आयोग ने दबाए
* राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ आयोग के लिए सीधी चुनौती
* आयोग का आचरण संवैधानिक संस्था से अधिक सत्तारूढ़ गठबंधन की सहयोगी पार्टी बनी
* लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था कठघरे में, भविष्य पर भयावह संकट मंडरा रहा

ज्ञानेश कुमार प्रेस कॉन्फ्रेंस ने राजनेता की तरह पेश आए

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका सबसे ऊंचे और निष्पक्ष निर्णायक की होनी चाहिए। लेकिन ज्ञानेश कुमार की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया। वे साफ-साफ एक राजनेता की तरह पेश आए। उन्होंने विपक्ष के गंभीर आरोपों को तार्किक ढंग से खारिज करने के बजाय धमकी भरे लहजे में कहा कि राहुल गांधी को सात दिन में हलफनामा देना होगा, वरना माफी मांगनी होगी। यह भाषा न तो संवैधानिक गरिमा के अनुरूप थी और न ही किसी स्वतंत्र संस्था के प्रमुख से अपेक्षित।

ज्ञानेश कुमार ने केवल राहुल गांधी को ही कठघरे में खड़ा किया, अनुराग ठाकुर के मुद्दे पर मौन

आयोग का असली चेहरा तब सामने आया जब ज्ञानेश कुमार ने केवल राहुल गांधी को ही कठघरे में खड़ा किया। जबकि भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने भी विपक्षी नेताओं पर फर्जी वोटर जोड़ने का आरोप लगाया था। फर्क बस इतना था कि राहुल गांधी ने सबूतों के हजारों पन्ने पेश किए, जबकि अनुराग ठाकुर ने खाली आरोप लगाए। फिर भी आयोग ने उनसे कोई हलफनामा नहीं मांगा, न ही माफी की मांग की। यही दोहरा रवैया आयोग की पक्षपातपूर्ण मानसिकता को उजागर करता है।

सत्ताधारी पार्टी के नेता ने आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाया सवाल

राहुल गांधी अकेले नहीं हैं जिन्होंने मतदाता सूचियों की गड़बड़ी पर सवाल उठाए। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने खुद कहा था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में तीन लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए। इसी तरह मध्य प्रदेश से भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा ने भी मतदाता सूचियों में हेराफेरी का आरोप लगाया। सवाल यह है कि जब सत्ताधारी पार्टी के ही बड़े नेता आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, तो आयोग की निष्पक्षता का दावा कैसे बचा रह सकता है?

राहुल गांधी का आरोप और दस्तावेजी सबूत

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है। यह कोई सतही बयान नहीं था। उन्होंने कर्नाटक के एक विधानसभा क्षेत्र से जुड़े हजारों पन्नों के दस्तावेज पेश किए, जिनके विश्लेषण में उनकी टीम को छह महीने लगे। इन दस्तावेजों में साफ दिखाया गया कि किस तरह एक ही मतदाता के नाम से कई जगह वोट बना दिए गए, कैसे मृत व्यक्तियों के नाम वोटर लिस्ट में बने हुए हैं और कैसे संदिग्ध पहचान वाले मतदाताओं को जोड़कर चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है। राहुल ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों है कि हर चुनाव में आखिरी घंटे में मतदान प्रतिशत अचानक सात से आठ प्रतिशत तक उछल जाता है? क्या यह महज संयोग है या फिर सुनियोजित जोड़-तोड़? राहुल ने मांग की कि मतदान केंद्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की जाए ताकि देश देख सके कि आखिर वोटिंग के दौरान वास्तव में क्या हुआ।

अनुराग ठाकुर का बिना सबूत किया दावा

राहुल के इन आरोपों का जवाब देने में भाजपा नेता अनुराग ठाकुर सबसे आगे आए। उन्होंने कहा कि महज सात दिन की जांच के बाद उनकी टीम ने पांच लोकसभा और एक विधानसभा क्षेत्र में लाखों फर्जी और संदिग्ध मतदाताओं का पता लगा लिया है। लेकिन यह बयान सिर्फ शब्दों का खेल था। न तो उन्होंने कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया और न ही कोई ठोस सबूत। बावजूद इसके, मीडिया के बड़े हिस्से ने उनके बयान को ऐसे उछाला जैसे मानो उन्होंने कोई बड़ा खुलासा कर दिया हो। जब राहुल गांधी सबूतों के साथ आरोप लगाते हैं तो उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाता है, और जब अनुराग ठाकुर बिना सबूत के वही बात कहते हैं तो उन्हें गंभीरता से लिया जाता है। क्या यही लोकतंत्र और निष्पक्षता है।

भाजपा नेताओं की अंदरूनी स्वीकारोक्ति

दिलचस्प यह है कि राहुल गांधी के आरोपों से भाजपा भले ही आधिकारिक तौर पर सहमत न हो, लेकिन उसके कई नेता पहले से ही इस मुद्दे को उठा चुके हैं। नितिन गडकरी ने कहा कि उनके लोकसभा क्षेत्र से करीब तीन लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिए गए। जनार्दन मिश्रा, भाजपा सांसद, ने भी हाल ही में रीवा में मतदाता सूची से छेड़छाड़ की शिकायत की। यानी यह महज विपक्ष का मुद्दा नहीं है। सत्ता पक्ष के नेता भी इस गड़बड़ी को मान चुके हैं। सवाल यह है कि जब भाजपा के अपने सांसद और केंद्रीय मंत्री यही आरोप लगाते हैं तो आयोग चुप क्यों रहता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त का राजनीतिक लहजा

मामले ने सबसे खतरनाक मोड़ तब लिया जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मीडिया के सामने आए। उनसे उम्मीद थी कि वे संवैधानिक गरिमा के अनुरूप ठोस जवाब देंगे और संस्था की साख बहाल करेंगे। लेकिन उनका बयान किसी राजनीतिक नेता से कम नहीं था। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी झूठे आरोप लगाकर सौ करोड़ मतदाताओं का अपमान कर रहे हैं। उन्हें सात दिन में हलफनामा देना होगा या फिर देश से माफी मांगनी होगी। यह बयान चुनाव आयोग के मुखिया का कम और सत्ताधारी दल के प्रवक्ता का ज्यादा प्रतीत हुआ। सवाल यह उठता है कि यही मानक अनुराग ठाकुर पर क्यों लागू नहीं हुआ। क्यों उन्हें हलफनामा या माफी की चेतावनी नहीं दी गई।

सीसीटीवी फुटेज पर हास्यास्पद दलील

राहुल गांधी की मांग थी कि मतदान केंद्रों की वीडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक की जाए। इससे यह साफ हो जाएगा कि शाम पांच बजे के बाद अचानक मतदान प्रतिशत क्यों बढ़ जाता है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने बेहद शर्मनाक और फूहड़ दलील दी। उन्होंने कहा कि क्या हमें अपनी मां-बहनों और बहू-बेटियों के सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक कर देना चाहिए। यह तर्क न केवल बचकाना है, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता का मजाक उड़ाने वाला है। अगर यही दलील सही है तो महिला खिलाड़ियों के क्रिकेट, कुश्ती या तैराकी के मैचों का प्रसारण भी प्रतिबंधित कर देना चाहिए। असल सवाल यह था कि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग ने इसे सामाजिक शर्म-लाज का मुद्दा बनाकर टाल दिया।

विपक्ष को धमकी, सत्ता पक्ष को संरक्षण

पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि चुनाव आयोग विपक्षी नेताओं को कठघरे में खड़ा करने का काम कर रहा है, लेकिन सत्ता पक्ष को खुला संरक्षण दे रहा है। यही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। राहुल गांधी को हलफनामा दाखिल करने या माफी मांगने की धमकी देना और अनुराग ठाकुर को बरी छोड़ देना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक समय था जब चुनाव आयोग की कार्यशैली की दुनिया में मिसाल दी जाती थी। टी.एन.शेषन ने जिस तरह से चुनाव सुधार लागू किए, वह आज भी याद किए जाते हैं। उस दौर में आयोग सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए समान दूरी पर खड़ा दिखता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। पिछले कुछ सालों में आयोग पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि वह सत्तारूढ़ दल की लाइन पर चलता है।

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