
● जब प्रधानमंत्री ही मर्यादा तोड़ें, तो राहुल को क्यों कोसे
● बिहार में नाच कौन रहा है? दिल्ली का मंच या बिहार की ताल!
● मोदी मुजरा बोले तो वाह-वाह, राहुल नचनियां बोले तो आह-आह..
● मर्यादा की राजनीति या सत्ता का मुजरा? बिहार में मोदी बनाम बिहारी अस्मिता की जंग
● गुजराती गरिमा बनाम बिहारी अस्मिता बिहार चुनाव में मोदी-तेजस्वी आमने-सामने
● जब प्रधानमंत्री ही गिरा दें स्तर, तो मर्यादा का माप कौन तय करेगा?
● नितीश के बिना भाजपा अधूरी, नितीश के साथ भाजपा मजबूर!
● बिहार बनाम गुजरात यह चुनाव अस्मिता बनाम अहंकार की जंग
● फोटोशूट की राजनीति छठ पूजा से सत्ता साधना तक
● मर्यादा अब मुद्दा नहीं, अस्मिता का बिगुल बजा
◆ अंशिका मौर्या
प्रधानमंत्री पद की गरिमा की बात करने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने इस गरिमा को सबसे पहले नीलाम किया। नरेंद्र मोदी जब विरोधियों की रैली को ‘मुजरा’ कह चुके हों, जब वे अपने भाषणों में गालियों को राजनीतिक रणनीति बना चुके हों, तब राहुल गांधी का ‘मंच पर नाचने लगेंगे’ वाला बयान केवल एक राजनीतिक पलटवार है। सभ्यता की शुरुआत वहां से नहीं होती, जहां उसकी लाश पहले ही दफ़न की जा चुकी हो। बिहार विधानसभा चुनाव अब केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि मर्यादा बनाम मनमानी, बिहारी अस्मिता बनाम बाहरी प्रभाव, और युवा बनाम प्रचार की जंग बन चुका है।
मर्यादा की राजनीति बनाम मोदी की बयानबाजी
राहुल गांधी द्वारा मोदी के नाचने वाले बयान पर संघ और भाजपा समर्थक इन दिनों माहौल बना रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद की मर्यादा का सम्मान करना चाहिए था। यह वही प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने विपक्षी नेताओं के जनसंपर्क को मुजरा कहा था? क्या यह वही प्रधानमंत्री नहीं हैं जिन्होंने एक मुख्यमंत्री को 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा था, विपक्ष को परजीवी कहा था, और जिनके मंचों से बार-बार मौत का सौदागर जैसे शब्दों का उलट जवाब गालियों में दिया गया? दरअसल, नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को चुनावी रणनीति के हिस्से के रूप में तोड़ा है और उस टूटन को जनसंवाद कहकर पेश किया है। जब प्रधानमंत्री ही अपने भाषणों में आक्रोश, व्यंग्य और अपमान की भाषा का प्रयोग करेंगे, तब राजनीतिक संवाद की मर्यादा अपने आप नीचे गिर जाएगी।
बिहार चुनाव में फंसी भाजपा मुख्यमंत्री कौन?
बिहार विधानसभा चुनाव ने भाजपा की रणनीति को उलझा दिया है। शुरू में पार्टी ने नितीश कुमार को मुख्यमंत्री चेहरा मानने से इंकार किया, फिर जनविरोध और सहयोगी दबाव के बाद कहा कि चुनाव के बाद भी मुख्यमंत्री नितीश ही रहेंगे। लेकिन यह बयान भाजपा के भीतर असंतोष की आंधी नहीं रोक पाया। संगठन के भीतर यह डर साफ दिख रहा है कि यदि नितीश के बगैर भाजपा मैदान में जाती, तो उसे अपने ही सहयोगी के खिलाफ चुनाव लड़ना पड़ता। इस तरह भाजपा का नितीश पर लौटना सियासी मजबूरी है, न कि नीति की घोषणा। चुनाव के मैदान में भाजपा के उम्मीदवारों की भाषा और जदयू के नेताओं की रणनीति एक-दूसरे के खिलाफ जा रही है। यह गठबंधन नहीं, राजनीतिक मजबूरी की बेमेल शादी है।
बिहार बनाम गुजरात अस्मिता का नया राजनीतिक ध्रुव
तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में खुद को बिहारी अस्मिता का चेहरा बना लिया है। मोदी और भाजपा का चेहरा गुजराती विकास मॉडल से जुड़ा रहा है, लेकिन बिहार की जनता अब स्थानीय बनाम बाहरी की भावनात्मक लड़ाई में उतर चुकी है। तेजस्वी यादव की रणनीति बेहद स्पष्ट है वह भाषण से ज्यादा बेरोजगारी की बात करते हैं, धर्म से ज्यादा रोजगार की चर्चा करते हैं और भाजपा के हिंदू कार्ड की काट युवा कार्ड से करते हैं। यही कारण है कि बिहार का युवा वर्ग, विशेषकर जाति और धर्म से ऊपर उठी जेन-जी पीढ़ी, आज तेजस्वी के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। यह वही वर्ग है, जो सिर्फ जय श्रीराम के नारों से नहीं, बल्कि नौकरी चाहिए के सवाल से वोट करता है।
भाजपा-जदयू का छुपा संघर्ष महाराष्ट्र मॉडल का डर
सूत्रों के मुताबिक, नितीश कुमार की पूरी कोशिश है कि इस चुनाव में भाजपा की सीटें जदयू से ज्यादा न हों। उन्हें डर है कि यदि भाजपा आगे निकल गई, तो बिहार में महाराष्ट्र मॉडल दोहराया जा सकता है, यानी बड़ा दल मुख्यमंत्री पद छीन ले। इसी आशंका के चलते नितीश गुप्त रूप से कई सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफसॉफ्ट वोट ट्रांसफर की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
प्रशांत किशोर की साख फुस्स दोहरी चाल का खुलासा
प्रशांत किशोर कभी चुनावी रणनीति के पर्याय माने जाते थे। लेकिन इस बार उनकी राजनीति और विश्वसनीयता दोनों पर सवाल उठे हैं। तेजस्वी यादव के खिलाफ दो विधानसभा सीटों से लड़ने की गप्पेबाजी के बाद खुद का मैदान छोड़ देना उनके राजनीतिक साहस की पोल खोल गया। बिहार में चर्चा है कि प्रशांत किशोर भाजपा की करीब 36 सीटों पर नुकसान पहुंचा रहे हैं और जितने वोट वे लेंगे, उतने भाजपा के खाते से घटेंगे।
जाति समीकरण और नया गठबंधन युवा बनाम प्रचार
बिहार में जातिगत राजनीति पुरानी है, लेकिन इस बार जातियों के भीतर भी एक नया वर्ग उभरा है। नौकरी की भूख रखने वाला युवा वर्ग। चाहे वह यादव हो, भूमिहार, राजपूत, दलित या मुसलमान हर वर्ग का युवा अब एक साझा नारे के साथ खड़ा है भाषण नहीं, भविष्य चाहिए। तेजस्वी यादव का यही नारा इस बार भाजपा और जदयू दोनों के प्रचार पर भारी पड़ता दिख रहा है।
ट्रेन का झूठ और जनता की परेशानी
भाजपा ने दावा किया कि छठ पर्व पर 12,000 विशेष ट्रेनें चलाई जा रही हैं। यदि यह सच होता, तो हर ट्रेन में औसतन 2000 यात्री बैठाकर करीब 2.4 करोड़ लोगों को सफर की सुविधा मिलती। लेकिन यह दावा महज प्रचार साबित हुआ। स्टेशन से लेकर सोशल मीडिया तक यात्रियों की परेशानी चरम पर रही। लोगों ने टिकट नहीं मिलने, सीट खाली न होने, और भीड़ के कारण यात्रा बाधित होने की तस्वीरें वायरल की। छठ की आस्था पर यह छल बिहार की जनता को गहराई से चुभा है।
योगी आदित्यनाथ की रैली और नितीश का गुस्सा
भाजपा ने हिंदुत्व का माहौल बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ को बिहार भेजने की कोशिश की, लेकिन नितीश कुमार इससे बेहद नाराज बताए जाते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेतृत्व ने अब योगी को संभल कर बोलने का संदेश भेजा है। नितीश कुमार नहीं चाहते कि चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम में बदल जाए क्योंकि बिहार की राजनीति में यह कार्ड अब काम नहीं करता।
लोग अब धर्म नहीं, रोजगार चाहते हैं।
हेलिकॉप्टर का खेल खर्च जनता के कंधों पर
बिहार में 10 हजार करोड़ के कायद साहब के नाम से मशहूर एक उद्योगपति-सियासतदान का हेलिकॉप्टर इन दिनों चर्चा में है। उनका एक दिन का उड़ान खर्च 5 से 6 लाख रुपए बताया जा रहा है, जिसे उनके प्रत्याशी उठाते हैं। यह राजनीति का वह रूप है, जहां जनता की जमीन से उड़ान भरने वाले नेता अब हेलिकॉप्टर से उतरकर फोटोजेनिक गरीबी दिखाते हैं। यह सियासत नहीं, स्पॉन्सर्ड डेमोक्रेसी है।
मर्यादा की जंग असली सवाल कौन उठाएगा?
प्रधानमंत्री पद की मर्यादा की बात करने वालों को शायद याद नहीं कि लोकतंत्र में मर्यादा नीचे से नहीं, ऊपर से बनती है। जब शीर्ष पद पर बैठे लोग शब्दों का अपमान करते हैं, तब विपक्ष केवल जवाब देता है। राहुल गांधी का बयान इसलिए नहीं गलत है कि उन्होंने नाचने की बात कही, बल्कि इसलिए प्रासंगिक है कि उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति अब संवाद से नहीं, प्रदर्शन से चल रही है। बिहार की जनता इस प्रदर्शन की राजनीति को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है। वह जानती है कि मंच पर जो सबसे ज़्यादा नाचता है, वही सबसे कम काम करता है।
* प्रधानमंत्री पद की मर्यादा की बात करने वाले वही हैं जिन्होंने इसे सबसे पहले तोड़ा।
* भाजपा मुख्यमंत्री के चेहरे पर फंसी, नितीश को न मानने की कोशिश उलटी पड़ी।
* बिहार में बिहारी अस्मिता बनाम गुजराती प्रभाव की लड़ाई तेज।
* जदयू चिराग को हराने के लिए तेजस्वी को अंदरखाने सपोर्ट दे रही है।
* नितीश नहीं चाहते कि भाजपा सीटों में आगे निकले उन्हें महाराष्ट्र मॉडल का डर सता रहा।
* प्रशांत किशोर की हवा फुस्स, भाजपा को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं।
* जाति के ऊपर उठा युवा अब बेरोज़गारी और भविष्य का मुद्दा बना रहा है।
* 12,000 ट्रेनों के झूठ से भाजपा की विश्वसनीयता पर सवाल।
* योगी की रैली पर नितीश की नाराजगी हिंदुत्व कार्ड बेअसर।
* कायद साहब के हेलिकॉप्टर खर्च से चुनाव में धनबल का नंगा खेल उजागर।
* बिहार का चुनाव अब मर्यादा नहीं, अस्मिता की जंग बन चुका है।




