
~ कैराना की कलस्यान खाप जहां एक ही वंश दो धर्मों में बंटा
~ परंपरा और विरासत ने दोनों को राजनीतिक मैदान में आमने-सामने खड़ा किया
~ चौधरी बाबा काल्सा से इकरा हसन और मृगांका सिंह तक
~ एक ही खाप की दो बेटियां, जिनके लिए राजनीति सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई
~ एक खाप से निकलीं दो पीढ़ियां एक ने परंपरा को थामा, दूसरी ने परंपरा तोड़ी राजनीति ने एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया।
~ इकरा हसन लंदन से लौटकर भाई को जेल से चुनाव जितवाई और खुद देश की संसद में सबसे युवा महिला सांसद बनी
~ सोशल मीडिया पर अश्लील टिप्पणियों, डीपफेक वीडियो और ‘निकाह प्रस्तावों’ का शिकार
~ इकरा एक महिला है, और पुरुष समाज को यह मंजूर नहीं
~ मर्दवादी मानसिकता का प्रतिरोध बनती इकरा जिनका ‘चबूतरा’ अब कैराना की राजनीति की नई चौपाल
~ एक बहन, जो पिता की विरासत व भाई की राजनीतिक पकड़ के बीच खुद को सिद्ध करती
~ एक सांसद के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम लड़कियों की इज्जत और सुरक्षा क्या होगी?
~ कैराना और कलस्यान खाप की विरासत
शुभम श्रीवास्तव……
कैराना की राजनीति और समाज को समझने के लिए कलस्यान खाप का इतिहास जानना जरूरी है। चौधरी बाबा काल्सा गुर्जर समुदाय के वह सम्मानित बुजुर्ग थे, जिनकी खाप की जड़ें पंजीठ गांव में थीं। इस खाप के एक शाखा में एक सदस्य ने इस्लाम धर्म अपनाया और जंघेड़ी गांव जा बसे। वहीं से निकले चौधरी मुनव्वर हसन और उनकी बेटी इकरा हसन। जबकि मूल हिंदू शाखा पंजीठ गांव में रही और हुकुम सिंह तथा मृगांका सिंह उसी परंपरा की राजनीतिक प्रतिनिधि बनीं।
जब धर्म दीवार नहीं था, बिना मजहब देखे होते थे विवाह
1900 तक यह खाप समाज धर्म से ऊपर उठकर पारिवारिक रिश्ते बनाता था। चौधरी उजाला सिंह ने अपनी बेटी की शादी मुस्लिम गुर्जर बुंदू सिंह उर्फ फैय्याज़ हसन से की। इससे 1930 में पैदा हुए चौधरी अख़्तर हसन, जिन्होंने बाद में राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल किया।
राजनीति में दो ध्रुव हुकुम सिंह बनाम अख्तर हसन
चौधरी अख्तर हसन 1971 और 1973 में नगरपालिका चेयरमैन और 1984 में कांग्रेस सांसद बने। वहीं हुकुम सिंह जनसंघ से लेकर भाजपा तक के अहम नेता बने। कैराना की राजनीति में ‘चबूतरा’ और ‘चौपाल’ दो प्रतीक बन गए। एक हसन परिवार का, दूसरा सिंह परिवार का। यही चबूतरा-चौपाल कैराना की सत्ता का केंद्र बने रहे।
पीढ़ियां बदलीं, दुश्मनी नहीं
मुनव्वर हसन सबसे युवा सांसद बने, फिर उनकी पत्नी तबस्सुम हसन सांसद बनीं। नाहिद हसन विधायक बने। वहीं हुकुम सिंह विधायक और सांसद दोनों पदों पर निर्वाचित होते रहे। फिर आया 2017 का समय नाहिद हसन ने मृगांका सिंह को हराया और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता एक नई पीढ़ी में उतर आई।
इकरा हसन का प्रवेश जब राजनीति में मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बनी ताकत
2022 में जब योगी सरकार ने नाहिद हसन को गैंगेस्टर एक्ट में जेल भेजा, तब उनकी बहन इकरा हसन लंदन की पढ़ाई छोड़कर आईं और अपने भाई के नाम पर चुनाव लड़ा। जेल में रहते हुए उन्होंने नाहिद को जितवाया और दो साल के भीतर खुद संसद की कुर्सी तक पहुंचीं। 2024 में इकरा हसन सांसद और मंत्री बनीं।
सोशल मीडिया की गंदी लड़ाई जब ‘लड़की होना’ गुनाह बन जाए
इकरा हसन के संसद में आते ही ट्रोलिंग शुरू हो गई। अश्लील टिप्पणियां, जोड़ी बनाना, फर्जी निकाह की बधाइयां, डीपफेक वीडियो और अशोभनीय मीम्स यह सब इसलिए क्योंकि वे महिला हैं, जवान हैं और पर्दानशीन हैं। यह वह समाज है जो बेटियों को घर में ‘सम्मान’ देता है और बाहर उनकी इज्जत नीलाम करता है।
सवाल सिर्फ इकरा का नहीं पूरा सिस्टम दोषी
अगर एक सांसद, मंत्री, युवा महिला को ऐसे अश्लील ट्रोल झेलने पड़ते हैं, तो सोचिए उस लड़की की क्या स्थिति होगी जो कहीं कॉलेज जाती है या किसी दफ्तर में नौकरी करती है। पुरुषवादी मानसिकता हर स्तर पर हावी है, और जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं होंगी।
क्या नाहिद हसन को भी ऐसे ट्रोल किया गया
नाहिद हसन अभी तक कुंवारे हैं, लेकिन किसी ने उनकी जोड़ी नहीं बनाई, या शादी के प्रस्ताव नहीं भेजे। यह स्पष्ट संकेत है कि समाज महिलाओं को अब भी ‘उपभोग’ की दृष्टि से देखता है। इकरा की पहचान सांसद, मंत्री या विदुषी नहीं, बल्कि ‘युवती’ के रूप में ही की जाती है। इकरा हसन का संघर्ष सत्ता का नहीं, सम्मान की लड़ाई है। एक तरफ उनके दादा और पिता ने खाप और राजनीति की विरासत सहेजी, तो दूसरी ओर उन्हें उस समाज से जूझना पड़ा जो आज भी महिलाओं को बराबरी से देखने को तैयार नहीं। इकरा हसन किसी पार्टी की नेता नहीं। वे आज की हर लड़की का प्रतीक हैं जो घर से निकलकर अपना मुकाम बनाना चाहती है, लेकिन उसे हर कदम पर पुरुषवादी निगाहों, टिप्पणियों और ट्रोलिंग से लड़ना पड़ता है। इकरा की कहानी बताती है कि संसद में पहुंचना जीत नहीं। असली लड़ाई तो वहां से शुरू होती है, जब आपके ‘लड़की’ होने को ही आपका सबसे बड़ा अपराध बना दिया जाए।
- धार्मिक ध्रुवीकरण ने खाप को दो वंशों और दो धारणाओं में बांट दिया।
- पंजीठ गांव से निकले हुकुम सिंह, जंघेड़ी मुनव्वर हसन एक ही खून के
- अलग-अलग मजहब और राजनीतिक सोच के वाहक
- 1900 के दशक तक कलस्यान खाप में धर्म के पार विवाह होते थे
- चौधरी उजाला सिंह ने अपनी बेटी की शादी मुस्लिम गुर्जर से की
- यही विवाह बना चौधरी अख्तर हसन के जन्म की नींव जिन्होंने बाद में मुस्लिम गुर्जरों के पहले खाप चौधरी और दो बार नगरपालिका अध्यक्ष बनकर राजनीति में प्रवेश किया
- चौधरी अख्तर हसन 1984 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने, हुकुम सिंह जनसंघ से लेकर भाजपा तक की राजनीति में विधायक-सांसद रहे
- राजनीतिक वर्चस्व के लिए चबूतरे और चौपाल के बीच अदृश्य सत्ता युद्ध शुरू हुआ जो पीढ़ियों तक चला
- मुनव्वर हसन सबसे युवा सांसद बने, गिनीज बुक में दर्ज हुए
- मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन भी सांसद बनीं
- हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह भी राजनीति में आईं और 2017 में समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन से हार गईं जिससे प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत हो गई
- 2022 में योगी सरकार ने नाहिद को गैंगस्टर एक्ट में जेल भेजा, इकरा हसन लंदन की पढ़ाई छोड़कर भाई का चुनाव संभालने आईं
- इकरा ने अपने भाई को जेल से चुनाव जिताया व खुद 2024 में सांसद बनीं
- संसद पहुंचते ही सोशल मीडिया पर ट्रोल, अश्लील टिप्पणियां और बदनीयत सवाल सिर्फ इसलिए क्योंकि वह एक ‘महिला’ हैं
- पुरुष समाज इकरा की शिक्षा, परंपरा या राजनीति को नहीं देखता वह सिर्फ उनका चेहरा, कपड़े और उम्र देखता है
- सांसद होने के बावजूद फर्जी वीडियो, निकाह, मुबारकबाद, अश्लील डीपफेक यह सब इकरा के ‘लड़की’ होने के कारण
- इकरा की पहचान को सांसद, मंत्री या लीडर से पहले ‘युवती’ बना दिया गया। यह पितृसत्तात्मक सोच है जो हर कार्यक्षेत्र में मौजूद है
- अगर एक महिला सांसद को यह सब झेलना पड़ रहा है तो सोचिए कॉलेज, दफ्तर, सड़क या खेतों में काम करने वाली लड़कियों पर क्या गुजरती होगी
- इकरा हसन की राजनीति सिर्फ सत्ता की नहीं, सामाजिक मानसिकता के खिलाफ जंग
- महिला जो संसद में सबसे कम उम्र की सांसद है, उसे ट्रोल करने वाले समाज के लोग खुद अपनी बहनों को उसी संसद में भेजने का सपना देखते हैं
- ‘पर्दे’ को लेकर सवाल उठाने वालों ने कभी उस ‘सहनशीलता’ और ‘नैतिकता’ पर बात नहीं की जिससे इकरा हसन हर दिन लड़ रही
- राजनीति में पुरुष विरोधी को गाली पड़ती है, महिला विरोधी को गंदगी मिलती है यह फर्क बताता है कि असली लड़ाई कहां है
- इकरा का चबूतरा, अब कैराना की नई चौपाल बन चुका है जहां वह खुद समाज के फैसले ले रही हैं, और यह बात पुरुष वर्चस्व को चुभ रही है
- यह ट्रोलिंग सिर्फ इकरा हसन की नहीं यह हर उस लड़की की कहानी है जो परिवार, समाज और व्यवस्था से टकराकर आगे बढ़ना चाहती है
- इकरा कोई अपवाद नहीं नजीर है उस सोच की, जो महिलाओं को बराबरी नहीं, केवल सहनशीलता की प्रतीक बनाकर रखना चाहती है
पुरुष का यह चरित्र अगर सांसद महिला को नहीं बख्शता, तो बाकी लड़कियों का क्या हाल होगा - इकरा की कहानी बताती है संसद पहुंचना जीत नहीं है, असली युद्ध तो वहां से शुरू होता है, जब आप लड़की होकर आगे बढ़ती हैं




