बिहार

बिहार की नवनिर्वाचित नीतीश सरकार पर क्यो न उठे सवाल, चुनाव आयोग बना महागठबंधन के लिये “काल”

बिहार में एनडीए की तथाकथित ईमानदार जीत…और भारतीय लोकतंत्र का काला चेहरा

● बिहार की नवनिर्वाचित नीतीश सरकार पर क्यो न उठे सवाल, चुनाव आयोग बना महागठबंधन के लिये “काल”

● बिहार में एनडीए की तथाकथित ईमानदार जीत…और भारतीय लोकतंत्र का काला चेहरा

● बिहार का मैन्युफैक्चर्ड जनादेश और लोकतंत्र की मंडी में बिकता मताधिकार

● जहां संविधान ने जनता को मालिक बनाया था, वहां 5 किलो राशन ने उसे दास बना दिया

● 1 करोड़ 11 लाख वोट वालों को 25 सीट… 95 लाख वालों को 89 सीट यह वोट नहीं, लोकतंत्र की पोस्ट-प्रोडक्शन

● जो राज्य बुद्ध और महावीर को जन्म देता है, वहां आज अपराधी और ठेकेदार भविष्य के नेता

● यह चुनाव नहीं, नौकरी की भर्ती परीक्षा, रोजगार के नाम पर वोट गिरवी और सरकार गारंटर!

● जब चुनाव आयोग सत्ता का उप-कार्यालय बन जाए, तो लोकतंत्र की लाश पर उत्सव मनाया जाता

● नीतीश और लालू की कुर्सी-रसायन में बिहार हमेशा घुलता रहा

● सैकड़ों साल मुगल रहे, अंग्रेज रहे, किसी ने वर्णव्यवस्था नहीं छुई, आज वही व्यवस्था वोट बैंक की मशीन बनी

● बिहार की राजनीति का भविष्य एक ओर राजवंश के राजकुमार, दूसरी ओर अपराध के सम्राट

 

अनुज कुमार

बिहार एक बार फिर इतिहास की सबसे बदबूदार स्याही में अपने लोकतंत्र का चेहरा डुबोकर निकला है। कहा जा रहा है कि जनता का जनादेश है। लेकिन यह कैसा जनादेश है जो वोटों से नहीं, डर, दबाव, धमकी, लालच और लेन-देन से लिखा गया। जो चुनाव दिखने में लोकतांत्रिक था, असल में वह राशन-गुंडई, जातीय गणित, एनडीए की मशीनरी और चुनाव आयोग की चुप्पी से संचालित एक मैन्युफैक्चर्ड बहुमत था। यह वही बिहार है जहां संविधान की जगह जाति चलती है, नीति की जगह नफरत, और लोकतंत्र की जगह डेटा-प्रबंधन का विज्ञान। यह चुनाव नहीं, एक ऑपरेशन था। भारत की सामाजिक जड़ता वही वर्ण, वही विभाजन, वही दासता। इस देश में मुगल आये, राज किया, अंग्रेज आये, लूटा और चले गये। लेकिन किसी ने कभी भी इस देश की मनुवादी सामाजिक संरचना को नहीं छुआ। ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, कंधे से क्षत्रिय, उदर से वैश्य, और पैरों से शूद्र यह पाखंड आज भी उतना ही जिंदा है जितना हजारों साल पहले था। संविधान ने चाहे जितना प्रयास किया हो, व्यवहार में भारत आज भी जना नहीं, जन्म से चल रहा है। कहने को आज लोकतंत्र है परंतु लोकतंत्र की मशीन को चलाता कौन है। जाति + धर्म + धनबल + बाहुबल। यही चार स्तंभ आज की राजनीति का असली संविधान और बिहार इसका सबसे बड़ा प्रयोगशाला।

21वीं सदी का लोकतंत्र 5 किलो राशन की मुट्ठी में बंद अधिकार

जो जनता कभी सत्ता बदलती थी, आज लिस्ट से नाम काटे जाने के डर से वोट डालने जा रही है। नोएडा में काम करने वाली उस घरेलू सहायिका की कहानी पूरे बिहार का सच है। वह वोट देने बिहार क्यों गयी?
क्योंकि उसे बताया गया कि वोट नहीं दिया, तो लाभ खत्म, राशन बंद, दो लाख वाली योजना रद्द। यह वोट नहीं था सरकारी सुविधाओं के बदले में लिया गया अनिवार्य उपस्थिति-पर्चा। उसे कहा गया कि पहली किस्त 10 हजार, पूरी योजना 2 लाख की लेकिन सरकार एनडीए की बनेगी तभी मिलेगा। यही है आर्थिक ब्लैकमेल, यही है लोकतंत्र का नया टेंडर सिस्टम। कौन सी जाति की है, इससे फर्क नहीं पड़ता। सवर्ण न भी हो, पर दो लाख की आशा जाति को, धर्म को, विचारधारा को निगल जाती और यही चुनावी इंजीनियरिंग का असली खेल है।

सीटें बनाम वोट खतरनाक गणित, लोकतंत्र की अंतिम सांसे

यह आंकड़ा बताता है कि चुनाव में सिर्फ वोट नहीं गिने गये वोटों की कीमत तय की गयी। 1 करोड़ 11 लाख वोट 25 सीटें, 95 लाख वोट 89 सीटें, 90 लाख वोट 85 सीटें यह कोई लोकतांत्रिक परिणाम नहीं। यह तो पोस्ट-प्रोडक्शन का वह मैजिक है जिसमें एडिटिंग से हीरो बन जाता है और असली कलाकार पीछे छूट जाता है। इस व्यवस्था में जनता मतदाता नहीं, वस्तु बन चुकी है। सरकारें ‘दाता’, जनता ‘पाता’ दास अपने मालिक को चुनता है, इसी को अब चुनाव कहा जा रहा है।

चुनाव आयोग सत्ता का उप-कार्यालय, लोकतंत्र का चौकीदार नहीं

एनडीए की नौकरी योजना चुनाव के ठीक पहले चालू होती है, दो लाख रुपये की गाजर लटकाई जाती है, गृह-कल्याण, महिला-समर्थन, सामाजिक सुरक्षा के नाम पर वोटरों को लाइन में खड़ा किया जाता है। चुनाव आयोग सब कुछ नियम के अनुसार है। जब आयोग सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाए, तब लोकतंत्र सिर्फ़ एक सांख्यिकीय मजाक बन जाता है।

नीतीश लालू रसायन सत्ता की वह प्रयोगशाला जहां बिहार हमेशा जला

बिहार में दो ही स्थायी चीजें हैं भूख और गठजोड़।नीतीश कुमार और लालू यादव दो नाम, एक राजनीति
कुर्सी किसी की भी जाए, नीतीश के पास लौटकर ही रुकती है। 2010 में लालू 22 पर नीतीश बीजेपी के साथ, 2015 में नीतीश को खतरा लालू की गोद में, 2017 में लालू पर दबाव नीतीश फिर बीजेपी में, 2022 में भाजपा से टकराव लालू फिर तैयार, 2025 में स्थिति उलटी नीतीश इस्तीफा देने पहुंचे लेकिन शाह की चाल भांपकर चाय पीकर लौट आये। नीतीश जानते हैं कि बिना गारंटी के कुर्सी नहीं छोड़नी। एक हाथ में इस्तीफा,
दूसरे हाथ में बहुमत का दावा। गांधी के हत्यारों के वैचारिक वारिसों को सत्ता देना वे कलंक मानते हैं।
लेकिन लालू को भी बिहार की गद्दी किसी तीसरे के हाथ में नहीं जाने देना है। दोनों की लड़ाई आज भी वही है मैं, या तुम तीसरा कोई नहीं। जनता हर चुनाव में बस पिसती हुई रेत।

बिहार का भविष्य राजकुमार बनाम अपराध-साम्राज्य

नीतीश और लालू के बाद जिन्हें बिहार का भविष्य माना जा रहा है, वे या तो वंशवाद के राजकुमार हैं या अपराध के साम्राज्य के नए ताजदार। श्रीकृष्ण बाबू, अनुग्रह बाबू, कर्पूरी ठाकुर का बिहार अब इतिहास है।
वर्तमान है तेजस्वी यादव बनाम चौधरी सम्राट और अनंत सिंह जैसे चेहरे। यह वही बिहार है जहां एक तरफ अपराधी नेता हैं, दूसरी तरफ नेता अपराधी हैं।

जनता ने क्या चुना भविष्य या भय

चुनाव अगर ईमानदारी से भी हुआ हो जो कि आज के माहौल में मान लेना भी भोला-सा आत्मसमर्पण है)
तब भी यह प्रश्न खड़ा होता है क्या जनता ने भविष्य चुना या केवल पेट। क्या उसने सरकार चुनी या केवल दो लाख का सपना। इस चुनाव में बिहार ने नेतृत्व चुना या केवल भरण-पोषण की नोट शीट।

बिहार हार गया, लोकतंत्र मर गया

यह चुनाव सिर्फ एनडीए की जीत नहीं है। यह परंपरा, वर्णव्यवस्था, जाति की ठेकेदारी, और धनबल की वापसी का उत्सव है। यह जनता के पास से मालिक होने के अधिकार का छीना जाना है। यह वोट का बाजार है जहां वोटर ग्राहक है, और वोट सत्ता की दुकान पर बिकने वाली वस्तु। इसी मंडी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र की हत्या के लिए किसी तानाशाह की जरूरत नहीं होती। बस एक गरीब, मजबूर, भयभीत जनता चाहिए और एक लालच देने वाली सरकार।

बिहार का लोकतंत्र राशन की पर्ची पर लिखा भविष्य

नीतीश कुमार गांधी मैदान से नई पारी शुरू कर रहे है। लालू यादव फिर से बैक-अप के रूप में मौजूद। अपराधियों का दबदबा कायम, चुनाव आयोग सोया हुआ, जनता लाइन में लगी हुई, बिहार एक बार फिर वही कर रहा है जो वह दशकों से करता आया है। अपने भविष्य को अपने ही हाथों नीलाम कर देना।

* बिहार में जनादेश नहीं मशीनों, मैनेजमेंट और मैन्युफैक्चरिंग का खेल हुआ।

* वोट नहीं पड़े, वोट डाले गए डर, धमकी, लालच, योजनाओं और जातीय ठेके के दबाव में।

* जनता की भूमिका ‘मतदाता’ से घटकर सरकारी लाभ की सूची में नाम बचाने वाला दास हो गई।

* संविधान ने जनता को मालिक बनाया था, राशन ने उसे गुलाम बना दिया।

* अधिकारियों का एक संदेश वोट नहीं दिया तो नाम कट जाएगा पूरा चुनावी समीकरण तय कर देता है।

* आर्थिक ब्लैकमेल को वैध सरकारी योजना के रूप में पेश किया गया।

* यह गणित नहीं, चुनावी एडिटिंग है, जहां सीटें जनमत से नहीं, डेटा-इंजीनियरिंग से बनती हैं।

* मनुवादी व्यवस्था की वापसी आधुनिक अवतार में

* मुगल हों या अंग्रेज, किसी ने वर्णव्यवस्था नहीं छुआ आज वही व्यवस्था वोट-बैंक मशीन है।

* ब्राह्मण श्रेष्ठ, क्षत्रिय शासक, वैश्य धनवान, शूद्र सेवक
लोकतंत्र केवल कागज पर, व्यवहार में वही पुरानी सामाजिक गुलामी।

* दो लाख की योजना चुनाव से ठीक पहले आयोग ने कोई सवाल नहीं पूछा।

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