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एनटीपीसी और राखड़ ट्रांसपोर्टरों की मनमानी! स्थानीय निवासियों खराब हो रही जिंदगानी

जहरीली फ्लाई ऐश के गुबार में घुट रही जनता, आखिर कब जागेगा प्रशासन?

  • कलेक्टर के आदेश बेअसर, सड़कों पर राखड़ और घरों में प्रदूषण; विंध्यनगर से गनियारी तक लोगों की सेहत से खिलवाड़ के गंभीर आरोप
  • क्या राखड़ परिवहन करने वाले प्रत्येक वाहन की नियमित जांच की जा रही है?
  • क्या ओवरलोडिंग और बिना तिरपाल वाले वाहनों पर वास्तविक कार्रवाई होती है?
  • क्या नियम तोड़ने वाले ट्रांसपोर्टरों की पहचान कर उनके खिलाफ जुर्माना और अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा रही है?
  • क्या संबंधित विभागों ने यह जांच की है कि प्रशासनिक निर्देशों के बावजूद उल्लंघन क्यों जारी है?

विंध्यनगर/गहिलगढ़/तेलगावां। बिजली उत्पादन के नाम पर आखिर आम जनता को जहरीली धूल, जाम और बीमारियों का बोझ क्यों उठाना पड़े? विकास का उद्देश्य लोगों का जीवन बेहतर बनाना है, न कि उनकी सांसों पर संकट खड़ा करना। लेकिन एनटीपीसी शाहपुर राखड़ डैम से निकलने वाले फ्लाई ऐश लोड वाहनों को लेकर स्थानीय नागरिकों की शिकायतें एक गंभीर सवाल खड़ा कर रही हैं—क्या औद्योगिक व्यवस्था के सामने आम आदमी की सेहत और प्रशासनिक आदेशों की कोई कीमत नहीं रह गई है?
विंध्यनगर, गहिलगढ़, तेलगावां और गनियारी के रहवासी आरोप लगा रहे हैं कि राखड़ परिवहन में लगे ट्रक, हाइवा और ट्रेलर नियमों की अनदेखी करते हुए सड़कों पर दौड़ रहे हैं। नतीजा यह है कि हवा में उड़ती राखड़ घरों तक पहुंच रही है, सड़कों पर धूल की परत जम रही है और भारी वाहनों की आवाजाही से यातायात प्रभावित हो रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो रहा।
यह केवल धूल या जाम का मामला नहीं है। यह जनस्वास्थ्य, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल है।

कलेक्टर के आदेशों की अनदेखी, आखिर किसके संरक्षण में चल रही मनमानी?

जिला प्रशासन की ओर से फ्लाई ऐश परिवहन करने वाले वाहनों को ओवरलोड न चलाने और तिरपाल से पूरी तरह ढककर राखड़ ले जाने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई वाहन बिना ढके ही राखड़ लेकर गुजरते हैं। कुछ वाहनों से नीचे के खुले हिस्सों और किनारों से भी राखड़ सड़क पर गिरती रहती है।
सवाल यह है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो जिम्मेदारों की पहचान और कार्रवाई जरूरी है। केवल आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं; उनका जमीन पर पालन कराना ही प्रशासन की असली परीक्षा है।

हेमंत मीणा एक नम्बर का गुरुघण्टाल,ओवरलोडिंग से ट्रांसपोर्टरों से कमा रहा माल

सरकारी कर्मचारियों का पेट नही मराड़ होता है जो कभी नही भरता है।ऐसा ही एक जेई है नाम है हेमंत मीणा जो एनटीपीसी में कार्यरत है।पट्ठा एक नम्बर का गुरुघण्टाल है,इसने पूरा एक गैंग बनाया है जो कि ट्रांसपोर्टरों का है सबको ओवरलोड राखड़ दिलाता है अपना कमीशन भी लेता है।इसका एक भाई राजस्थान में भाजपा का विधायक है उसी के दम पर ये चोरकट चोट्टई वाला कुकर्म कर रहा है बड़ी हैरत की बात है कि इस बेशर्म को शर्म भी नही आ रही है।

 

घरों में राखड़ की मोटी परत, बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर खतरा

स्थानीय निवासियों का कहना है कि राखड़ लदे वाहन गुजरते हैं तो हल्की हवा चलने पर भी धूल उड़कर घरों के अंदर तक पहुंच जाती है। सुबह घरों के फर्श, आंगन और आसपास की सतहों पर राखड़ की परत दिखाई देती है। लोगों को अपने घरों और आसपास के क्षेत्र की सफाई बार-बार करनी पड़ती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोगों को लेकर है। लंबे समय तक हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के संपर्क में रहने से श्वसन संबंधी परेशानी बढ़ सकती है। हालांकि किसी विशेष बीमारी का कारण फ्लाई ऐश को ठहराने के लिए चिकित्सकीय जांच और पर्यावरणीय आंकड़ों की जरूरत होगी, लेकिन नागरिकों की शिकायतों को नजरअंदाज करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।
विकास दुबे, गहिलगढ़ के मुताबिक, राखड़ लदे वाहनों के गुजरने के बाद थोड़ी-सी हवा चलते ही राखड़ घरों के अंदर पहुंच जाती है। उनके अनुसार, सुबह घर के अंदर और बाहर तक राखड़ की मोटी परत जमी रहती है। उन्होंने सड़क पर राखड़ गिरने पर रोक लगाने की मांग की है।
अब सवाल यह है कि क्या संबंधित प्रबंधन ने प्रभावित बस्तियों में वायु गुणवत्ता की जांच कराई है? क्या लोगों की शिकायतों पर स्वास्थ्य विभाग की टीम भेजी गई? यदि नहीं, तो आखिर किसका इंतजार किया जा रहा है?

तिरपाल का खर्च बचाने की कीमत जनता क्यों चुकाए?

राखड़ परिवहन में तिरपाल का इस्तेमाल कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि उड़ती धूल और सामग्री के बिखराव को रोकने का एक जरूरी उपाय है। इसके बावजूद यदि वाहन बिना ढके चल रहे हैं, तो यह गंभीर लापरवाही का विषय है।
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ परिवहनकर्ता तिरपाल लगाने के खर्च से बचने के लिए नियमों की अनदेखी करते हैं। साथ ही, एनटीपीसी प्रबंधन के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों तथा परिवहनकर्ताओं के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बिना प्रमाण किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन आरोप गंभीर हैं तो उन्हें खारिज करके छोड़ देना भी जवाबदेही से बचने जैसा होगा।

  •  परिवहन के लिए लगाए गए वाहनों की सूची सार्वजनिक की जाए।
  •  प्रत्येक वाहन के तिरपाल, लोडिंग और ओवरलोडिंग संबंधी नियमों की जांच हो।
  •  उल्लंघन मिलने पर संबंधित ट्रांसपोर्टर और जिम्मेदार निगरानी अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
  •  शिकायतों के निस्तारण और कार्रवाई की स्थिति स्थानीय नागरिकों को बताई जाए।
  • जनता को आश्वासन नहीं, नियमों का पालन चाहिए।

सैकड़ों भारी वाहन और सड़कों पर जाम—आवागमन बना मुसीबत

स्थानीय लोगों के अनुसार, एनटीपीसी शाहपुर राखड़ डैम से प्रतिदिन बड़ी संख्या में ट्रक, हाइवा और ट्रेलर राखड़ लाने-ले जाने के लिए आते-जाते हैं। भारी वाहनों की लगातार आवाजाही से प्रभावित मार्गों पर जाम की स्थिति बनी रहती है।
इसका असर केवल वाहन चालकों पर नहीं पड़ता। स्थानीय निवासियों, कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और जरूरी काम से निकलने वाले नागरिकों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। यदि मार्गों पर धूल, बिखरी राखड़ और भारी यातायात एक साथ मौजूद हों, तो दुर्घटनाओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
शिवदयाल शाह, विंध्यनगर का आरोप है कि राखड़ परिवहन करने वाले वाहन ओवरलोड होकर निकलते हैं और उनमें लदी राखड़ को ठीक से ढका भी नहीं जाता। उनके मुताबिक, उड़ती राखड़ से बुजुर्गों और बच्चों को सांस संबंधी परेशानी होने की आशंका बनी रहती है।
प्रशासन को केवल ट्रकों की आवाजाही गिनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी देखना होगा कि परिवहन के कारण आम नागरिकों का दैनिक जीवन किस हद तक प्रभावित हो रहा है।

पानी के छिड़काव के नाम पर औपचारिकता क्यों?

राखड़ और धूल से प्रभावित सड़कों पर नियमित सफाई तथा जरूरत के मुताबिक पानी का छिड़काव धूल के उड़ने को कम करने में मदद कर सकता है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रभावित मार्गों पर पर्याप्त पानी का छिड़काव नहीं किया जाता और सफाई व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है।
अनुज मिश्रा, तेलगावां के अनुसार, राखड़ लदे वाहनों की आवाजाही के कारण मार्गों पर जाम बना रहता है। उनका आरोप है कि सफाई तो दूर, पानी का छिड़काव तक नियमित रूप से नहीं होता।
यदि धूल नियंत्रण की जिम्मेदारी संबंधित प्रबंधन की है, तो उसकी निगरानी भी होनी चाहिए। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन मार्गों पर कितनी बार पानी का छिड़काव होता है, सफाई कौन करता है और इसकी पुष्टि के लिए क्या रिकॉर्ड रखा जाता है।
कागजों में दर्ज व्यवस्था और जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति के बीच अंतर है या नहीं, इसकी जांच स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए।

 एनटीपीसी प्रबंधन की जवाबदेही तय हो

बिजली उत्पादन देश की जरूरत है, लेकिन औद्योगिक विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि आसपास रहने वाले लोगों को प्रदूषण और अव्यवस्था के बीच जीवन बिताने के लिए छोड़ दिया जाए। किसी भी बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान की जिम्मेदारी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होती। उसे लागू पर्यावरणीय नियमों, परिवहन मानकों और जनसुरक्षा संबंधी निर्देशों के पालन को भी सुनिश्चित करना चाहिए।
यदि प्रभावित इलाकों में शिकायतें लगातार मिल रही हैं, तो एनटीपीसी प्रबंधन को अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करनी चाहिए।

  •  क्या राखड़ परिवहन करने वाले वाहनों की निगरानी की जा रही है?
  •  क्या राखड़ डैम से निकलने वाले वाहनों के लिए निर्धारित मार्गों का पालन कराया जाता है?
  •  क्या प्रभावित सड़कों की नियमित सफाई और धूल नियंत्रण की व्यवस्था है?
  •  क्या स्थानीय नागरिकों की शिकायतों का रिकॉर्ड रखा जाता है और उनका समाधान किया जाता है?
  •  क्या प्रबंधन ने प्रभावित बस्तियों में वायु गुणवत्ता की जांच के लिए संबंधित पर्यावरणीय अधिकारियों से संपर्क किया है?
  • इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। यदि व्यवस्था में कमी पाई जाती है, तो उसे दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए।

जनता की सांसों से बड़ा कोई मुनाफा नहीं

विकास की असली कसौटी केवल बिजली उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों और परिवहन के आंकड़े नहीं हैं। यह भी है कि उस विकास के आसपास रहने वाले नागरिक कितनी सुरक्षित हवा में सांस ले पा रहे हैं, उनके बच्चे किस वातावरण में पल रहे हैं और उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है।
विंध्यनगर से गहिलगढ़ और तेलगावां से गनियारी तक उठ रही शिकायतें प्रशासन और एनटीपीसी प्रबंधन के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल कुछ वाहनों की लापरवाही नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की विफलता का भी मामला हो सकता है।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का आकलन करे, पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन की जांच कराए और जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे।

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