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एलआईसी द्वारा अडानी को दिए गए 32000 करोड़ पर देश मे बचा सवाल, मोदी जी के निष्ठा पर क्यो न उठे सवाल ?

 

● एलआईसी की अडानी पर सट्टेबाजी, जनता के भरोसे पर 32,000 करोड़ का जुआ?

● वाशिंगटन पोस्ट की ताजा रिपोर्ट से खुला सरकारी निवेश तंत्र का नया रहस्य

● सरकारी निर्देश या कॉरपोरेट रेस्क्यू मिशन

● विदेशी बैंक पीछे हटे, एलआईसी को क्यों आगे धकेला क्या यह निवेश या ‘उद्धार योजना’

● गरीब और मध्यमवर्ग की बीमा राशि से खेला गया 32,000 करोड़ का जोखिम

● सरकार की 96 फीसदी हिस्सेदारी वाले निगम में स्वतंत्र निर्णय कितना संभव

● नीति आयोग बना कॉरपोरेट निवेश योजना का सहभागी

● बीमा का मतलब अब सुरक्षा नहीं, सट्टा

● पॉलिसी धारकों और संसद दोनों को अंधेरे में रखकर हुआ 32,000 करोड़ रुपए का सौदा!

● एलआईसी जनता की सुरक्षा का नहीं, बड़े उद्योगपतियों की सुरक्षा का प्रतीक बनी

● लाइफ इंश्योरेंस से कॉरपोरेट इंश्योरेंस तक

 

पँचशील अमित मौर्य

 

वाराणसी/लखनऊ वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट ने एक बार फिर देश के सबसे बड़े बीमा संस्थान भारतीय जीवन बीमा निगम की निवेश नीति पर सवालों की झड़ी लगा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, एलआईसी ने अदाणी समूह की कंपनियों में जनता के पैसों से 32,000 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया, जबकि उस समय समूह के वित्तीय लेन-देन और बाजार साख पर पहले से ही गंभीर प्रश्नचिह्न थे। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब वित्तीय पारदर्शिता और कॉरपोरेट जवाबदेही भारत में पहले से ही बहस के केंद्र में हैं। याद रहे, 2023 में अमेरिकी शोध संस्था हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर स्टॉक में हेराफेरी और शेल कंपनियों के जरिए धन शोधन के आरोप लगाए थे। उस रिपोर्ट के बाद अडानी समूह के शेयर ध्वस्त हुए, और खुद एलआईसी का निवेश मूल्य कुछ ही हफ्तों में 60,000 करोड़ रुपए तक घट गया था।

जनता के पैसों से जोखिम का खेल

वाशिंगटन पोस्ट की नई रिपोर्ट के मुताबिक, एलआईसी ने अडानी समूह की कई कंपनियों में तब निवेश बढ़ाया जब विदेशी निवेशक दूरी बना रहे थे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह निवेश नीति-निर्देशित निर्णय था।
बीमा धारकों के प्रीमियम से बने फंड का उद्देश्य सुरक्षित और स्थाई लाभ देना है, न कि जोखिम भरे कॉरपोरेट दांव। बावजूद इसके एलआईसी ने अदाणी समूह में अपनी हिस्सेदारी को उस समय तक बनाए रखा, जब अधिकांश निजी और विदेशी निवेशक पीछे हट चुके थे। एलआईसी की हिस्सेदारी आज भी अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट्स, अडानी ट्रांसमिशन और अडानी टोटल गैस जैसी कंपनियों में बनी हुई है। एलआईसी ने हालांकि बयान जारी कर कहा कि निवेश नियामक दिशानिर्देशों के अनुरूप और दीर्घकालिक दृष्टि से किया गया है, लेकिन जानकारों की मानें तो यह जनता के पैसे से कॉरपोरेट बचाव योजना जैसा दिखता है।

अडानी-सरकार-एलआईसी त्रिकोण पर बढ़ते सवाल

एलआईसी में केंद्र सरकार की 96 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी है। ऐसे में निवेश निर्णयों पर सरकारी प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। विपक्षी दलों ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक यह मुद्दा फिर उठाया है कि क्या सरकार ने एलआईसी का उपयोग अडानी समूह को वित्तीय सहारा देने के लिए किया? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पहले ही यह सवाल उठाया था कि क्या प्रधानमंत्री और एलआईसी के बीच अडानी समूह को लेकर कोई अदृश्य डोर है। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट ने इस सवाल को एक बार फिर जिंदा कर दिया है।

पारदर्शिता बनाम राजनीतिक संरक्षण

रिपोर्ट में संकेत है कि वर्ष 2022-23 के दौरान एलआईसी ने अपने निवेश पोर्टफोलियो में अदाणी समूह का प्रतिशत लगभग दोगुना किया, जब कि विदेशी निवेशक समूह से लगातार बाहर निकल रहे थे। वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सार्वजनिक संस्थान को राजनीतिक संकेत पर निवेश करने के बजाय जोखिम मूल्यांकन और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी। अर्थशास्त्री की मानें तो एलआईसी जैसी संस्था के निवेश से करोड़ों लोगों की बचत जुड़ी है। अगर यह राजनीतिक संरक्षण के लिए इस्तेमाल होगी, तो वित्तीय संस्थाओं पर जनता का भरोसा डगमगा जाएगा।

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट का व्यापक असर

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के सामने आते ही भारतीय शेयर बाज़ार में अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में फिर हलचल देखी गई। वित्त मंत्रालय ने अब तक इस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि सूत्रों के अनुसार सेबी और वित्त मंत्रालय दोनों रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं, और आने वाले दिनों में इस पर संसद में बहस की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यह भी उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन पोस्ट ने इस रिपोर्ट में विदेशी निवेशकों के ईमेल, एलआईसी की वार्षिक रिपोर्टों और कॉरपोरेट शेयर होल्डिंग डेटा का तुलनात्मक विश्लेषण किया है।

जनधन पर कॉरपोरेट सट्टा किसकी जवाबदेही

देश के लगभग 30 करोड़ बीमा धारकों की बचत एलआईसी के पास है। यही वह वर्ग है जो आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा संवेदनशील भी है। ऐसे में, जब जनता के प्रीमियम को जोखिम भरे कॉरपोरेट निवेशों में लगाया जाता है, तो सवाल सिर्फ एलआईसी की वित्तीय नीति पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की बुनियाद पर उठता है। क्या एलआईसी अब भी ‘जनता का भरोसा’ है, या सरकार की नई कॉरपोरेट लॉन्ड्री मशीन। यह सवाल आने वाले महीनों में सिर्फ अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि लोकनीति और पारदर्शिता के भविष्य का भी इम्तिहान लेगा।

सार्वजनिक पूंजी का निजी इस्तेमाल

भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी के पास करीब 45 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कुल निवेश पोर्टफोलियो है। यह निवेश पॉलिसी धारकों के प्रीमियम से बनता है, जिनमें बहुसंख्यक ग्रामीण, निम्न-आय वर्ग और मध्यमवर्गीय लोग हैं। एलआईसी की निवेश नीति कहती है कि उसका 75 फीसदी निवेश सुरक्षित सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में रहेगा। लेकिन हाल के वर्षों में उसने धीरे-धीरे कॉरपोरेट बॉन्ड और निजी समूहों में हिस्सेदारी बढ़ाई है। वाशिंगटन पोस्ट की अक्टूबर 2025 की पड़ताल के अनुसार मई 2025 में सरकार के वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और एलआईसी के बीच एक समन्वित निवेश योजना बनी, जिसके तहत अडानी समूह के बॉन्ड में 3.4 अरब डालर (28,000 करोड़ रुपए) और उसकी सहायक कंपनियों की इक्विटी में 507 मिलियन डॉलर (4,200 करोड़ रुपए) निवेश का प्रस्ताव हुआ। कुल निवेश मूल्य लगभग 32,000 करोड़ रुपए का किया गया। यह निवेश अडानी समूह की अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड, अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड में किया गया। जो यह दर्शाता है कि सरकार-प्रेरित संस्थाओं द्वारा संकटग्रस्त कॉरपोरेट समूहों को बैक-डोर सपोर्ट देना। इससे न केवल सार्वजनिक संसाधन की पारदर्शिता पर प्रश्न उठता है, बल्कि राजनीतिक-कॉरपोरेट गठबंधन का स्वरूप भी सामने आता है।

बीमा-पॉलिसीधारकों पर प्रभाव

एलआईसी भारत के 40 करोड़ से अधिक पॉलिसी धारकों की कंपनी है। इन पॉलिसियों में जमा हर रुपया जनता की मेहनत की कमाई है। इस निवेश निर्णय का प्रत्यक्ष प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ सकता है। पहला जोखिम मूल्यांकन पर आघात। जिसके तहत बीमा कंपनी की निवेश नीति का मूल आधार न्यूनतम जोखिम और सुनिश्चित रिटर्न होता है। अडानी समूह के बॉन्ड और शेयरों में निवेश करना उच्च जोखिम वाला निवेश है, क्योंकि उसके शेयर-मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है। 2023 में हिन्डनबर्ग रिपोर्ट के बाद समूह के शेयर 60 फीसदी तक गिरे थे। यदि ऐसा फिर हुआ, तो एलआईसी के पोर्टफोलियो पर सीधा झटका पड़ेगा। दूसरा जन-भरोसे की गिरावट जिसका सीधा असर एलआईसी की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास है।

यदि जनता को यह लगे कि उनकी जमा पूंजी किसी राजनीतिक समीकरण या पूंजीपति-हित के लिए लगाई जा रही है, तो बीमा-बाजार में विश्वास का संकट पैदा होगा। इससे एलआईसी की नई पॉलिसियों की बिक्री और उसकी लंबी-अवधि की स्थिरता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। तीसरा संभावित घाटे का सामाजिक असर यदि निवेश पर घाटा हुआ, तो एलआईसी की सालाना बोनस और पॉलिसी रिटर्न घट सकती है। पॉलिसीधारक जो आम तौर पर किसान, शिक्षक, कर्मचारी, छोटा व्यापारी होता है उसका नुकसान होगा, जबकि अडानी जैसे कॉरपोरेट को राहत मिलेगी। यह जन-धन से जन-विरोधी राहत का मॉडल है।

पारदर्शिता, जवाबदेही और नीति संकट

सार्वजनिक निवेश की जवाबदेही जब सरकारी बीमा कंपनी किसी निजी समूह को इतना बड़ा निवेश देती है, तो उसकी जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए। क्या बोर्ड ने इसकी अनुमति दी, क्या संसद की वित्तीय समिति को जानकारी दी गई। आज तक इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं। एलआईसी और वित्त मंत्रालय दोनों ही टिप्पणी से इंकार की मुद्रा में हैं।

नीति आयोग और वित्त मंत्रालय की भूमिका

वाशिंगटन पोस्ट ने जो आंतरिक दस्तावेज बताए, उनमें नीति आयोग को योजना का सह-सहभागी बताया गया।
अगर यह सच है, तो यह सरकार की नीति-निर्माण और निवेश-निर्णय की रेखा मिटाने जैसा है। नीति आयोग जो सलाहकार निकाय है, उसने कारोबारी समूह के लिए निवेश सुझाव क्यों दिए।

राजनीतिक-कॉरपोरेट समीकरण का विस्तार

अडानी और मोदी के रिश्तों पर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। अब अगर एलआईसी जैसा सार्वजनिक संस्थान इस कड़ी में जुड़ा दिखे, तो यह सिर्फ वित्तीय नहीं राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस और सीपीएम जैसे दल इसे पॉलिसी धारकों का पैसा सत्ता-संबंधी उद्योगों में झोंकने की साजिश कह रहे हैं।

आर्थिक प्रणाली के लिए सबक

यह मामला इस सदी के भारत के लिए एक चेतावनी है। अगर सार्वजनिक संस्थान भी कारपोरेट राहत-तंत्र बन जाए, तो लोकतंत्र आर्थिक रूप से कारपोरेट तंत्र पर निर्भर हो जाएगा। ऐसे में भविष्य में आवश्यकता होगी कि एलआईसी और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थानों के निवेश की ऑडिट रिपोर्ट संसद के सामने रखी जाए।
पॉलिसी धारकों को अपने फंड के निवेश-विवरण का अधिकार मिले। सरकार और कॉरपोरेट के बीच वित्तीय दूरी सुनिश्चित की जाए।

यह केवल एक सौदा नहीं, व्यवस्था का आईना

अडानी-एलआईसी प्रकरण ने भारत की वित्तीय लोकतंत्र व्यवस्था की आत्मा को झकझोर दिया है। अगर वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट पूरी तरह सत्य नहीं भी मानी जाए, तब भी सवाल उठता है कि क्यों एलआईसी के निवेश बार-बार उन्हीं कॉरपोरेट्स की दिशा में जाते हैं जो सरकार के विकास-ब्रांड से जुड़े हैं। जनता के पैसों से ‘बड़े आदमी’ की लाचारी मिटाना, विकास नहीं विकृत अर्थशास्त्र है। एलआईसी का अस्तित्व लाइफ इंश्योरेंस है, न कि कॉरपोरेट इंश्योरेंस।

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