गाजीपुर पुलिस के लाठचार्ज से चली गयी दिव्यांग युवक की जान,खाकी का पुनःगिरा सम्मान

पुलिसिया बर्बरता जब रक्षक ही बन जाए भक्षक
आम आदमी का डर रक्षक से भक्षक बनी पुलिस
गाजीपुर की सच्चाई विकलांग सीताराम को लाठियों ने निगल लिया
‘ठोक डालो’ नीति ने दिया बर्बरता को वैधता
सत्ता की ढाल में बेलगाम पुलिस ने न्याय का गला घोंटा
निर्दोष की लाश पर अफसरों का इंकार व मामले की लीपापोती
कानून-न्यायपालिका की खामोशी लोकतंत्र की रीढ़ पर वार
सस्पेंशन नहीं, बर्खास्तगी और उम्रकैद ही है असली सुधार
जनता की सुरक्षा से जनता की जान तक पुलिस बनी खतरा

हमारा संविधान कहता है कि पुलिस आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए है। लेकिन हकीकत इसके उलट है। देश का शायद ही कोई राज्य बचा हो जहां पुलिस ने अपने दायित्व की मर्यादा निभाई हो। कभी निर्दोषों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया जाता है, कभी फर्जी केसों में जेल भेज दिया जाता है और कभी ‘ठोक डालो’ की नीति के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों में जिंदगी छीन ली जाती है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हालिया घटना ने एक बार फिर इस सड़े-गले पुलिस तंत्र की कलई खोल दी है। जहां थाने के सामने न्याय की आस लिए बैठे विकलांग व्यक्ति सीताराम उपाध्याय को पुलिस की बर्बर लाठियों ने मौत की नींद सुला दिया। सवाल है कि जब इंसाफ मांगने पर मौत मिल रही हो, तो आम आदमी आखिर जाए कहां।
पुलिस जनता की रक्षक या दमनकारी
पुलिस विभाग की स्थापना इस उद्देश्य से हुई थी कि आम जनता अपराध से सुरक्षित रह सके, पीड़ित को त्वरित न्याय मिले और समाज में कानून-व्यवस्था कायम रहे। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि गरीब और कमजोर व्यक्ति थाने जाने से डरता है। लोगों का मानना है कि पुलिस अपराधी से कम खतरनाक नहीं है। थाने की दहलीज पार करते ही पीड़ित को एहसास होता है कि बिना जुगाड़, पैरवी या मोटी रकम के उसकी सुनवाई संभव ही नहीं। यही कारण है कि हजारों मामले कभी दर्ज ही नहीं होते। पुलिस उस ‘सुरक्षा कवच’ की बजाय एक ऐसे ‘दमनकारी औजार’ में बदल गई है जो सत्ता और पैसे वालों की गुलामी करती है।
विकलांग सीताराम की जिंदगी लाठियों में कुचल गई
गाजीपुर जिले के नोनहरा थाना क्षेत्र में बिजली के खंभे लगाने को लेकर विवाद था। ग्रामवासी कई बार थाना गए लेकिन सुनवाई नहीं हुई। आरोप है कि पुलिस ने एक पक्ष से पैसा खा लिया था, इसलिए बार-बार फरियाद करने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार ग्रामीणों ने थाने के सामने धरना देना शुरू किया। दिन भर भूखे-प्यासे लोग शांति से बैठे रहे। शाम ढलते ही इंस्पेक्टर आए और धरना खत्म करने का आदेश दिया। ग्रामीणों के इनकार करने पर वे गुस्से में चले गए। कुछ देर बाद थाने की लाइटें बुझा दी गईं और पुलिस ने चारों ओर से घेरकर ग्रामीणों पर बर्बर लाठियाँ बरसानी शुरू कर दीं। भागते-भागते कई लोग बच निकले, पर विकलांग सीताराम उपाध्याय कहां जा पाते। वह पुलिस की बर्बरता का शिकार हुए। इतनी लाठियां बरसीं कि शरीर खून से सन गया। जब ग्रामीण उन्हें अस्पताल ले जाने लगे तो पुलिस ने रास्ते में ही गाड़ी रोक दी। आखिरकार सीताराम ने वहीं दम तोड़ दिया। इंसाफ की आस में बैठे एक विकलांग को उत्तर प्रदेश पुलिस ने मौत का तोहफा दिया।
‘ठोक डालो’ संस्कृति पुलिसिया आतंक का वैधकरण
यूपी की मौजूदा सरकार ने अपराधियों के खिलाफ ‘ठोक डालो’ नीति की बात खुलेआम कही थी। मुख्यमंत्री के बयान ने पुलिस को मनमानी का लाइसेंस दे दिया। अपराधी कौन है और निर्दोष कौन इसका फैसला अदालत को करना था, लेकिन पुलिस खुद ही जज, ज्यूरी और जल्लाद बन बैठी। सैकड़ों कथित मुठभेड़ों में लोग मारे गए, जिनमें बाद में कई निर्दोष निकले। यही मानसिकता आज हर थाने में उतर चुकी है। सीताराम उपाध्याय की मौत इसी संस्कृति की उपज है। जहां कानून का राज नहीं, बल्कि लाठी का राज चलता है।
सत्ता और पुलिस का अटूट गठजोड़
हर सरकार पुलिस सुधार की बातें करती है, लेकिन कोई भी सरकार पुलिस को जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाती। क्योंकि पुलिस ही वह औजार है जिससे सत्ताधारी दल विरोधियों को कुचलता है, विरोध प्रदर्शन दबाता है और सत्ता की हनक दिखाता है। यही कारण है कि पुलिस पर कठोर कार्रवाई कभी नहीं होती। किसी घटना के बाद औपचारिकता के तौर पर एक-दो सिपाही या इंस्पेक्टर को सस्पेंड कर दिया जाता है, लेकिन असली दोषी कभी जेल नहीं जाते। यही सत्ता-पुलिस गठजोड़ है जो आज लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।
निर्दोष की मौत, और अफसरों का इंकार
गाजीपुर कांड में भी यही हुआ। जब ग्रामीणों ने विकलांग की मौत पर सवाल उठाए तो आला अफसरों ने पहले तो घटना से ही इनकार कर दिया। बाद में दबाव बढ़ा तो मामले को दबाने की कोशिश की गई। यह रवैया नया नहीं है। देशभर में पुलिसिया हिंसा के हर केस में यही पैटर्न दोहराया जाता है। पहले इंकार, फिर लीपापोती और अंत में दोषी को बचाने का खेल। सवाल यह है कि जब जांच करने वाले भी उसी विभाग के लोग हों, तो निष्पक्षता कैसे संभव है।
कानून और न्यायपालिका की चुप्पी
भारत के संविधान ने हर नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। लेकिन जब पुलिस ही उस जीवन को छीन ले और अदालतें चुप रहें तो न्याय का क्या अर्थ रह जाता है? पुलिस कस्टडी में मौतें और फर्जी मुठभेड़ें लगातार बढ़ रही हैं। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन की रिपोर्टें भी इस पर चेतावनी देती हैं, लेकिन न तो अदालतें सख्ती दिखाती हैं और न ही संसद। आम जनता न्यायपालिका से उम्मीद करती है कि वह इन घटनाओं पर स्वतः संज्ञान ले, परंतु अधिकांश मामलों में चुप्पी साध ली जाती है।
सिर्फ सस्पेंशन से नहीं होगा सुधार
आज हाल यह है कि किसी बड़ी घटना के बाद दोषी पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया जाता है। कुछ दिन बाद वही बहाल हो जाते हैं और फिर से उसी तरह की हरकतें करते हैं। यह प्रक्रिया सिर्फ दिखावे की है। जब तक कठोर दंड का प्रावधान नहीं होगा—जैसे दोषी पुलिसकर्मी की नौकरी से बर्खास्तगी और हत्या जैसे मामलों में आजीवन कारावास तब तक सुधार असंभव है। पुलिस सुधार पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश भी आज तक लागू नहीं हुए। राजनीतिक दल जानबूझकर इन्हें ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।
जनता की सुरक्षा बनाम जनता की जान का खतरा
विडंबना यह है कि जिस पुलिस विभाग को जनता की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, वही आज जनता की जान के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। आम आदमी अपराधी से जितना डरता है, उतना ही पुलिस से भी डरता है। गाजीपुर की घटना ने इस डर को और मजबूत किया है। सवाल सिर्फ सीताराम उपाध्याय की मौत का नहीं, सवाल है उस पूरी व्यवस्था का जिसने पुलिस को बेलगाम और जनता को असहाय बना दिया है। अगर अब भी कठोर कदम नहीं उठाए गए तो पुलिसिया बर्बरता लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ देगी। गाजीपुर का कांड देश के लिए चेतावनी है। जब विकलांग इंसाफ की आस में पुलिस थाने के सामने बैठा हो और उसी पुलिस की लाठियाँ उसकी जान ले लें, तो यह लोकतंत्र की मौत है। सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन जब तक पुलिस जवाबदेह नहीं बनेगी, तब तक निर्दोषों की लाशें गिरती रहेंगी। यह समय है कि सरकारें सिर्फ बयानबाज़ी छोड़कर कठोर कानून बनाए। ऐसा कानून जिसमें दोषी पुलिसकर्मी को बर्खास्तगी से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो। वरना पुलिस का यह बेलगाम आतंक आम जनता को न्याय से वंचित करता रहेगा।
* पुलिस को जनता की रक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन वह शोषणकारी औजार बन गई।
* गाजीपुर में विकलांग सीताराम उपाध्याय को पुलिस लाठियों ने मौत के घाट उतार दिया।
* ठोक डालो नीति ने पुलिस को मनमानी का लाइसेंस दिया।
* सत्ता और पुलिस का गठजोड़ दोषियों को बचाता है।
* आला अफसर हमेशा इन घटनाओं से इनकार कर दोषियों को ढाल बनाते हैं।
* न्यायपालिका और कानून की चुप्पी ने हालात को और गंभीर बना दिया है।
* सिर्फ निलंबन नहीं, बल्कि बर्खास्तगी और उम्रकैद जैसी सख्त सजा जरूरी।
* अगर कठोर सुधार नहीं हुए, तो पुलिसिया बर्बरता लोकतंत्र की जड़ें हिला देगी।




