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झूठ के पंख, सरकार की मेहरबानी, इंडिगो की मनमानी, मोदी सरकार का उतर गया “पानी”

इंडिगो ने सरकार को बताया 403 विमान, हकीकत में सिर्फ 344

● झूठ के पंख, सरकार की मेहरबानी, इंडिगो की मनमानी, मोदी सरकार का उतर गया “पानी”

● इंडिगो ने सरकार को बताया 403 विमान, हकीकत में सिर्फ 344

● पायलटों की भारी कमी के बावजूद विंटर शिड्यूल को मिली मंजूरी

● 60 फीसदी से ज्यादा हवाई मार्गों पर कब्जे के बाद भी जवाबदेही शून्य

● फ्लाइट कैंसिल, जॉइनिंग मिस, लाखों का नुकसान यात्री बेहाल

● दिसंबर में 6 दिन, 5 हजार से ज्यादा उड़ानें स्थगित

● मुनाफे के लालच में 900 पायलटों की भर्ती टाली

● डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय की संदिग्ध चुप्पी

● इलेक्टोरल बॉन्ड के 34 करोड़ और सरकारी नरमी का रिश्ता?

 

नैमिष प्रताप सिंह

लखनऊ के अजय कुमार का कुवैत पहुंचना सिर्फ एक उड़ान का मामला नहीं था, बल्कि यह उस भरोसे की परीक्षा थी जो एक आम नागरिक देश की सबसे बड़ी एयरलाइन और उसके पीछे खड़ी सरकार पर करता है। अजय ने न कोई सट्टा खेला था, न किस्मत आजमाई थी। उसने नियम के मुताबिक टिकट खरीदा, एजेंसी को दो लाख रुपये एडवांस दिए और अपने बेहतर भविष्य की तैयारी की। लेकिन इंडिगो एयरलाइंस की मनमानी ने उसके सपनों को रनवे पर ही कुचल दिया। फ्लाइट कैंसिल, कनेक्टिंग फ्लाइट भी रद्द और नतीजा न नौकरी, न पैसा, न कोई जवाबदेही। यह कहानी अपवाद नहीं है, यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कॉरपोरेट मुनाफा इंसानी जिंदगियों से बड़ा हो चुका है। भारत के 60 फीसदी से अधिक हवाई मार्गों पर कब्जा जमा चुकी इंडिगो अब सिर्फ एक एयरलाइन नहीं, बल्कि एकाधिकार की ताकत बन चुकी है। यह ताकत यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा या भरोसे के लिए नहीं, बल्कि बिना तैयारी उड़ानें बेचने, बिना जवाबदेही उन्हें रद्द करने और बिना शर्म सरकारी संस्थाओं को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल हो रही है। दिसंबर की शुरुआत में लगातार छह दिनों तक पांच हजार से अधिक उड़ानों का स्थगित होना किसी तकनीकी खराबी का नतीजा नहीं था। यह एक सोची-समझी लापरवाही थी, जिसे सरकार और नियामक संस्थाओं ने या तो देखा नहीं, या देखना नहीं चाहा। सबसे गंभीर और खतरनाक तथ्य यह है कि इंडिगो ने सरकार और डीजीसीए के सामने अपने पास मौजूद विमानों की संख्या को लेकर खुला झूठ बोला। कंपनी ने दिसंबर के ऑपरेशन प्लान में 403 उड़ने लायक विमानों का दावा किया, जबकि हकीकत में उसके बेड़े में सिर्फ 344 विमान हैं। यानी कागजों में आसमान भरा हुआ, जबकि रनवे पर हकीकत नंगी खड़ी है। सवाल यह नहीं कि एक निजी कंपनी ने झूठ क्यों बोला सवाल यह है कि देश की नागरिक उड्डयन व्यवस्था का प्रहरी कहलाने वाला तंत्र इस झूठ को कैसे निगल गया? इंडिगो ने क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों के दौरान रोजाना 2300 उड़ानें चलाने का दावा किया और सरकार ने इसे आंख मूंदकर मंजूरी दे दी। क्या नागरिक उड्डयन मंत्रालय और डीजीसीए के पास यह जांचने की क्षमता नहीं है कि किसी एयरलाइन के पास कितने विमान हैं, कितने पायलट हैं और वह कितनी उड़ानें सुरक्षित रूप से चला सकती है? या फिर यह वही नरम शासन है, जिसमें कॉरपोरेट झूठ सत्ता की छतरी के नीचे सच में बदल दिया जाता है? यह नरमी यूं ही नहीं है। इंडिगो के बोर्ड में सरकार और कॉरपोरेट जगत से रिटायर हुए कई आला अफसर मौजूद हैं। यही नहीं, इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए सत्ताधारी दल को दिए गए करोड़ों रुपये इस पूरी कहानी को और संदिग्ध बना देते हैं। जब नियामक, सरकार और कॉरपोरेट एक ही घेरे में खड़े दिखाई दें, तो पीड़ित यात्री के पास जाने के लिए कोई दरवाजा नहीं बचता। यह सिर्फ एविएशन सेक्टर का संकट नहीं है। यह उस राजनीतिक-कॉरपोरेट गठजोड़ का उदाहरण है, जिसमें मुनाफा पहले और नागरिक बाद में आते हैं। अजय कुमार जैसे लोग इस गठजोड़ के लिए सिर्फ आंकड़े हैं। एक कैंसिल फ्लाइट, एक रिफंड रिक्वेस्ट और एक बंद होता कॉल सेंटर। सवाल यह है कि क्या भारत के आसमान पर उड़ने का हक अब सिर्फ कंपनियों के पास रह गया है, और आम नागरिक के हिस्से में सिर्फ धोखा, नुकसान और चुप्पी?

एक यात्री की त्रासदी, सिस्टम की असलियत

अजय कुमार को बुधवार को कुवैत में ज्वॉइन करना था। उसने लखनऊ से मुंबई-कुवैत का टिकट इंडिगो से लिया। रविवार को लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचते ही पता चला कि मुंबई की फ्लाइट कैंसिल है। इससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब मुंबई से कुवैत की कनेक्टिंग फ्लाइट भी रद्द निकली। नतीजा ज्वाइनिंग मिस, एजेंसी को दिया गया दो लाख रुपये एडवांस डूबा और भविष्य अंधेरे में। यह कहानी इसलिए अहम है क्योंकि इंडिगो के कैंसिलेशन सिर्फ घरेलू यात्रियों तक सीमित नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिंग फ्लाइट्स के रद्द होने से रोजगार, पढ़ाई और इलाज से जुड़े हजारों लोग प्रभावित हो रहे हैं।

60 फीसदी बाजार पर कब्जा, लेकिन जिम्मेदारी नदारद

इंडिगो ने पिछले नौ वर्षों में भारत के एविएशन मार्केट में अपनी हिस्सेदारी 40 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी कर ली। इतने बड़े बाजार नियंत्रण के बाद उससे सबसे ज्यादा अपेक्षा की जाती है। लेकिन वही कंपनी सबसे ज्यादा उड़ानें रद्द कर रही है। दिसंबर की शुरुआत में छह दिन तक रोजाना सैकड़ों उड़ानें रद्द हुईं। कुल मिलाकर पांच हजार से ज्यादा फ्लाइट्स स्थगित की गईं। यात्रियों को न तो समय पर सूचना मिली, न वैकल्पिक व्यवस्था।

सरकार को बताया 403 विमान, असलियत 344

सबसे सनसनीखेज तथ्य यह है कि इंडिगो ने डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सामने दिसंबर के लिए 403 उड़ने लायक विमानों का दावा किया। जबकि वास्तविकता यह है कि कंपनी के पास कुल 344 विमान ही हैं। यानी कागजों में आसमान, हकीकत में जमीन। कंपनी ने क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों को देखते हुए रोजाना 2300 उड़ानें चलाने का दावा किया। सरकार ने इस दावे को बिना ठोस सत्यापन के मंजूरी दे दी। सवाल यह है कि क्या मंत्रालय और डीजीसीए के पास यह जांचने की क्षमता नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

पायलटों की भारी कमी

इंडिगो के पास इस समय करीब 5038 पायलट हैं। सामान्य संचालन के लिए भी कंपनी को कम से कम 900 अतिरिक्त पायलटों की जरूरत है। इसके बावजूद भर्ती नहीं की गई। 2019-20 में भारत के कुल कमर्शियल पायलटों में इंडिगो का हिस्सा 45 फीसदी था। चार साल बाद यह घट गया, जबकि उड़ानों की संख्या 51 फीसदी तक बढ़ गई। यह असंतुलन हादसों और कैंसिलेशन की जड़ है।

मुनाफा पहले, सुरक्षा बाद में

2023-24 में इंडिगो ने पायलटों की सैलरी और भत्तों पर 31,217 मिलियन रुपये खर्च किए। औसतन 62 लाख रुपये प्रति पायलट। 900 नए पायलट रखने पर कंपनी को 5500 मिलियन रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ते, जो उसकी कुल आय का सिर्फ 6 से 8 फीसदी है।
72.5 बिलियन रुपये की सालाना आय वाली कंपनी के लिए यह रकम कोई बड़ी नहीं, लेकिन मुनाफे की भूख ने यात्रियों की जिंदगी दांव पर लगा दी।

नाराज पायलट, घटते भत्ते

कंपनी के भीतर भी हालात बेहतर नहीं हैं। कई पायलटों का प्रमोशन लंबित है, भत्तों में कटौती हुई है और असंतोष बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में नए पायलटों का इंडिगो ज्वॉइन करना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले एक साल तक यह संकट खत्म होने की संभावना नहीं है।

डीजीसीए और सरकार की भूमिका

डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को हर एयरलाइन की पायलट संख्या, विमानों और उड़ानों की जानकारी होती है। इसके बावजूद विंटर शिड्यूल को मंजूरी देना संदेह पैदा करता है। कई जानकार इसे इंडिगो द्वारा बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए दिए गए 34 करोड़ रुपये के दान से जोड़कर देख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या कॉरपोरेट चंदा नियामक नरमी की कीमत बन चुका है? अगर हालात नहीं बदले, तो फ्लाइट कैंसिलेशन का यह सिलसिला जारी रहेगा। अजय कुमार जैसे हजारों लोग अपने सपने, नौकरी और पैसे गंवाते रहेंगे। यह सिर्फ इंडिगो की कहानी नहीं, यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां सरकार, नियामक और कॉरपोरेट एक साथ खड़े दिखते हैं और आम यात्री अकेला।

* इंडिगो ने विमानों की संख्या को लेकर सरकार को किया गुमराह
* पायलटों की कमी के बावजूद उड़ानों का विस्तार
* मुनाफे के लालच में भर्ती से परहेज
* डीजीसीए और मंत्रालय की संदिग्ध चुप्पी
* यात्रियों का आर्थिक और मानसिक नुकसान
* इलेक्टोरल बॉन्ड और सरकारी नरमी पर सवाल
* भविष्य में और उड़ानें रद्द होने की आशंका
* एविएशन सेक्टर में जवाबदेही का संकट

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