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देश के संसाधन अंबानी-अडानी की जागीर, खुली आँखों से देखकर भी चुप है मोदी जैसा “फ़क़ीर”

जनता बस देखने की हकदार,आम आदमी को उल्लू बना रही मोदी सरकार

● देश के संसाधन अंबानी-अडानी की जागीर,
खुली आँखों से देखकर भी चुप है मोदी जैसा “फ़क़ीर”

● जनता बस देखने की हकदार,आम आदमी को उल्लू बना रही मोदी सरकार

● जब गैस भी ‘माइग्रेट’ होती है, पर सरकार माइग्रेट नहीं होती चुप्पी स्थायी

● केजी बेसिन जहां सीमा रेखा नहीं, गैस की दिशा तय करती है किसका राज चलेगा

● ओएनजीसी रोई, रिलायंस हंसी और सरकार कहती रही सब ठीक

● वर्ष 2014 जनता चुनाव में व्यस्त, गैस चोरी फाइलों में व्यस्त

● समितियां बनी, रिपोर्टें आईं, नुकसान गिना गया पर सिस्टम वही पुराना, मालिक नया

● अंतरराष्ट्रीय पंचाट में ‘विदेशी’ न्याय भी घर के रिश्तों के आगे फेल

● दिल्ली हाईकोर्ट ने झटका दिया, बॉम्बे हाईकोर्ट ने नोटिस भेजा, मीडिया का घुटनों पर बैठकर मौन व्रत

● देश की गैस, देश का नुकसान पर फायदा ‘निजी’ और जवाबदेही ‘सार्वजनिक’

 

नैमिष प्रताप सिंह

 

लखनऊ: देश की राजनीति में सांस तक सरकार की है, और गैस वो तो ठेके पर है, पूछिए मत पूंजीपतियों को। ऐसा नहीं कि हमने सुना हो, यह तो अदालतों ने बताया है। पर चमत्कार देखिए कि अरबों डॉलर की गैस चोरी के आरोप पर देश की सत्ता ऐसी चुप बैठी है जैसे मामला गैस का नहीं, किसी के घर से दो नींबू गायब होने का हो।
कानून कहता है राष्ट्रीय संसाधन जनता के हैं। लेकिन व्यवहार कहता है इन संसाधनों का पहला हक होता है राष्ट्रीय हित में निजी क्षेत्र का, और निजी क्षेत्र कौन? वही दो चार नाम, जिनके नाम लेने भर से पूरी सरकारें संतुलन खो देती हैं। सोचिए देश की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी कहती है कि रिलायंस ने हमारे ब्लॉक से गैस चुराई, और सरकार कहती है कि समिति बनाओ, रिपोर्ट मंगाओ, आगे देखेंगे। मतलब चोरी पकड़ने के बाद भी सरकार अपने आप से पूछ रही है कि चोरी हुई भी या नहीं! एक तरफ रिपोर्ट कहती है कि 11,000 करोड़ की गैस रिलायंस के पास चली गई। ओएनजीसी का नुकसान 30,000 करोड़ से अधिक बताया गया। दूसरी तरफ, मोदी सरकार अदालतों में जोर नहीं लगाती, अंतरराष्ट्रीय पंचाट स्वीकार करती है, और फिर भी मीडिया इतना शांत कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। ऐसा मौन तो महात्मा बुद्ध का भी नहीं रहा होगा! अब जब हाईकोर्ट ने 2025 में सीबीआई को नोटिस जारी किया चोरी, षड्यंत्र, मिलीभगत, सब कुछ सामने है। फिर भी प्रधानमंत्री से लेकर प्रवक्ता तक सब इस तरह चुप हैं जैसे गोदावरी बेसिन में गैस नहीं, गंगा की रेत में ‘मूनलाइट डिनर’ खोज रहे हों। यह लोकतंत्र के उस पतन का पोस्टमार्टम है, जहां जनता बिजली का बिल भरती है और गैस का मालिकाना हक़ ऊपर वाले तय करते हैं। ऊपर वाले मतलब ऊपर बैठे पूंजीपति, ऊपर बैठे सत्ता वाले, और ऊपर बैठी चुप्पी।

जमीन सरकार की, गैस कुछ लोगों की

कृष्णा-गोदावरी बेसिन देश का एक ऐसा ऊर्जा केंद्र जहां कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का अथाह भंडार है। यह देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का आधार बन सकता था, लेकिन यहां खेल कुछ और ही खेला गया। 1997–98 में जब नई अन्वेषण लाइसेंसिंग नीति लाई गई थी, कहा गया कि सरकारी और निजी क्षेत्र को बराबर अवसर मिलेंगे। लेकिन भारत में बराबरी और नीति दो शब्द हैं जिन्हें हम किताबों में तो पढ़ते हैं, जमीन पर नहीं देखते।

नीति लागू हुई, रिलायंस प्रवेश कर गया। और यहीं से शुरू होता है वो खेल, जिसने देश की गैस की दिशा और उसकी गति दोनों ही बदल दीं। ओएनजीसी पहले से खुदाई कर रहा था, और गैस निकल रही थी। रिलायंस ने पास के ब्लॉक में काम शुरू किया और कुछ समय बाद घोषणा कर दी कि उन्हें भी करोड़ों घन मीटर गैस रोजाना मिलने लगी है। शेयर मार्केट, निवेशक सभी खुश, रिलायंस अति-आनंदित। लेकिन समस्या थी जमीन तो अलग-अलग थी, पर गैस… वह तो बाउंड्री फेंसिंग देखकर नहीं रुकती।

2011 गैस गिरनी शुरू, असल खेल खुलना शुरू

रिलायंस ने जितना दावा किया था, उत्पादन इतना आया नहीं। अचानक गैस प्रोडक्शन गिर गया। सरकार ने कहा गैर–प्राथमिक क्षेत्रों को गैस मत दो! रिलायंस ने कहा माफ कीजिए, हम ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि रिलायंस के साथ इस्पात उद्योग और कुछ बड़े उद्योगपति खड़े हो गए थे। उद्योगपतियों का दबाव, रिलायंस का वित्तीय हित, और सरकार का… खैर, सरकार का तो समझौता सूत्र चलता ही रहता है। ओएनजीसी को भनक, और फिर 2014 चुनाव के एक दिन पहले बम फूटता है। 2013 में ओएनजीसी को संदेह होना शुरू हुआ कि गैस कहीं और जा रही है। फिर आया 15 मई 2014 देश चुनाव परिणाम का इंतजार कर रहा था। उसी दिन ओएनजीसी दिल्ली हाईकोर्ट में ऐतिहासिक मुकदमा दायर करता है कि रिलायंस ने चोरी की है। यह सिर्फ आरोप नहीं था। इसमें सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया गया था।
ओएनजीसी ने कहा कि हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय और मंत्रालय की मिलीभगत से यह चोरी हुई। मतलब सीधा आरोप रिलायंस + सरकार = गैस चोरी वो भी चुनाव के ठीक पहले। अगर कोई और देश होता, तो चुनाव अभियान में भूकंप आ जाता। परन्तु भारत में शांत, मौन, मीडिया योग दिवस की कवरेज में व्यस्त था।

सरकार का पहला कदम 9 दिन में मामले की चिता ठंडी कर दी गई

23 मई 2014 को मोदी सरकार बनी। पहली ही बैठक में तय हुआ कि समिति बनाओ। रिलायंस, ओएनजीसी और मंत्रालय तीनों पक्षों की समिति बनाई गई। मजेदार बात जिस पर आरोप वही समिति में। जिसने चोरी की शिकायत की वह भी समिति में। जिसके ऊपर मिलीभगत का आरोप था वह भी समिति में। अगर चोर, पीड़ित और पुलिस तीनों मिलकर जांच करेंगे, तो नतीजा क्या आने वाला है?

चोरी साबित पर सजा नहीं, बल्कि नया इनाम!

समिति ने अमेरिकी कंपनी डीगोलियर और मैकनॉटन को जांच सौंपी। हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय और मंत्रालय ने रिपोर्ट दी कि 11,000 करोड़ रुपये की ओएनजीसी की गैस, रिलायंस के ब्लॉक में गई है। लेकिन साथ ही मास्टरस्ट्रोक मारा कि बची गैस भी रिलायंस से ही निकलवा ली जाए, क्योंकि उनका अनुभव ज्यादा है। मतलब चोरी साबित, और सजा इनाम के रूप में और काम दो!

जस्टिस ए.पी.शाह समिति ने सच को कागज पर उतार दिया

जस्टिस शाह समिति ने साफ कहा कि रिलायंस अनुचित लाभ में रहा है। उसे सरकार को 1.55 अरब डॉलर (लगभग 13 हजार करोड़) भरना चाहिए। यानी एक सेवानिवृत जज ने स्पष्ट कहा कि रिलायंस ने लाभ उठाया है, चोरी हुई है, भुगतान करो। अब था दो बातें थी। फैसला कठोर था, प्रमाण ठोस थे, ओएनजीसी का नुकसान साफ दिख रहा था। परन्तु सरकार ने दबाव झेलने के बजाय…रिलायंस का अंतरराष्ट्रीय पंचाट में जाने का फैसला स्वीकार कर लिया! किस आधार, किस तर्क पर यह कोई नहीं जानता। जनता यह जरूर जानती है कि आम नागरिक अगर बीएसएनएल का 200 रुपए का बिल न भरे तो कनेक्शन कट जाता है, पर किसी कॉर्पोरेट पर 1.55 अरब डॉलर का आरोप हो तो सरकार उसे पंचाट में भेज देती है।

अंतरराष्ट्रीय पंचाट: कानून नहीं, कॉर्पोरेट लॉजिक चला

सिंगापुर में लॉरेंस बू की अध्यक्षता में पंचाट हुआ और निर्णय 2-1 से रिलायंस के पक्ष में। कारण यह कहीं नहीं लिखा कि माइग्रेटेड गैस निकालना गलत है। मतलब चोरी है लेकिन चोरी को परिभाषित नहीं किया गया, इसलिए चोरी नहीं। अगर यही तर्क आम लोगों पर लागू हो जाए तो देश की जेलें खाली हो जाएंगी।

दिल्ली हाईकोर्ट से वर्ष 2023 में राहत, वर्ष 2025 में बड़ा झटका

मई 2023 में सिंगल बेंच ने रिलायंस के पक्ष में निर्णय दिया। सरकार खुश हुई कि नहीं मालूम नहीं पर रिलायंस बहुत खुश। लेकिन फरवरी 2025 में बड़ा पलटवार हुआ जस्टिस रेखा पल्लि और सौरभ बनर्जी की डिवीजन बेंच ने कहा कि 2018 का पंचाट फैसला भारत की सार्वजनिक नीति के खिलाफ है, इसे खारिज किया जाता है। यानि जो ओएनजीसी कह रहा था, जो शाह समिति कह रही थी, जो हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय कह चुकी थी, वही सब अदालत ने भी मान लिया। चोरी साबित, नुकसान साबित और अब वसूली की प्रक्रिया भी तय। सरकार ने फ्रेश डिमांड नोटिस रिलायंस को भेजा।

बॉम्बे हाईकोर्ट से 2025 सीबीआई को नोटिस

नवंबर 2025 जितेंद्र मारू की याचिका दाखिल हुई। याचिका में दावा किया गया कि षड्यंत्र मुंबई में रचा गया, इसलिए सीबीआई को जांच का अधिकार है। अदालत ने माना और सीबीआई को नोटिस जारी किया।
यह कदम प्रतीक है कि अब मामला ढका-छुपा नहीं रह सकता। लेकिन…ज्यादातर अखबार और टीवी चैनल इतना शांत कि जैसे यह केस किसी छोटे कस्बे की पानी टंकी विवाद का मामला हो।

आखिर सरकार चुप क्यों

जब सरकार ओएनजीसी का नुकसान जानती है, जब अदालतें कार्रवाई कर रही हैं, जब समिति की रिपोर्टें चोरी दिखा चुकी हैं तो फिर भी सरकार मौन क्यों है, क्या सरकार के हाथ बंधे हैं, क्या पूंजीपतियों की पकड़ इतनी मजबूत है, क्या राजनीतिक चंदा, मीडिया मैनेजमेंट और चुनावी खर्च कुछ ज्यादा ही प्रभावी हैं।
या फिर देश का शासन अब कॉर्पोरेट फ्रेंडली नहीं,
कॉर्पोरेट-फर्स्ट हो चुका है!

मीडिया का अपराध चुप्पी बिकाऊ है या भय की पैदाइश

कल्पना कीजिए अगर यही आरोप किसी सरकारी कंपनी पर होता या किसी विपक्षी नेता पर या किसी छोटे व्यवसायी पर टीवी चैनल दिन-रात हैशटैग चला देते। लेकिन यहां चुप्पी, सन्नाटा है जैसे तिरंगे पर म्यूट बटन लगा दिया गया हो।

जनता का नुकसान देश को पता भी नहीं चलता

देश की गैस गई, देश का पैसा गया, देश का संसाधन निजी लाभ में बदल गया। और हम-आप एलपीजी सिलेंडर की कीमत पूछते रह गए। देश की संपत्ति जब कुछ लोगों की जेब में बह जाएगी तो जनता हमेशा गरीब ही रहेगी। यह सिर्फ गैस चोरी नहीं, लोकतंत्र की चोरी है। यह मामला सिर्फ आर्थिक नुकसान का नहीं यह दिखाता है कि भारत में सरकारी संस्थान कितने असहाय हैं, और कॉर्पोरेट प्रभाव कितना विराट। लोकतंत्र का गला गैस पाइपलाइन में फंस चुका है।

* ओएनजीसी ने 2014 में आरोप लगाया कि रिलायंस ने उसके ब्लॉक से गैस खींची
* हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय की रिपोर्ट 11,000 करोड़ की गैस रिलायंस के हिस्से में गई
* जस्टिस ए.पी.शाह समिति ने 1.55 अरब डॉलर भरने का दिया आदेश
* अंतरराष्ट्रीय पंचाट रिलायंस के पक्ष में 2-1 से निर्णय
* 2025: दिल्ली हाईकोर्ट ने पंचाट फैसला खारिज किया
* सरकार ने रिलायंस को नया डिमांड नोटिस भेजा
* बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया
* जनता का नुकसान देश के संसाधन निजी कंपनियों की झोली में

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