मताधिकार पर जस्टिस भुईयां ने ज्ञानेश कुमार को किया नंगा,संविधान से ज्यादा नही कोई चंगा
वोट का अधिकार छीनना लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार!

- वोटर को सूची से हटाकर लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जा सकता।
- मतदाता सूची में पारदर्शिता होनी चाहिए।
- पात्र मतदाताओं के नाम हटाने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
- नागरिकों को अपनी पात्रता साबित करने और आपत्ति दर्ज कराने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
- गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर प्रभावी सुधार और अपील की व्यवस्था होनी चाहिए।

देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मतदाता सूची की शुद्धता के नाम पर नागरिकों के मतदान अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी माहौल में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की एक अकादमिक कार्यक्रम में कही गई बातें संवैधानिक बहस को नई दिशा देती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान नागरिकों को दो श्रेणियों में बांटने की कल्पना नहीं करता—एक वे जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरे वे जिन्हें इस अधिकार से वंचित कर दिया गया है। यदि कोई प्रक्रिया बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करती है, तो उसकी निष्पक्षता, वैधता और संवैधानिकता की गंभीर जांच होनी चाहिए।
सवाल सीधा है: मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया कहीं वास्तविक नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से दूर करने का माध्यम तो नहीं बन रही?

मताधिकार पर चोट, संविधान की बुनियाद पर सवाल
जस्टिस भुईयां ने अपने संबोधन में मताधिकार को नागरिकता का सार बताते हुए कहा कि वोट के माध्यम से ही आम नागरिक शासन-व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। उनके विचारों का मूल संदेश यह है कि लोकतंत्र में नागरिक की राजनीतिक भागीदारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
यदि किसी भारतीय नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो इसका असर केवल एक व्यक्ति के वोट पर नहीं पड़ता, बल्कि उसके प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी पर भी पड़ता है।
एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना हो सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हट जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। चुनाव की निष्पक्षता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना भी है।
अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर कराने का प्रावधान करता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हालांकि मताधिकार का प्रयोग कानून के तहत निर्धारित पात्रता और शर्तों के अधीन होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी पात्र नागरिक को मनमानी प्रक्रिया के जरिए मतदान से वंचित किया जा सकता है।
जस्टिस भुईयां ने इसी संवैधानिक भावना को रेखांकित करते हुए मताधिकार के महत्व पर जोर दिया। उनका संदेश सत्ता और संस्थाओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है—किसी भी प्राधिकरण की कार्रवाई संविधान की कसौटी पर परखी जानी चाहिए।
लोकतंत्र में चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं है; यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि हर पात्र नागरिक को चुनाव में भाग लेने का अवसर मिले।
अनुच्छेद 14 और 325: समानता का अधिकार, समान मतदाता सूची
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इस संवैधानिक समानता को लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान करता है। किसी अमीर और गरीब, शक्तिशाली और सामान्य नागरिक के वोट का मूल्य समान होता है।
वहीं, अनुच्छेद 325 धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर रखने के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा देता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए सामान्य मतदाता सूची का प्रावधान करता है।
इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण में निष्पक्षता और समानता सर्वोपरि होनी चाहिए। प्रक्रिया ऐसी हो कि किसी पात्र नागरिक के साथ भेदभाव न हो और किसी भी तरह की मनमानी की गुंजाइश न रहे।
नोटिस और सुनवाई के बिना नाम हटाने पर गंभीर सवाल
जस्टिस भुईयां ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया के संदर्भ में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 और न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता का नाम हटाने की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।
एसआईआर के संदर्भ में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी पात्र नागरिक के दस्तावेजों में कमी है या उसकी पात्रता पर संदेह है, तो उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजों की अनुपलब्धता या प्रशासनिक चूक के कारण किसी वास्तविक मतदाता को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
यहां ध्यान देने की जरूरत है कि मतदाता सूची से नाम हटाने के कानूनी आधार और प्रक्रियाएं लागू कानून के अनुसार निर्धारित होती हैं। इसलिए हर मामले में तथ्यों, नोटिस, सुनवाई और उपलब्ध कानूनी उपायों की जांच आवश्यक है।
एसआईआर पर सरकार और चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग
एसआईआर को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी आंकड़ों और निष्पक्ष प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। कितने नाम हटाए गए? कितने नाम मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के थे? कितने पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटे? कितने लोगों की आपत्तियां स्वीकार की गईं? इन सवालों के स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल मतदाता सूची तैयार करना नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता बनाए रखना भी है। सरकार और संबंधित संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी पात्र भारतीय नागरिक को अपनी पहचान और पात्रता साबित करने के बावजूद मतदान से वंचित न होना पड़े।
यदि प्रक्रिया में कमियां हैं, तो उन्हें स्वीकार कर सुधारना संस्थागत कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी का प्रमाण होगा।
सत्ता से बड़ा संविधान, संस्थाओं से बड़ी जवाबदेही
जस्टिस उज्ज्वल भुईयां ने अपने संबोधन में सीधे एसआईआर या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर टिप्पणी नहीं की थी। इसलिए उनके वक्तव्य को किसी विशेष मामले पर न्यायिक फैसला या चुनाव आयोग के खिलाफ औपचारिक आदेश बताना उचित नहीं होगा। फिर भी उनके संवैधानिक विचार मौजूदा बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार, गृह मंत्री अमित शाह और चुनाव आयोग की भूमिका पर विपक्ष तथा आलोचक सवाल उठा रहे हैं। इन आरोपों की जांच तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन एक लोकतांत्रिक सिद्धांत पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए—चुनावी प्रक्रिया के नाम पर पात्र नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
संविधान किसी सरकार, दल या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। उसकी मर्यादा बनाए रखना प्रत्येक संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी है।




