योगी जी का सामाजिक समरसता पर जोर, विरोधियों ने गढ़ा ठाकुरवाद का फर्जी शोर

● योगी जी का सामाजिक समरसता पर जोर, विरोधियों ने गढ़ा ठाकुरवाद का फर्जी शोर
● हकीकत में ब्राह्मण संतुलन: योगी आदित्यनाथ पर लगाए जा रहे आरोप कितने सही?
● योगी पर ठाकुरवाद का आरोप, लेकिन सत्ता संरचना में ब्राह्मण प्रभुत्व
● मुख्य सचिव से लेकर मुख्य सलाहकार तक ब्राह्मण अधिकारियों की निरंतर मौजूदगी
● कैबिनेट में एक भी क्षत्रिय मंत्री नहीं इतिहास में पहली बार
● ठाकुर पहचान का राजनीतिक दुरुपयोग, जमीनी लाभ शून्य
● राजपूत समाज को नैरेटिव में उलझाकर वास्तविक मुद्दों से दूर किया
● योगी की निजी जीवन शैली जातिगत राजनीति से बिल्कुल अलग
● गोरखनाथ मठ से सरकार तक सामाजिक समावेशन की तस्वीर
● योगी बनाम योगीवाद भ्रम और वास्तविकता के बीच फर्क जरूरी
◆ सौरभ सोमवंशी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक सवाल बार-बार उछाला जा रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ ठाकुरवाद की राजनीति कर रहे हैं? यह सवाल जितना तेज आवाज में पूछा जा रहा है, उतना ही खोखला भी साबित होता है, अगर सत्ता के ढांचे, प्रशासनिक नियुक्तियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को ठंडे दिमाग से देखा जाए। सच यह है कि योगी आदित्यनाथ को ठाकुरवाद के प्रतीक के रूप में पेश करने की कोशिशें जितनी तेज हैं, उतनी ही कमजोर भी हैं। योगी आदित्यनाथ एक संन्यासी मुख्यमंत्री हैं ऐसे मुख्यमंत्री जिन्होंने न परिवार रखा, न जातिगत उत्तराधिकार। अपने पिता के निधन पर भी न जाने वाला व्यक्ति अगर जातिवादी सत्ता संरचना का केंद्र बताया जा रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह आरोप तथ्य पर आधारित है या राजनीतिक सुविधा पर। समाजवादी पार्टी पर लंबे समय तक यादववाद का आरोप लगाया गया। वह आरोप सही या गलत हो सकता है, लेकिन कम से कम यह निर्विवाद है कि सपा शासनकाल में यादव समाज को सरकारी नौकरियों, पुलिस और आयोगों में ठोस प्रतिनिधित्व मिला। इसके उलट योगी सरकार में ठाकुर समाज को लेकर जो नैरेटिव बनाया गया, उसका जमीनी लाभ राजपूत समाज को कहीं दिखाई नहीं देता। हकीकत यह है कि आज उत्तर प्रदेश में राजपूत समाज के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि योगी आदित्यनाथ को आगे करके भाजपा ने ठाकुरों को प्रतीक तो बनाया, लेकिन शक्ति नहीं दी। यह भी एक तथ्य है कि बीते वर्षों में क्षत्रिय युवाओं की हत्याएं हुईं, मुठभेड़ों में जान गई, मुकदमे दर्ज हुए। लेकिन इन घटनाओं पर सरकार की ओर से कोई विशेष ठाकुर संरक्षण नजर नहीं आया। इसके बावजूद मीडिया के एक हिस्से और कुछ राजनीतिक समूहों ने योगी को ठाकुरवाद का चेहरा बना दिया। असल में यह नैरेटिव योगी के खिलाफ नहीं, बल्कि राजपूत समाज को भ्रम में रखने का एक औजार बनता जा रहा है।
योगी सरकार ठाकुरवाद का शोर, ब्राह्मणवाद की सत्ता?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ योगी आदित्यनाथ को ठाकुर मुख्यमंत्री बताकर उन्हें जातीय खांचे में बंद करने की कोशिश हो रही है, दूसरी तरफ सत्ता और प्रशासन के वास्तविक आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। सवाल यह नहीं है कि योगी आदित्यनाथ किस जाति से आते हैं, सवाल यह है कि उनकी सरकार किस जाति को सत्ता, सुरक्षा और स्थायित्व दे रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व्यक्तिगत जीवन में संन्यासी है। जाति, परिवार, वंश से लगभग पूरी तरह कटे हुए। लेकिन राजनीति में नैरेटिव व्यक्ति से नहीं, सत्ता के वितरण से बनता है। यही कारण है कि ठाकुरवाद का आरोप जितना जोर से लगाया जाता है, उतना ही वह जमीनी सच्चाइयों से टकराकर कमजोर पड़ता है।
ठाकुरवाद का नैरेटिव प्रचार ज्यादा, तथ्य कम
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के कुछ पत्रकारों, सोशल मीडिया समूहों और राजनीतिक हलकों ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि योगी सरकार ठाकुरों की सरकार है। किसी अधिकारी के नाम के आगे सिंह जुड़ते ही उसे योगी की बिरादरी का बताकर प्रचार किया जाता है। यह न सिर्फ बौद्धिक आलस्य है, बल्कि जानबूझकर फैलाया गया भ्रम भी है। अगर वास्तव में ठाकुरवाद होता, तो देवरिया में 10 दिनों के भीतर तीन क्षत्रिय युवकों की हत्या के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी क्यों होती।
सुल्तानपुर में एक क्षत्रिय युवक का एनकाउंटर सवालों के घेरे में
अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल के कहने भर से सात राजपूतों पर बिना ठोस जांच मुकदमे क्यों दर्ज होते?
योगी सरकार में एक भी क्षत्रिय कैबिनेट मंत्री क्यों नहीं है। जबकि यह प्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ है?
ये सवाल ठाकुरवाद के दावे को अंदर से खोखला कर देते हैं।
इतिहास, पहचान और चयनित पुनर्लेखन
योगी सरकार के दौरान जिस तरह क्षत्रिय इतिहास की पुनर्व्याख्या की जा रही है, उसने भी समुदाय के भीतर असंतोष को जन्म दिया है। पृथ्वीराज चौहान और मिहिरभोज को गुर्जर बताना। राजा सुहेलदेव को राजभर घोषित करना, भगवान श्रीकृष्ण को अहीर सिद्ध करने की कोशिश ये प्रयास सिर्फ अकादमिक बहस नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा हैं। इससे क्षत्रिय समाज में यह भावना गहरी हुई है कि उनकी ऐतिहासिक पहचान को योजनाबद्ध ढंग से कमजोर किया जा रहा है।
प्रशासनिक सत्ता ब्राह्मण वर्चस्व का ठोस ढांचा
अगर सत्ता के असली केंद्र मुख्य सचिवालय, मुख्यमंत्री कार्यालय और नीति निर्धारण—को देखा जाए, तो तस्वीर बिल्कुल साफ है। 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव पद पर लंबे समय तक ब्राह्मण अधिकारी ही काबिज रहे। अनूप पाण्डेय, आर.के.तिवारी, दुर्गा शंकर मिश्रा को तीन बार सेवा विस्तार मिलना प्रशासनिक इतिहास में मिसाल है। तीन बार का सेवा विस्तार केवल व्यक्तिगत योग्यता नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और भरोसे का संकेत देता है। इसके चलते कई वरिष्ठ अधिकारी बिना मुख्य सचिव बने ही रिटायर हो गए। जब जुलाई में मनोज कुमार सिंह मुख्य सचिव बने, तब अचानक ठाकुरवाद का शोर तेज हो गया। यह दिखाता है कि नैरेटिव कैसे जरूरत के हिसाब से गढ़ा जाता है।
अवनीश अवस्थी सत्ता का पंचम तल
योगी सरकार में ब्राह्मण प्रशासनिक प्रभाव का सबसे ठोस उदाहरण हैं—पंडित अवनीश अवस्थी। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लाकर अपर मुख्य सचिव बनाना
सितंबर 2022 में रिटायरमेंट के बाद मुख्य सलाहकार का नया पद सृजित करना बार-बार कार्यकाल विस्तार देना। मुख्य सलाहकार का यह पद साधारण सलाहकार नहीं, बल्कि नीति, प्रशासन और सत्ता के हर गलियारे तक पहुंच वाला पद है। लोक भवन का पंचम तल सत्ता का वास्तविक केंद्र माना जाता है और वहां अवनीश अवस्थी की मौजूदगी ब्राह्मण प्रभाव को और मजबूत करती है।
राजनीतिक संदेश ठाकुर चेहरा, ब्राह्मण ढांचा
यहां योगी आदित्यनाथ की भूमिका अहम हो जाती है। वे स्वयं ठाकुर पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन सत्ता का वास्तविक ढांचा ब्राह्मण अधिकारियों और नेताओं के हाथ में दिखता है। यह व्यवस्था भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से सुविधाजनक है। मुख्यमंत्री के रूप में एक कठोर, लोकप्रिय चेहरा प्रशासन में भरोसेमंद, संगठित ब्राह्मण नौकरशाही लेकिन इसी मॉडल का सबसे बड़ा नुकसान राजपूत समाज को होता दिख रहा है। उन्हें न सत्ता मिल रही है, न प्रतिनिधित्व सिर्फ आरोप और टारगेटिंग।
राजपूत समाज की बढ़ती आशंका
राजपूत समाज के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि योगी आदित्यनाथ के नाम पर भाजपा ने उन्हें राजनीतिक ढाल की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन वास्तविक लाभ नहीं दिया। चर्चा अब यह नहीं है कि योगी ठाकुर हैं या नहीं, चर्चा यह है कि अगर योगी के बाद कोई और मुख्यमंत्री आया, तो ठाकुर सबसे आसान निशाना होंगे। यह डर राजनीतिक है, भावनात्मक है और पूरी तरह निराधार भी नहीं।
नैरेटिव बनाम वास्तविकता
योगी सरकार में ठाकुरवाद का आरोप जितना जोर से लगाया जाता है, वास्तविक सत्ता संरचना उतनी ही स्पष्ट रूप से ब्राह्मण केंद्रित दिखाई देती है। यह विरोधाभास ही उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सच है।
* योगी सरकार में ब्राह्मण प्रशासनिक निरंतरता
* कैबिनेट में क्षत्रिय प्रतिनिधित्व शून्य
* ठाकुरवाद का नैरेटिव, लेकिन जमीनी लाभ नहीं
* मुख्य सलाहकार पद असली सत्ता केंद्र
* गोरखनाथ मठ में सामाजिक समावेशन
* राजपूत समाज में बढ़ती असुरक्षा की भावना
* मीडिया नैरेटिव और वास्तविकता में अंतर
* योगी व्यक्ति नहीं, प्रतीक बनाकर राजनीति में




