लोकतंत्र बिहार में हुआ किडनैप, सफल रहा बीजेपी का चुनावी रोडमैप
जनादेश बेचो, लोकतंत्र फ्री पाओ बिहार मॉडल 2025 लॉन्च!

● लोकतंत्र बिहार में हुआ किडनैप, सफल रहा बीजेपी का चुनावी रोडमैप
● जनादेश बेचो, लोकतंत्र फ्री पाओ बिहार मॉडल 2025 लॉन्च!
● जनता मतदान को नहीं, ‘मैनेजमेंट को’ वोट देती है नींबू, मिर्ची, तंत्र-मंत्र सब ऑन
● जहां उम्मीदें जीतें, वहां परिणाम हार जाता है इसको कहा जाता है लोकतंत्र 2.0
● भीड़ विपक्ष की रैलियों में, और जीत सत्ता के ड्रॉअर में इसे कहते हैं चमत्कार का चकरी मॉडल
● लोकतंत्र आईसीयू में, पर डॉक्टर वही हैं जिन पर हमला करने का मन बना
● इवीएम बोली—कृपया मुझे न देखें, मैं सिर्फ एक माध्यम हूं, मंजिल कहीं और
● भाजपा की रणनीति पहले परंपरा खत्म, फिर प्रतिद्वंद्वी खत्म, अंत में लोकतंत्र भी ऑन होल्ड
● मतदाता का अपग्रेडेड संस्करण सब मिलता है थाना, चौराहा और थोक के वोट
● भारत का जनादेश अब नीलामी में जाता है, बोली सिर्फ वही लगा सकता है जिसके पास ‘मोशा कार्ड’
◆ अंशिका मौर्या
भारत में लोकतंत्र बचाने का धंधा अब पुराने जमाने की तरह भावुक नहीं रहा। अब यह कॉरपोरेट मॉडल में बदल चुका है। पहले चुनाव में नेता जनता से हाथ जोड़ता था, अब जनता नेता से पूछती है कि राशन क्या है, रेट क्या है, ऑफर क्या है! बहुत दिनों से कहा जा रहा था कि लोकतंत्र खतरे में है। लेकिन बिहार ने बता दिया कि लोकतंत्र खतरे में नहीं, रेगिस्तान में है, और पानी बेचने वाले मोशा हैं। तेजस्वी यादव की रैलियों में भीड़ देखकर लग रहा था कि बिहार कारोबार बदलने वाला है। परिणाम आते ही पता चला भीड़ की बुकिंग अलग है, परिणाम का रूट अलग। राहुल गांधी की सभाएं तो मानो जनांदोलन थीं। लेकिन इवीएम की स्माइल यह कह रही थी और कह रही थी आपकी भावनाओं का सम्मान है, पर परिणाम पहले से कस्टडी में है। नीतीश कुमार की कहानी और मजेदार है कुर्सी पर इस कदर चिपक चुके हैं कि बिहार में अब लोग ‘मुख्यमंत्री निवास’ नहीं कहते, कहते हैं नीतीश जी का परमानेंट रूम। इन चुनावों ने साफ कर दिया कि अब भारतीय राजनीति कांटे की लड़ाई नहीं, कांटे की सजावट है। नतीजे पहले तय होते हैं, फिर उनके हिसाब से प्रचार करवाया जाता है। जैसे कोई फिल्म पहले शूट हो जाए, फिर उसका ट्रेलर जनता को दिखे। सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ विपक्ष का नहीं, भारत की सामूहिक विवेकशीलता का हुआ है। जिसके बारे में चुनाव आयोग अब नोटिफिकेशन जारी कर दे तो बेहतर है कि जनता का विवेक अगली सूचना तक निलंबित है, कृपया परेशान न हों। इस बार बिहार ने यह भी साबित कर दिया कि देश का लोकतंत्र किसी के श्राप का नहीं, मोशा की रणनीति का परिणाम है। जिस देश में मतदाता बूथ के बाहर खड़ा होकर नेता को सलामी दे और बूथ के अंदर जाकर लोकतंत्र को समर्पण कर दे, वहीं ऐसे नतीजे आते हैं। यह कहानी सिर्फ बिहार की नहीं,
भारत के भविष्य की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है।
लोकतंत्र का नया ठेका मैनेजमेंट एण्ड मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड
भारत में अब चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, एक बड़ा कॉरपोरेट इवेंट बन चुका है। जिस तरह किसी शादी में दूल्हा-दुल्हन से ज्यादा चर्चा कैटरिंग, डीजे और बजट पर होती है, उसी तरह चुनाव में अब मुद्दों से ज्यादा चर्चा
आईटी सेल, बूथ माइक्रो मैनेजमेंट, और तांत्रिक कमरों पर होती है। चुनाव अब जमीन पर नहीं जीतते, सर्वर रूम में जीतते हैं। सनातन काल में युद्ध भूमि पर नतीजे आते थे, अब चुनाव में नतीजे अपलोड होते हैं।
और जनता अपने मतदान को यू-ट्यूब की तरह देखती ह
लोडिंग… लोडिंग… और फिर क्रैश।
भीड़ विपक्ष की, सार्वजनिक उत्साह जनता का पर विजय?
विपक्ष की सभाएं अब मेले की तरह हो गई हैं। खाने-पीने की दुकानें, फोटो सेशंस, युवाओं की भीड़, नारों की गूंज सब कुछ परफेक्ट। बस एक चीज की कमी है वोट का नतीजा। तेजस्वी यादव की रैलियों में लोग ऐसे जुटे कि लगा, बिहार अब नई दिशा में जाने वाला है।
पर नतीजे कहते हैं कि दिशा वही है, बस उम्मीदें गलत थीं। राहुल गांधी की सभाएं सोशल मीडिया पर वायरल,
पर इवीएम की मुस्कान कहती है कि वायरल होने से जीत नहीं मिलती, वायर होने से मिलती है।
बिहार की जनता अब चौंकती नहीं, रहती है सिर्फ चौकन्नी
बिहार की जनता जानती है कि चुनाव आते ही
नेता की भाषा बदल जाएगी, कमिटमेंट बदल जाएगा, और सबसे ज्यादा नोटों की क्वालिटी बदल जाएगी। पहले नेता आते थे तो जाति की राजनीति करते थे, अब आते हैं तो कैश की राजनीति करते हैं। मतदाता भी सरल नहीं रहा उसके भी पैकेज तय हैं गांव में 500+शराब का पैकेट, शहर में है 2000+महिला वोट बोनस और हर इलाके में चलता है भाई का कोड डाल, वोट पक्का कर। लोकतंत्र अब विश्वास पर नहीं चलता कैपेसिटी पर चलता है।
भाजपा का मशीन मॉडल विपक्ष भावनाएं बेचता भाजपा गणित
अगर विपक्ष जनता से कहता है कि देश बदलेगा! तो भाजपा कहती है कि बस बदलने दो, मत पूछो कैसे। मोशा का गणित खूबसूरत है, जनता भ्रमित, विपक्ष विभाजित, इवीएम विनम्र, आयोग संयमित, मीडिया उत्साहित, परिणाम तय। इस फॉर्मूले में सिर्फ जनता का गुस्सा बेकार है और विपक्ष का उत्साह अनावश्यक।
नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं ‘संवैधानिक किरायेदार’
नीतीश बाबू लोकसभा से लेकर पंचायत सभा तक
सबके रूम पार्टनर बन चुके हैं। कुर्सी पर बैठे भी हैं, पर कुर्सी के मालिक नहीं हैं। उनकी हालत ऐसी है जैसे कमरा आपका, रेंट हमारा, नियम हमारे और निकाला जाना भी हमारे हाथ में। नीतीश कुमार जितने दिन मुख्यमंत्री रहते हैं, उतने दिन बिहार में स्थिरता कम हो जाती है।
ममता बनर्जी बिहार के बाद अगला शिकार
मोशा की नजर में अब सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बंगाल है और बंगाल को बदलना आसान नहीं। भाजपा के लिए आसान और मुश्किल में फर्क नहीं, जब मशीन वही है और प्रबंधन वही। बंगाल में मामला यह होगा रैली विपक्ष की, प्रचार जनता का, और नतीजे वही पुराने कमरे में, पुराने एक्सेल में।
लोकतंत्र की हालत मृत घोषित नहीं, पर पल्स कमजोर
भारतीय लोकतंत्र की पल्स (नाड़ी) अब 150 साल पुरानी घड़ी की तरह हो गई है। कभी चलती है, कभी रुकती है, कभी खुद ही समय बदल देती है। लोकतंत्र आईसीयू में है पर डॉक्टर वही हैं जिनके आगे विपक्ष इलाज कराने से डरता है। अब राजनीति न विचारधारा की रही, न लोकतंत्र की सिर्फ कला की। अगर राजनीति पहले धर्म, विचार, संघर्ष, संविधान पर चलती थी, अब यह चलती है मैनिपुलेशन, मैनेजमेंट और मोशा मशीन पर। जो इसे स्वीकार कर ले, वह नेता है। जो न कर सके, वह विरोधी। बिहार ने देश को यही बताया कि
मतदान जनता करती है, जीत मशीन तय करती है।
* बिहार मॉडल भीड़ कहीं, परिणाम कहीं और
* मोशा प्रबंधन भावनाओं पर गणित भारी
* विपक्ष भ्रमित, जनता बहकाई गई, और सिस्टम सुरक्षित
* लोकतंत्र का नया युग टपोरी काल
* भविष्य बंगाल अगला लक्ष्य
* परिणाम भारत में चुनाव नहीं, चुनाव का प्रबंधन जीतता है




