
जब कोई व्यक्ति इतिहास के मंच पर उभरता है, तो वह सिर्फ अपने व्यक्तिगत गुणों के कारण नहीं, बल्कि उस सामाजिक ज़रूरत की प्रतिक्रिया स्वरूप आता है जिसे उस समय कोई और व्यक्त नहीं कर पाता। राजनीति में शिबू सोरेन का सामने आना उसी ऐतिहासिक आवश्यकता की अभिव्यक्ति था, जहाँ आदिवासी समाज को अपनी अस्मिता, अपनी ज़मीन और अपने श्रम के लिए संगठित आवाज़ की आवश्यकता थी।
उनका संघर्ष व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि सामाजिक-आर्थिक ढांचे के विरुद्ध ठोस प्रतिरोध था। जिस समाज में वे जन्मे, वहाँ जंगल, ज़मीन और जल पर सदियों से एक समुदाय की निर्भरता थी, और यह निर्भरता सिर्फ जीविका का प्रश्न नहीं थी, बल्कि संस्कृति और अस्तित्व का भी था। लेकिन जैसे ही बाज़ार का दबाव जंगलों और खनिज संसाधनों की ओर बढ़ा, उस समुदाय को हाशिए पर धकेल दिया गया।
शिबू सोरेन ने जिस बात को गहराई से महसूस किया, वह यह थी कि संसाधनों की लूट केवल बंदूक या कागज़ के ज़रिए नहीं होती, बल्कि विचारधाराओं और कानूनों के ज़रिए वैध बना दी जाती है। उन्होंने महज राजनीतिक विरोध नहीं किया, वे उस उत्पादन प्रणाली और भू-स्वामित्व के ढांचे को चुनौती दे रहे थे जिसमें कुछ वर्गों को शोषण का पूरा अधिकार दे दिया गया था, और बहुसंख्यक श्रमशील समुदाय को सिर्फ खनन का मजदूर बना दिया गया था। उनका आंदोलन संकीर्ण पहचान की राजनीति नहीं था। वे भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज़ों की रक्षा की बात करते थे, लेकिन उसका उद्देश्य किसी दूसरे समुदाय से नफरत फैलाना नहीं था, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय को पहचानना और बदलना था, जिसमें एक पूरे समाज को ‘जंगलवासी’ कहकर सभ्यता से बाहर समझा गया था।
शिबू सोरेन की राजनीति का मूल संघर्ष ‘किसके पास क्या है’ से जुड़ा था। ज़मीन किसके पास है? कोयला और लोहा किसके लिए निकाला जा रहा है? स्कूल और अस्पताल किसके लिए बनाए जा रहे हैं? यह सवाल पूछना किसी व्यक्ति की जिद नहीं थी, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रस्फुटन था, जो बहुत समय से दबाई गई थी।
वे किसी बड़े दार्शनिक शब्दजाल के सहारे नहीं बोले। वे बस इतना कहते थे — ‘हमारी माटी, हमारा राज।’ यह नारा उस गहरे भौतिक सत्य को उजागर करता है कि राज वही कर सकता है जिसके पास संसाधनों पर नियंत्रण हो। और जब तक माटी पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक किसी भी लोकतंत्र की बात बेमानी है।
कुछ लोग उनके व्यक्तित्व में अंतर्विरोध खोज सकते हैं; सत्ता में रहकर समझौते करना, अदालतों में मुक़दमे झेलना, और कई बार अपनी ही बातों से विचलित हो जाना। लेकिन इन अंतर्विरोधों को व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि व्यवस्था में संघर्षरत किसी भी जननेता की ऐतिहासिक सीमा समझना होगा। क्योंकि जब व्यवस्था ही ऐसी हो जहाँ सत्ता में रहकर व्यवस्था से लड़ना पड़े, तो साफ़ रास्ते नहीं होते।
शिबू सोरेन का मूल्यांकन इस बात से नहीं किया जाना चाहिए कि वे कितनी बार मुख्यमंत्री बने या उन्हें संसद में कितनी बार भेजा गया, बल्कि इस बात से कि क्या उनके नेतृत्व में कोई समाज, जो परिधि से बाहर मौन खड़ा था, पहली बार बोलने लगा? क्या उसकी चेतना में यह बात घर कर गई कि वह सिर्फ शोषित नहीं, परिवर्तन का वाहक भी हो सकता है?
और अगर यह हुआ, तो शिबू सोरेन का होना इतिहास का अनिवार्य अध्याय था।




