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श्री बद्रीनाथ मंदिर में मोदी के भाई की वीआईपी खातिरदारी,लाखो रुपये फूंक गए सरकारी

पीएम मोदी के भाई पर 22 हजार खर्च; हेलीकॉप्टर टिकट से लेकर रहने-खाने तक का इंतजाम

– मंदिर कमेटी ने सभी मेहमानों को अपना अतिथि बताया
– श्रद्धालुओं के दान से होने वाली कमाई आवभगत में लगाई
– आरटीआई से मिली जानकारी से हुआ बड़ा खुलासा
– फायदा उठाने वालों में आरएसएस के लोग भी, हेलीकॉप्टर से करवाई यात्रा

दहरादून। उत्तराखंड के पवित्र धाम केदारनाथ और बदरीनाथ केवल मंदिर नहीं हैं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक भावना के केंद्र हैं। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से सामने आए दस्तावेजों ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्होंने आस्था और व्यवस्था दोनों को कटघरे में ला खड़ा किया है। आरोप है कि श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने श्रद्धालुओं के चढ़ावे और मंदिर कोष का इस्तेमाल वीआईपी मेहमाननवाजी, राजनीतिक अतिथियों के आवास, भोजन और हेलीकॉप्टर टिकटों पर किया। इन वीआईपी मेहमानों में पीएम नरेंद्र मोदी के भाई पंकज मोदी भी शामिल हैं। उनके ठहरने पर बीकेटीसी ने 22 हजार रुपए खर्च किए।

बीकेटीसी की खातिरदारी का मुफ्त लाभ लेने वालों में उत्तराखंड के भाजपा विधायक और आरएसएस से जुड़े पदाधिकारी भी शामिल हैं। बीकेटीसी ने इन सभी को विशेष अतिथि का दर्जा दिया और उनकी आवभगत में हजारों रुपए फूंक दिए। यह पैसा बद्रीनाथ आने वाले श्रद्धालुओं के दान का पैसा है, जो मंदिर के रखरखाव में लगना चाहिए, लेकिन यही पैसा वीआईपी मेहमानों की खातिरदारी में फूंक दिया गया।

आरटीआई से खुला राज

सामाजिक कार्यकर्ता और वकील विकेश सिंह नेगी द्वारा प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर लगाए गए आरोप अब उत्तराखंड की राजनीति और धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ रहे हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, बीकेटीसी ने कई राजनीतिक और प्रभावशाली व्यक्तियों के आवास, भोजन और यात्रा पर मंदिर कोष से भुगतान किया। आरोप है कि इन लोगों को ‘अतिथि’ दिखाकर खर्चों को वैध रूप दिया गया।

इन रसूखदारों ने चाटी मुफ्त की मलाई

दस्तावेजों के हवाले से जो खर्च सामने आए, उनमें शामिल हैं- कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी की बेटी नेहा जोशी के दो दिन के आवास और भोजन पर लगभग 60 हजार रुपये खर्च हुए। केदारनाथ के विधायक आशा नौटियाल के नाम पर 37,500 रुपये फूंके गए। प्रधानमंत्री मोदी के भाई पंकज मोदी के आवास पर 22 हजार रुपये खर्च हुए। कथित तौर पर संघ से जुड़े कुछ व्यक्तियों के आवास पर 20 हजार रुपये खर्च किए गए। भाजपा पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के आवास-भोजन पर 24 हजार रुपये और बीकेटीसी अध्यक्ष के निज सहायक के आवास पर 23 हजार रुपये ख़र्च किए गए। आरोप यह भी है कि मंदिर समिति ने हेलीकॉप्टर टिकटों का भुगतान भी मंदिर कोष से किया। बीकेटीसी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के ‘अतिथियों’ के लिए हेली सेवाओं पर लाखों रुपये खर्च किए गए।

दान का पैसा मेहमान नवाजी में कैसे खर्च हुआ?

सबसे बड़ा सवाल क्या श्रद्धालुओं का पैसा राजनीतिक मेहमाननवाजी में खर्च हो सकता है? यहीं से विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष शुरू होता है। मंदिर समितियां सामान्य सरकारी विभाग नहीं होतीं। इनके पास आने वाला धन श्रद्धालुओं की धार्मिक भावना और विश्वास से जुड़ा होता है। ऐसे में यदि उस धन का उपयोग राजनीतिक संपर्क मजबूत करने, प्रभावशाली लोगों की सुविधा या निजी मेहमाननवाजी में होता है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि नैतिक संकट भी माना जाएगा। एक आम श्रद्धालु जो हजार-दो हजार रुपये चढ़ाता है, वह यह सोचकर दान नहीं देता कि उसका पैसा किसी नेता, अधिकारी या वीआईपी के होटल, भोजन या हेलीकॉप्टर सुविधा पर खर्च होगा।

वीआईपी संस्कृति बनाम आम श्रद्धालु

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब हर यात्रा सीजन में आम श्रद्धालुओं को घंटों लाइन, महंगे होटल, सीमित सुविधाएं और मौसम की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई श्रद्धालु पैदल चढ़ाई करते हैं, खुले आसमान के नीचे रात बिताते हैं और निजी खर्च से यात्रा पूरी करते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि मंदिर समिति के संसाधन राजनीतिक और प्रभावशाली लोगों की विशेष सुविधाओं पर खर्च किए जा रहे हों, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। धार्मिक संस्थाओं में ‘वीआईपी संस्कृति’ का आरोप नया नहीं है, लेकिन केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे राष्ट्रीय आस्था केंद्रों में इस तरह के आरोप बेहद गंभीर माने जाएंगे।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी इससे पहले भी बीकेटीसी में कथित अनियमितताओं के कई मामले उजागर कर चुके हैं। उनके मुताबिक एक उपाध्यक्ष पर अपनी पत्नी को कर्मचारी दिखाकर भुगतान लेने का आरोप लगा, निजी आवास को कार्यालय दिखाकर भत्ते लेने का मामला सामने आया और मंदिर कोष से लाखों रुपये के वितरण को लेकर भी प्रश्न उठे। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संस्थागत जवाबदेही की विफलता का संकेत होगा। अब तक इन आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह गया है। जरूरी सवाल यह हैं कि क्या मंदिर समिति के पास ऐसे खर्चों की अनुमति देने का नियम है? किन आधारों पर लोगों को ‘विशेष अतिथि’ घोषित किया गया? क्या इन खर्चों का ऑडिट हुआ? क्या मंदिर कोष के उपयोग की सार्वजनिक निगरानी होती है? क्या श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार नहीं कि उनका चढ़ावा कहां खर्च हो रहा है?

आस्था पर चोट का राजनीतिक असर

उत्तराखंड में चारधाम यात्रा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक महत्व भी रखती है। ऐसे में मंदिर समिति पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप सीधे सरकार की साख को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से तब, जब भाजपा स्वयं को सनातन और धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा संरक्षक बताती रही है। विपक्ष को अब सरकार और मंदिर प्रशासन पर हमला बोलने का नया मुद्दा मिल सकता है। इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर लगाए गए हैं। इसलिए इनकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच जरूरी हो जाती है। यदि आरोप गलत हैं तो सरकार और बीकेटीसी को दस्तावेजों के साथ सफाई देनी चाहिए और यदि आरोप सही हैं, तो यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ धोखा माना जाएगा।

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