56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री की नही गली दाल, ट्रम्प ने मोदी जी का कर दिया बुरा हाल
अचूक संघर्ष डेस्क

~ डोनाल्ड ट्रम्प के शिकंजे में मोदी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का अंत?
~ जब अमेरिका और चीन ने हाथ मिलाया, मोदी ने आंखें मूंदी
~ आपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद भी ट्रम्प की दखल क्यों स्वीकारी
~ सीजफायर के नाम पर भारतीय सैन्य मनोबल पर कुठाराघात
~ चीन-पाकिस्तान को ट्रम्प की मिलीभगत भारत अकेला क्यों पड़ रहा है?
~ ड्रैगन और डॉन का गठबंधन भारतीय संसाधनों पर मंडरा रहा खतरा
~ अडानी-अंबानी की विदेश यात्राओं की आड़ में डूब गई कूटनीति
~ रूस की चेतावनी को किया दरकिनार नेहरू, इंदिरा की विरासत से विमुखता
~ अमेरिका की व्यापार नीति के आगे घुटने टेक चुकी है दिल्ली की सत्ता
~ मोदी के रहते भारत विदेशी रहमोकरम पर आत्मनिर्भरता का खोखलापन
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है, लेकिन क्या उसकी विदेश नीति भी संप्रभु है? क्या आज भारत की कूटनीति एक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की निजी फाइलों और दबाव की राजनीति में फंसी है? जिस प्रधानमंत्री ने कभी ‘56 इंच’ का दावा किया, वही आज ट्रम्प को आंख दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में सैन्य सफलता के बाद अमेरिकी मध्यस्थता ने भारतीय सैन्य गरिमा को ठेस पहुंचाई। वहीं ट्रम्प के पाकिस्तान और चीन से बढ़ते रिश्ते भारत की सुरक्षा और व्यापार दोनों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। यह सिर्फ पराजित विदेश नीति नहीं, बल्कि एक आत्मसमर्पण की कहानी है और इसकी पटकथा लिखी जा रही है मोदी-ट्रम्प की यारी में।
- ऑपरेशन सिंदूर में सैन्य सफलता के बावजूद ट्रम्प की मध्यस्थता से सीज़फायर
- ट्रम्प की शह पर पाकिस्तान को चीन से सैन्य इनपुट, सीमावर्ती क्षेत्रों में बेचैनी
- अमेरिका-चीन की संभावित आर्थिक साझेदारी भारत के बाजार पर खतरा
- मोदी की अडानी-अंबानी केंद्रित विदेश यात्राएं देश की विदेश नीति का निजीकरण
- रूस की भारत को दी गई कूटनीतिक चेतावनियां सब अनसुनी
- नेहरू-इंदिरा की संतुलित विदेश नीति को खारिज कर वैयक्तिक ‘यारी’ पर टिकी रणनीति
- अमेरिका की व्यापार नीति में भारत की अधीनस्थ भूमिका
- चीन और अमेरिका दोनों के हाथ में भारत का बाजार और संसाधन मोदी की चुप्पी
ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिकी दबाव सेना की जीत, कूटनीति की हार
भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में एक असाधारण विजय दर्ज की। आतंकी ठिकानों का ध्वस्त किया जाना और नियंत्रण रेखा पर भारत का मनोबल अभूतपूर्व था। लेकिन इस जीत की गूंज अमेरिकी व्हाइट हाउस तक पहुंचते ही ट्रम्प ने ‘सीज़फायर’ की मध्यस्थता की घोषणा कर दी और मोदी सरकार ने उसे न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि प्रचारित भी किया। यह वही ट्रम्प थे जिन्होंने कभी कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय दखल की बात की थी। ऐसे में भारतीय विदेश नीति के घुटने टेकने की यह मिसाल बेहद चिंताजनक है।
ट्रम्प-चीन-पाक गठजोड़ तीन दिशाओं से घिरता भारत
जहां एक ओर चीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को सैटेलाइट और खुफिया जानकारियां दीं, वहीं ट्रम्प प्रशासन ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर संदेहास्पद चुप्पी साधे रखी। सूत्र बताते हैं कि ट्रम्प द्वारा पाकिस्तान और चीन से ‘बैकचैनल’ डिप्लोमैसी चलाई जा रही थी, जिसमें भारत को बिना सूचित किए कूटनीतिक वार्ताएं चलती रहीं। क्या भारत इस त्रिकोणीय गठबंधन का अगला शिकार बनने जा रहा है!
अमेरिका की व्यापार नीति का भारतीय आत्मसमर्पण
ट्रम्प प्रशासन ने अपने कार्यकाल में अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत भारत पर अनेक व्यापारिक दबाव डाले। दवाइयों से लेकर रक्षा सौदों तक, भारत को न सिर्फ महंगे सौदे करने पड़े, बल्कि विश्व व्यापार संगठन विवादों में भी भारत की हालत कमजोर होती गई। अब जब अमेरिका और चीन वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ रहे हैं, भारत को कोने में खड़ा पाया जा रहा है।
पूंजीपतियों की यारी ने बिगाड़ा कूटनीतिक संतुलन
मोदी की विदेश यात्राओं का अधिकांश हिस्सा अडानी और अंबानी के कारोबारी प्रसार से जुड़ा रहा। ऑस्ट्रेलिया से लेकर श्रीलंका और अमेरिका तक, जिन देशों से भारत को सामरिक साझेदारी चाहिए थी, वहां सिर्फ व्यापारिक हित साधे गए। यह नीति देश नहीं चंद पूंजीपतियों को ताकतवर बनाने का साधन बनी। ट्रम्प और मोदी के बीच की दोस्ती भी कहीं न कहीं अडानी के अमेरिकी प्रोजेक्ट्स से जुड़ी थी। जहां सरकारी प्रभाव का निजीकरण हो गया।
रूस पुराना मित्र, जिसकी चेतावनियों पर भी नहीं सुनी बात
सोवियत संघ के जमाने से रूस भारत का भरोसेमंद सहयोगी रहा है। इंदिरा गांधी द्वारा की गई 25 वर्षीय मैत्री संधि ने भारत को पाकिस्तान और अमेरिका के साझा हमलों से बचाया। आज वही रूस भारत को लगातार चीन-अमेरिका गठबंधन से सावधान कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार रूस से दूर होती जा रही है। रूस की नाराजगी न केवल हमारे सामरिक संतुलन को बिगाड़ रही है, बल्कि वैश्विक मंचों पर भारत की स्थिति भी कमजोर हो रही है।
नेहरू और इंदिरा की संतुलित विदेश नीति को तिलांजलि
नेहरू की गुटनिरपेक्षता और इंदिरा की निर्णायक विदेश नीति दोनों ही आज हास्यास्पद बना दिए गए हैं। सरकार द्वारा ‘नेहरू-विरोध’ की नीति में न तो इतिहास का सम्मान है और न ही भविष्य की परवाह। भारत को संतुलन की कूटनीति की जरूरत है न कि ‘मित्र राष्ट्रों’ की गोद में बैठी विदेश नीति की, जो हर निर्णय वॉशिंगटन से पूछ कर लेती है।
मोदी की चुप्पी डर या मजबूरी
सूत्रों की मानें तो ट्रम्प की वापसी के बाद मोदी सरकार जिस तरह शांत है, उससे यह आशंका गहराई है कि ट्रम्प के पास मोदी सरकार की अंदरूनी जानकारियां हैं। पेगासस जासूसी, चुनावी डोनर नेटवर्क, अघोषित सौदों की जानकारी, खुफिया वार्ताएं इन सबकी फाइलें ट्रम्प खेमे के पास हो सकती हैं। यही कारण है कि भारत आज ‘मोदी की सरकार’ होकर रह गई है न कि एक आत्मनिर्भर राष्ट्र की।
जब तक मोदी, देश डॉन के कब्जे में!
आज भारत का आत्मसम्मान, उसकी विदेश नीति, उसकी सैन्य प्रतिष्ठा और उसकी लोकतांत्रिक गरिमा सबकुछ एक ऐसे व्यक्ति के चंगुल में है, जिसने न राष्ट्र को प्राथमिकता दी, न उसकी सीमाओं को। अमेरिका और चीन की मिलीभगत के बीच भारत तटस्थता और संतुलन के सिद्धांतों से दूर हो चुका है। जब तक यह यारी चलेगी, भारत बाजार रहेगा और अमेरिका-चीन जैसे पूंजीवादी शिकारी उसके खनिज, मानव संसाधन और लोकतंत्र को नोचते रहेंगे। यह सिर्फ कूटनीति की असफलता नहीं, ट्रम्प, चीन और पूंजीवाद के आगे आत्मसमर्पण की घोषणा है। अगर देश को बचाना है तो नेहरू और इंदिरा की संतुलित विदेश नीति की ओर लौटना ही होगा। वरना डॉन की यारी, देश को भारी ही नहीं घातक भी साबित होगी।




