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धनखड़ का हाल हुआ बेहाल, पीएम की कुटिल चाल

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ क्या आने वाले समय मे बन पाएंगे मोदी के भस्मासुर ?

अंशिका मौर्या, अचूक संघर्ष

 

  • धनकड़ जैसा हाल पूर्व में कई भाजपा नेताओं का हुआ, भाजपा ने इसे संस्थागत रूप दिया
  • जनसंघ से शुरू होकर भाजपा में बर्फ में फ्रीज करने की संस्कृति का विस्तार
  • मोदी-विरोधियों को ‘धनकड़ गति’ देने की परंपरा लालकृष्ण आडवाणी से लेकर यशवंत सिन्हा तक
  • आईएएस, जज, धुरसंघी और साध्वी भी इस गति को प्राप्त
  • ‘धनकड़ गति’ को बचने के दो ही रास्ते या तो मौन व्रत या फिर चारण भक्ति
  • कांग्रेस में भी थी ‘धनकड़ गति’, लेकिन मोदी युग में इसका नामकरण और परिष्करण हुआ।
  • राजनीतिक ‘मोक्ष’ या राजनीतिक ‘भटकाव’ ‘धनकड़ गति’ सत्ता विमर्श की नई परिभाषा

राजनीति में जब किसी शीर्ष पदस्थ नेता की चुप्पी, पदच्युत होने के बावजूद मौन और सत्ता से निर्वासन एक साथ दिखे, तो जनता के मन में सवाल उठते हैं। लेकिन सवाल पूछने का दौर अब नहीं रहा। क्योंकि अब यह लोकतांत्रिक परंपरा बन चुकी है कि जो नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में आवाज़ उठाए, वह ‘धनकड़ गति’ को प्राप्त हो जाए। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की चुप्पी इसी गति की ताजा गवाही है।

चुप्पी का रहस्य धनकड़ क्यों नहीं बोलते

जगदीप धनकड़ ने राष्ट्रपति चुनावों से पहले उपराष्ट्रपति बनाए जाने पर जो उत्साह दिखाया था, अब वह उत्साह ठंडे बस्ते में चला गया है। संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही उनके पद छोड़ने की अटकलें तेज हुईं, लेकिन धनकड़ खुद मौन हैं। ऐसा लगता है मानो उन्होंने ‘धनकड़ गति’ को आत्मसात कर लिया हो। उनका मौन मोदी के रहते टूटेगा, ऐसी संभावना कम है। क्योंकि यह केवल पद त्याग नहीं, बल्कि सत्ता से अदृश्य निष्कासन का है।

‘धनकड़ गति’ एक राजनीतिक पदच्युत कर्मकांड

यह कोई अचानक प्रकट हुआ शब्द नहीं, बल्कि एक लंबी राजनीतिक परंपरा का समकालीन नाम है। पहले इसे ‘ठंडे बस्ते में डालना’, ‘साइडलाइन करना’ या ‘बर्फ में लगाना’ कहा जाता था। अब इसे ‘धनकड़ गति’ कहा जाता है। क्योंकि सत्ता के सबसे ऊंचे पदों तक पहुंचने के बाद भी जब कोई नेता पूरी तरह नेपथ्य में चला जाए, और सत्ता उस पर मौन की चादर डाल दे, तो वह व्यक्ति इसी गति को प्राप्त कहा जाता है।

जनसंघ से भाजपा तक बर्फ की राजनीति का इतिहास

‘धनकड़ गति’ भाजपा की खोज नहीं है, पर भाजपा ने इसे एक व्यवस्थित संस्कृति बना दिया है। बलराज मधोक, जनसंघ के संस्थापक, पहले बड़े नेता थे जो इस गति को प्राप्त हुए। वे पार्टी विचारधारा के घनघोर वाहक थे, पर जब संघ और अटल-आडवाणी गुट के विरोध में गए, तो उन्हें भी बर्फ में रख दिया गया।

2014 के बाद ‘धनकड़ गति’ का स्वर्णकाल, भाजपा में भीतरघात का परिणाम

प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में यह गति संस्थागत हो चुकी है। जो भी उनके खिलाफ बोला, वह बाहर हुआ। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता मार्गदर्शक मंडल में भेजे गए जो मार्गदर्शन नहीं देता। यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, सुब्रमण्यम स्वामी और सतपाल मलिक जैसे बडे़ नाम एक-एक कर पार्टी से बाहर कर दिए गए। वसुंधरा राजे सिंधिया, कभी राजस्थान की मुख्यमुख्यमंत्री, आज भी अपने ही राज्य में पार्टी के लिए अजनबी हैं।

संघी भी नहीं बचे जब विचारधारा सत्ता के सामने हार जाती है

जो यह समझते हैं कि संघी नेताओं को यह गति नहीं मिलती, वे गलतफहमी में हैं। गोविंदाचार्य जैसे विचारधारात्मक योद्धा को भी किनारे कर दिया गया। कप्तान सिंह सोलंकी, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, साध्वी प्रज्ञा ‘धनकड़ मोड’ में चले गए। यहां तक कि लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी इसी गति की शिकार बनीं।

मौन और चारण बचने के दो रास्ते

जिन्होंने सत्ता के आगे मौन व्रत लिया वे बच गए। नरेंद्र सिंह तोमर, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी जैसे नेता, जो पहले मुखर थे, अब मौन साधे हैं। बाकी चारण-भाट बन चुके हैं। जिनकी कलम और जबान मोदी स्तुति के लिए आरक्षित हो चुकी है, उन्हें ‘धनकड़ गति’ नहीं दी गई। लेकिन जैसे ही चूक होगी, सूची में नाम जुड़ सकता है।

आईएएस-जज भी नहीं बचे ये गति केवल नेताओं तक सीमित नहीं

धनकड़ गति की चपेट में केवल नेता नहीं, बल्कि पूर्व नौकरशाह, न्यायाधीश और नीति-निर्माता भी आते हैं। जो भी सत्ता के फैसलों के विरुद्ध खड़े हुए, उन्हें या तो ‘लोया गति’ (सीबीआई जज लोया) प्राप्त हुई या फिर ‘धनकड़ गति’ में सस्पेंड कर दिया गया।

कांग्रेस का इतिहास नाम और स्वरूप अलग, लेकिन प्रवृत्ति समान

धनकड़ गति की परंपरा कांग्रेस में भी रही, लेकिन वहां इसे कोई नाम नहीं मिला। अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, नारायण दत्त तिवारी, अमरिंदर सिंह जैसे नेताओं को बर्फ में डाला गया था। लेकिन फर्क यह है कि कांग्रेस में इसका संस्थागत नामकरण नहीं हुआ। भाजपा ने इसे शब्द और सांस्कृतिक पहचान दी।

राजनीति में ‘धनकड़ गति’ ही अब मुख्यधारा बनी

धनकड़ गति अब केवल एक व्यंग्यात्मक शब्द नहीं, बल्कि लोकतंत्र की एक सच्चाई बन चुकी है। लोकतंत्र में मुखरता की कीमत मौन से चुकानी होती है। सत्ता के चरम पर बैठे व्यक्ति जब असहमति को अपराध समझें तो ‘धनकड़ गति’ ही विपक्ष और असहमति का अंतिम मुकाम बनती है। इस समय पूरा राजनीतिक तंत्र इस भय के साए में है कि कहीं उन्हें भी ‘धनकड़’ न बना दिया जाए। यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। क्योंकि जहां ‘धनकड़ गति’ पुरस्कार है वहां जनप्रतिनिधित्व केवल नाटक रह जाता है।

* पूर्व उपराष्ट्रपति की रहस्यमय चुप्पी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी
* सत्ता के शीर्ष से अचानक गायब कर देना, जहां नेता की मौजूदगी हो लेकिन आवाज न हो
* जनसंघ से शुरू हुआ ‘ठंडे बस्ते’ का खेल
बलराज मधोक से लेकर आज तक नेताओं को विचारधारा के बावजूद किनारे किया
* मोदी युग में ‘धनकड़ गति’ संस्थागत बनी
* 2014 के बाद आडवाणी, जोशी, यशवंत सिन्हा जैसे दिग्गजों को खुलेआम साइडलाइन किया
* आईएएस, आईपीएस और जज भी इस गति से नहीं बचे
* असहमति जताने पर अफसरशाही और न्यायपालिका को भी हाशिये पर
* चारण-भाट संस्कृति बनाम धनकड़ गति
जो मोदी की स्तुति करता है वो बच जाता है, जो असहमति जताता है वह निष्कासित होता है
* कांग्रेस में भी रही ‘धनकड़ गति’ की छाया
लेकिन मोदी युग में इसे नाम, रूप और सार्वजनिक पहचान मिली
* भविष्य में कौन होगा अगला ‘धनकड़’
* सत्ता के समीप खड़े हर व्यक्ति को डर है कि अगला नम्बर उनका न हो

मोदी की नीति, कार्यशैली पर सवाल उठाने की हिमाकत करने वाला ‘धनकड़ गति’ को प्राप्त करता है!

‘धनकड़ का हाल हुआ बेहाल धनकड़ ही अपने दिल का हाल जानें, ये चंद लाइने , भारतीय राजनीति की एक गंभीर व्याख्या बन गई है।

जब देश के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़, जिनकी छवि एक मुखर और आक्रामक भाजपा समर्थक की रही, संसद सत्र के पहले दिन ही पूरी तरह से मौन हो जाएं, तो सवाल उठता है कि वे किस ‘गति’ को प्राप्त हुए हैं।

पूर्व उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद न तो उनका कोई सार्वजनिक वक्तव्य आया, न ही कोई विदाई भाषण, और न ही कोई पार्टीगत भूमिका का ऐलान। उनकी चुप्पी को लेकर कयासबाजी तेज है। भाजपा शासनकाल में बार-बार देखने को मिला है। खासकर तब, जब कोई नेता प्रधानमंत्री मोदी की नीति या कार्यशैली पर सवाल उठाने की हिमाकत करता है। भाजपा में धनकड़ गति को प्राप्त करने वालों की सूची लंबी होती जा रही है। इसमें सबसे पहला नाम जनसंघ संस्थापक बलराज मधोक का आता है, जिन्हें संघ और पार्टी ने उनके विचारों के बावजूद हाशिये पर डाल दिया।

लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डाल कर राजनीतिक वनवास दे दिया गया। यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा ने जब भाजपा की आर्थिक और वैचारिक दिशा पर सवाल उठाए, तो उन्हें निष्कासित कर दिया गया। सुब्रह्मण्यम स्वामी, जो आज भी ट्वीटर पर मोदी सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं, उन्हें भी पार्टी ने पूरी तरह किनारे कर दिया है।

यहां तक कि संघ के पुराने चेहरे जैसे गोविंदाचार्य, प्रवीण तोगड़िया और साध्वी ऋतंभरा भी इस गति से नहीं बच पाए। भाजपा में बैठा हर नेता जानता है कि अगला धनकड़ कौन होगा। सत्ता के चारण ही सुरक्षित हैं, बाकी सब डर के साए में जी रहे हैं।

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