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पत्रकार कौन: एल.एन. सिंह की हत्या और मीडिया की आत्मा का शोकगीत, पत्रकार संगठन क्यो है मौन

●  एल.एन. सिंह की हत्या और मीडिया की आत्मा का शोकगीत, पत्रकार संगठन क्यो है मौन

● पप्पू मर गया, पर पत्रकारिता की आत्मा भी साथ चली गई

● पत्रकार नहीं था, यह कहने वाले कौन हैं?

● बड़े संस्थान में नौकरी क्या यही पत्रकारिता की पहचान है?

● रिपोर्टर क्लब बनाम प्रेस क्लब जब पत्रकारों ने ही पत्रकारों को बांटा

● कवरेज पप्पू करे, क्रेडिट चैनल खा जाए

● सत्ता की गोद में बैठे ‘मीडिया संत’ और भूखे रिपोर्टर की लड़ाई

● मान्यता का ठप्पा ही पत्रकारिता का प्रमाणपत्र?

● पत्रकारिता को बचाने की आखिरी पुकार आत्ममंथन जरूरी

 

अनुज कुमार

 

प्रयागराज/मऊ: वाराणसी से लेकर लखनऊ व दिल्ली तक सवाल गूंज रहा है पत्रकार कौन? यह सवाल किसी व्यक्ति की पहचान का नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत से लिखी गई पत्रकारिता की परिभाषा का है। जब कोई जमीनी पत्रकार, जो जनता के लिए बोलता है, मारा जाता है और सत्ता-सेवक मीडिया यह तय करने बैठ जाता है कि वह पत्रकार था या नहीं, तो समझ लीजिए कि पत्रकारिता अब लोकतंत्र का स्तंभ नहीं, सत्ता का सेवक बन चुकी है। एल.एन. सिंह की हत्या सिर्फ एक इंसान की हत्या नहीं थी, वह उस पत्रकारिता की हत्या थी जो गांवों में सांस लेती थी, सच्चाई के लिए मरती थी, और सत्ता की मेज पर रोटी नहीं, बल्कि सच रखती थी। सरकारें आज मान्यता का ठप्पा देकर यह तय कर रही हैं कि पत्रकार कौन है, और वही ठप्पा सच्चाई की कीमत तय करने का औजार बन गया है। जो सत्ता की जय करे वह वरिष्ठ पत्रकार, जो सवाल करे वह ब्लैकमेलर करार दिया जाता है। यह वही दौर है जब कलम बिकती है, कैमरा किराए पर चलता है और जो आदमी सड़क पर सच्चाई दिखा दे उसकी लाश पुलिस चौकी के पास मिलती है। एल.एन. सिंह, जिन्हें कुछ लोग पप्पू कहते थे, उनकी हत्या के बाद सबसे शर्मनाक यह नहीं कि हत्यारे कौन थे, बल्कि यह कि कई पत्रकारों ने ही कहा वह पत्रकार नहीं था। यह वक्त पत्रकारिता का आईना है
जहां खबर लिखने वाले भी अब सत्ता के प्रवक्ता बन चुके हैं। यह रिपोर्ट उसी सड़े हुए तंत्र की तह में झांकने की कोशिश है, जहां पत्रकारिता के नाम पर ठेकेदारी चल रही है, जहां सच्चाई की हत्या का सौदा होता है,
और जहां सरकारें चाहती हैं कि पत्रकार भी लिखे जो वे चाहते हैं। एल.एन. सिंह की मौत यह बताने के लिए काफी है कि इस देश में सच बोलने वाले का जिंदा रहना मुश्किल है। अगर यह सवाल असुविधाजनक लगे, तो यही समझ लीजिए कि पत्रकारिता की मौत हो चुकी है, बस उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी बाकी है। जब जमीनी सरोकार से जुड़ा व्यक्ति मारा जाता है और तथाकथित बड़े पत्रकार उसकी हैसियत पर सवाल उठाने लगते हैं, तब यह पेशा आत्ममंथन की मांग करता है। क्या पत्रकारिता अब संस्थान की नौकरी और मान्यता पत्र का गुलाम हो चुकी है, या फिर समाज के पक्ष में कलम उठाने वाला हर व्यक्ति पत्रकार है। यह सिर्फ एक हत्या की नहीं, बल्कि पत्रकारिता के चरित्र, वर्गीय विभाजन और नैतिक पतन की पड़ताल है। एल.एन. सिंह की हत्या के बाद जिस तरह से मीडिया जगत में बहस छिड़ी है, उसने पत्रकारिता के असली अर्थ पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। कुछ लोगों ने कहा कि वह पत्रकार नहीं था। लेकिन सवाल यह है कि पत्रकार कौन तय करेगा? क्या केवल वही पत्रकार है जो किसी बड़े मीडिया हाउस में छोटी-सी कुर्सी पर बैठा हो या वह जो सड़क पर खड़ा होकर जनता की आवाज रिकॉर्ड कर रहा हो?

पत्रकारिता की आत्मा पप्पू मर गया के साथ चली गई!

एल.एन. सिंह, जिन्हें लोग ‘पप्पू’ के नाम से जानते थे, शायद इस व्यवस्था के लिए सिर्फ एक चेहरा थे पर वह उन हजारों जमीनी लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे जो बिना तनख्वाह, बिना मान्यता और बिना पद के भी समाज के लिए कलम उठाते हैं। उनकी मौत पर सवाल उठाने वालों ने कहा वह पत्रकार नहीं थे। लेकिन इस बात से पहले कि कोई यह तय करे कि कौन पत्रकार है, जरूरत है यह तय करने की कि पत्रकारिता क्या है।

पत्रकार नहीं कहने वाले कौन?

यह वही तबका है जो अखबार के हेडिंग पर नाम देखकर खुद को मीडिया का देवता समझता है। जो अपने कार्ड और मान्यता पत्र के बल पर सत्ता के गलियारों में घूमते हैं, लेकिन जनता की गलियों में शायद ही उतरते हों। एल.एन. सिंह के पास शायद चैनल का आईडी कार्ड नहीं था, पर उनके पास संवेदना थी, सरोकार था, जमीनी जुड़ाव था। क्या यह पत्रकारिता की पहली शर्त नहीं?

बड़े संस्थान में नौकरी ही पत्रकारिता की पहचान?

पत्रकारिता का पेशा कभी मिशन था, अब बिजनेस बन गया है। कभी सच्चाई की तलाश थी, अब सर्कुलेशन और टीआरपी की दौड़ है। वर्ष 1990 के दशक में भी यही सवाल उठा था कि क्या बड़े समूह में नौकरी करने वाला ही पत्रकार कहलाएगा। तब भी सीनियर पत्रकारों का एक गुट खुद को मठाधीश मानता था। प्रेस क्लब की जगह न्यूज रिपोर्टर क्लब बना, ताकि नए पत्रकार उस घेरे में न आ सकें। वही मानसिकता आज भी जीवित है पुराने चेहरे, नई कुर्सियां।

रिपोर्टर क्लब बनाम प्रेस क्लब

इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में 80 के दशक के अंत तक पत्रकारिता दो भागों में बंटी थी। पत्रकार और गैर पत्रकार। जिन्हें नौकरी नहीं मिली, उन्हें ‘गैर पत्रकार’ कहकर हाशिये पर धकेल दिया गया। मीडिया के भीतर गुटबंदी, ईर्ष्या और वर्चस्व की यह बीमारी आज भी उतनी ही ज़िंदा है। जिस संगठन को लोकतांत्रिक होना चाहिए था, वहां भी पदों पर मठाधीश बैठे रहे।

कवरेज कोई करे, क्रेडिट चैनल को

आज का दौर तकनीक का है। मोबाइल कैमरा और इंटरनेट ने खबर को लोकतांत्रिक बनाया है। लेकिन यह लोकतंत्र भी छलावा बन गया है। जमीनी रिपोर्टर मौके पर जाकर वीडियो बनाते हैं, बड़ी चैनलें वही फुटेज खरीदकर चलाती हैं, और स्क्रीन पर चमकता चेहरा किसी और का होता है। पप्पू भी ऐसे ही जमीनी, लेकिन अदृश्य पत्रकार थे। उनका फुटेज, उनकी कवरेज, उनके विजुअल चले, लेकिन नाम मिटा दिया गया।

मीडिया संत और भूखे रिपोर्टर की लड़ाई

आज पत्रकारिता दो हिस्सों में बंटी है, एक तरफ वे जो सत्ता की गोद में बैठकर मठाधीशी कर रहे हैं, दूसरी तरफ वे जो पसीना बहा रहे हैं, पर मान्यता तक नहीं पाते। जो सत्ता के भ्रष्टाचार को उजागर करे वह सरकार विरोधी ठहराया जाता है, और जो सत्ता की पीठ थपथपाए वह वरिष्ठ पत्रकार कहलाता है। यही विडंबना आज पत्रकारिता की कब्र खोद रही है।

मान्यता ही पत्रकारिता का प्रमाणपत्र

अगर पत्रकार की परिभाषा केवल मान्यता प्राप्त व्यक्ति तक सीमित है, तो देश में मुश्किल से पांच प्रतिशत लोग ही पत्रकार कहलाएंगे। इनमें भी कई ऐसे नाम हैं जिनके मान्यता पत्रों पर उंगलियां उठती हैं। किसी अखबार मालिक का ड्राइवर, चपरासी, रिश्तेदार तक मान्यता सूची में शामिल है। क्या यही चौथा स्तंभ है?

पत्रकारिता को बचाने के लिए आत्ममंथन जरूरी

पत्रकारिता का संकट केवल पेशे का नहीं, चरित्र का भी है। कई जगह वही पत्रकार माफियाओं, बिल्डरों, ट्रांसफर-लॉबी और नेताओं के साथ बैठकर डील करते हैं। फिर वही लोग पत्रकार कौन का प्रश्न उठाते हैं।
ऐसे में असली पत्रकार जो भूखा है, जो डटा है, जो सच कहता है उसे हाशिए पर डाल दिया जाता है। एल.एन. सिंह जैसे लोगों की मौत सिर्फ हत्या नहीं पत्रकारिता की आत्मा की हत्या है। पत्रकार होना अब कार्ड रखने से नहीं, बल्कि जनता के पक्ष में कलम चलाने से तय होगा। जो सच बोलेगा, वही पत्रकार कहलाएगा चाहे वह अखबार में हो, चैनल में हो, या सड़क पर कैमरा लेकर खड़ा हो।

* एल.एन. सिंह की हत्या ने पत्रकारिता की असली परिभाषा पर सवाल उठाया।
* संस्थागत मान्यता की राजनीति ने जमीनी पत्रकारों को ‘गैर पत्रकार’ बना दिया।
* सोशल मीडिया ने खबर को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन क्रेडिट का शोषण जारी है।
* सत्ता और मीडिया के गठजोड़ ने चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर गहरा घाव दिया।
* पत्रकारिता को बचाने के लिए अब आत्ममंथन और सामाजिक सरोकार की वापसी जरूरी है।

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