
● योगी सरकार तानाशाही कर रही लगातार, पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर को भेज दिया कारागार
● करीबियों के फर्जीवाड़े, कफ सिरप घोटाले व सवाल पूछने वालों की गिरफ्तारी में खांसती योगी सरकार
● सीएम के करीबी अफसरों पर फर्जी पैन और जाली खातों से अरबों की खरीद
● इनकम टैक्स रिपोर्ट के बावजूद सरकार की रहस्यमयी चुप्पी
● कफ सिरप घोटाले में मुख्य आरोपी अब भी आजाद
● सवाल पूछने वाले पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर गिरफ्तार
● 25 साल पुराने सिविल विवाद में अचानक गंभीर एफआईआर
● आधी रात ट्रेन से उतारकर गिरफ्तारी कानून का डर या प्रदर्शन
● पत्नी को बिना सूचना, सोशल मीडिया अकाउंट बंद
● अपराधी फरार, सवालिया सलाखों के पीछे यही है न्याय व्यवस्था
◆ अंशिका मौर्या
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस समय न केवल राजनीतिक, बल्कि नैतिक और संवैधानिक संकट से भी जूझती नजर आ रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री के बेहद करीबी अफसरों अलका दास व विराज सागर दास पर फर्जी पैन कार्ड, जाली बैंक खातों और नकली नामों के जरिए जमीनों व कंपनियों की खरीद-बिक्री जैसे गंभीर आरोप इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट में दर्ज हैं, तो दूसरी तरफ उसी सरकार से सवाल पूछने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को आधी रात ट्रेन से उतारकर गिरफ्तार कर लिया जाता है। इन दोनों घटनाओं का एक साथ सामने आना महज़ संयोग नहीं, बल्कि सत्ता की प्राथमिकताओं और मंशा को उजागर करने वाला संकेत है। इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट किसी राजनीतिक दल का आरोप नहीं, किसी एक्टिविस्ट का बयान नहीं, बल्कि एक संवैधानिक एजेंसी का आधिकारिक दस्तावेज है। इसके बावजूद योगी सरकार की ओर से अब तक न कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है, न जांच का आदेश, न ही संबंधित अफसरों पर कोई कार्रवाई। यह चुप्पी सामान्य नहीं है। यह चुप्पी बताती है कि मामला सरकार के लिए असहज है। इसी बीच कोडीन युक्त कफ सिरप घोटाले ने सरकार को पहले से ही कटघरे में खड़ा कर रखा है। अवैध सप्लाई, अंतरराज्यीय तस्करी और सत्ता-संरक्षण के आरोपों ने ‘जीरो टॉलरेंस’ के सरकारी दावे को खोखला साबित किया है। पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर लगातार इस पूरे मामले में सवाल उठा रहे थे, जांच की मांग कर रहे थे और एसआईटी की निष्पक्षता पर भी सवाल रख रहे थे। शायद यही उनकी सबसे बड़ी गलती बन गई। जब कफ सिरप घोटाले के मुख्य आरोपी और सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोग खुलेआम घूम रहे हों, तब 25 साल पुराने एक कथित सिविल विवाद को अचानक गंभीर आपराधिक मामला बनाकर आधी रात एक पूर्व आईपीएस की गिरफ्तारी, कानून व्यवस्था नहीं बल्कि सत्ता की घबराहट को दर्शाती है। यह गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सवाल पूछने की संस्कृति पर सीधा हमला है। आज योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ का अर्थ स्पष्ट होता जा रहा है। अपराधियों के लिए संरक्षण और सवाल पूछने वालों के लिए दमन।
अलका दास व विराज सागर दास पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप
उत्तर प्रदेश में सत्ता और सिस्टम के गठजोड़ की परतें एक बार फिर खुलती नजर आ रही हैं। इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बेहद करीबी माने जाने वाले अफसर अलका दास और विराज सागर दास को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन अफसरों पर फर्जी पैन कार्ड, जाली बैंक खातों और नकली पहचान के माध्यम से आयकर रिटर्न दाखिल करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर जमीनों और कंपनियों की खरीद-फरोख्त करने के आरोप हैं। यह कोई तकनीकी गलती या प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है। ऐसे मामलों में सामान्यत ईडी, सीबीआई या विभागीय जांच शुरू होती है, लेकिन यहां उल्टा दृश्य है। सरकार पूरी तरह मौन है। न मुख्यमंत्री कार्यालय से कोई प्रतिक्रिया, न वित्त विभाग से सफाई, न ही संबंधित अफसरों को पद से हटाने की कोई पहल।
इसी चुप्पी के बीच कफ सिरप घोटाले ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध सप्लाई, खासकर बिहार और अन्य राज्यों में तस्करी, लंबे समय से चर्चा में रही है। आरोप यह भी हैं कि इस पूरे नेटवर्क को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है। पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने इस मामले में खुलकर सवाल उठाए और निष्पक्ष जांच की मांग की। विगत दिनों अमिताभ ठाकुर लखनऊ से दिल्ली जा रहे थे। शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन पर सादी वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें ट्रेन से उतार लिया। न कोई औपचारिक सूचना, न गिरफ्तारी की पूर्व जानकारी, न ही उनकी पत्नी नूतन ठाकुर को कोई संदेश। इसके उलट, गिरफ्तारी के तुरंत बाद अमिताभ और नूतन ठाकुर दोनों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए गए। यह कदम इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सोशल मीडिया ही वह माध्यम था, जहां से वे लगातार सवाल उठा रहे थे। पुलिस का कहना है कि यह गिरफ्तारी 1999 के एक मामले में की गई है, जिसमें प्लॉट आवंटन के दौरान नाम और पते में कथित गड़बड़ी का आरोप है। सवाल यह है कि 25 साल तक यह मामला क्यों दबा रहा? सितंबर 2025 में ही इसमें गंभीर धाराएं क्यों जोड़ी गईं। ठीक उसी समय यह कार्रवाई हुई जब कफ सिरप घोटाले को लेकर सरकार चौतरफा घिरती जा रही थी। विडंबना यह है कि कफ सिरप घोटाले का मुख्य आरोपी शुभम जायसवाल आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। सत्ता से जुड़े एक बाहुबली नेता पर लगे आरोपों पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। फरार आरोपी वीडियो जारी कर रहे हैं, लेकिन पुलिस की सक्रियता सवाल पूछने वालों पर दिखाई देती है। 9 दिसंबर को सरकार ने एसआईटी के गठन की घोषणा की थी। उम्मीद थी कि एसआईटी असली अपराधियों तक पहुंचेगी। लेकिन उसकी पहली बड़ी कार्रवाई एक ऐसे पूर्व आईपीएस की गिरफ्तारी के रूप में सामने आई, जिसका कफ सिरप घोटाले से सीधा कोई संबंध नहीं सिवाय इसके कि वह सरकार से जवाब मांग रहा था। यह पूरा घटनाक्रम इस आशंका को और मजबूत करता है कि उत्तर प्रदेश में कानून अब अपराध नियंत्रण का माध्यम नहीं रह गया है। यह सत्ता की आलोचना को कुचलने और असहमति को दबाने का औजार बनता जा रहा है। सवाल यह नहीं कि अमिताभ ठाकुर निर्दोष हैं या दोषी सवाल यह है कि कानून का इस्तेमाल किसके खिलाफ और किसे बचाने के लिए किया जा रहा है।
कफ सिरप घोटाले ने सरकार की मुश्किलें बढ़ाई
कफ सिरप घोटाले ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध सप्लाई, अंतरराज्यीय नेटवर्क और सत्ता-संरक्षण के आरोप पहले से ही हवा में थे। पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर लगातार इस मामले में सरकार से सवाल पूछ रहे थे। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ‘गलती’ बन गई। विगत दिनों लखनऊ से दिल्ली जा रहे अमिताभ ठाकुर को शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन पर सादी वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मियों ने ट्रेन से उतार लिया। न कोई पूर्व सूचना, न पत्नी नूतन ठाकुर को जानकारी। गिरफ्तारी के तुरंत बाद अमिताभ और नूतन दोनों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए गए। जो अपने आप में अभूतपूर्व और संदिग्ध कदम है। पुलिस का दावा है कि यह गिरफ्तारी 1999 के एक मामले में की गई है, जिसमें प्लॉट आवंटन के दौरान नाम-पते में कथित गड़बड़ी का आरोप है। सवाल यह है कि 25 साल पुराने इस कथित सिविल विवाद में सितंबर 2025 में अचानक गंभीर धाराओं में एफआईआर क्यों दर्ज हुई, और ठीक उसी समय जब कफ सिरप घोटाले में सरकार की घेराबंदी तेज हो रही थी।
कफ सिरप मामले का मुख्य आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर
विडंबना यह है कि कफ सिरप मामले का मुख्य आरोपी शुभम जायसवाल आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। वहीं, सत्ता से जुड़े एक बाहुबली नेता पर लगे आरोपों पर भी कार्रवाई ठंडे बस्ते में है। लेकिन सवाल उठाने वाला व्यक्ति तुरंत ‘फरार आरोपी’ घोषित कर गिरफ्तार कर लिया जाता है। योगी सरकार ने 9 दिसंबर को एसआईटी का गठन किया था। उम्मीद थी कि वह असली अपराधियों तक पहुंचेगी। लेकिन एसआईटी की पहली बड़ी कार्रवाई एक ऐसे पूर्व आईपीएस की गिरफ्तारी बनी, जिसका कफ सिरप घोटाले से सीधा कोई संबंध नहीं है सिवाय इसके कि वह सरकार से जवाब मांग रहे थे। यह पूरा घटनाक्रम इस आशंका को बल देता है कि यूपी में कानून अब अपराध नियंत्रण का नहीं, बल्कि असहमति नियंत्रण का औजार बनता जा रहा है।
* अलका दास और विराज सागर दास पर फर्जी पैन और खातों से आर्थिक लेन-देन
* इनकम टैक्स रिपोर्ट के बावजूद सरकार की चुप्पी
* कफ सिरप घोटाले के मुख्य आरोपी अब भी फरार
* अमिताभ ठाकुर की आधी रात ट्रेन से गिरफ्तारी
* 25 साल पुराने सिविल विवाद में अचानक एफआईआर
* सोशल मीडिया अकाउंट बंद करना लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट
* एसआईटी की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल
* अपराधियों से जायद प्रश्न करने वालों पर कार्रवाई का आरोप




