वाराणसी के सीएमओ डॉ.सन्दीप चौधरी बना “शाका”, पीएम जन औषधि योजना गरीबों की दवा पर डाका

● सरकारी संरक्षण में लूट का तांडव, चिकित्साकर्मी बने दानव
● जन औषधि नहीं, जन-लूट योजना बनती हकीकत
● वाराणसी के सीएमओ डॉ.सन्दीप चौधरी बना “शाका”, पीएम जन औषधि योजना गरीबों की दवा पर डाका
● सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी का वरदहस्त या मौन सहमति
● सरकारी सस्ती दवा, निजी दुकानों में महंगी बिकती साजिश
● चिकित्सकों की मिलीभगत मरीज नहीं, ‘कस्टमर’ बनाए
● निरीक्षण के नाम पर नौटंकी, सूचना मिलते ही सब ‘क्लीन’
● गरीब की बीमारी पर कमीशन का धंधा
● प्रशासन की चुप्पी संरक्षण या हिस्सेदारी
● काशी की गरिमा पर सबसे बड़ा कलंक जन औषधि में संगठित भ्रष्टाचार
◆ सजंय पटेल
वाराणसी। जिस योजना का नाम सुनते ही देश के गरीब, मजदूर, बुज़ुर्ग और बीमार नागरिक को राहत का भरोसा मिलता है, उसी प्रधानमंत्री जन औषधि योजना को वाराणसी में लूट, दलाली और भ्रष्टाचार का खुला मैदान बना दिया गया है। यह कोई आरोप नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई है जिसे प्रशासन जानता है, स्वास्थ्य विभाग देखता है, और सीएमओ कार्यालय चुपचाप सहन करता है। जन औषधि योजना का मूल उद्देश्य था सस्ती, गुणवत्तापूर्ण दवा हर जरूरतमंद तक पहुंचे। लेकिन काशी में यह योजना मरीजों के लिए नहीं, बल्कि चिकित्सकों, दवा विक्रेताओं और अफसरों की जेब भरने का जरिया बन चुकी है। सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी क्लीनिकों तक, एक सुनियोजित नेटवर्क काम कर रहा है। जिसमें मरीज को मजबूरी में महंगी दवा खरीदने पर धकेला जाता है, जबकि वही दवा जन औषधि केंद्र पर बेहद सस्ती उपलब्ध है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि यह सब किसके संरक्षण में हो रहा है?
बिना स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत, बिना सीएमओ कार्यालय की आंख मूंदे, इतना बड़ा खेल संभव नहीं। कागजों में निरीक्षण होते हैं, फाइलों में कार्रवाई होती है
और जमीनी हकीकत में लूट चलती रहती है। सूचना मिलते ही जन औषधि केंद्रों की खामियां साफ हो जाती हैं। दवाएं अचानक उपलब्ध दिखने लगती हैं। रेट लिस्ट टंग जाती है, निरीक्षण टीम के जाते ही सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण है। काशी जिसे संस्कृति, करुणा और मानवता की नगरी कहा जाता है वहां गरीब की बीमारी को मुनाफे का अवसर बना दिया गया है। यह जन औषधि योजना की विफलता नहीं, बल्कि उसकी सुनियोजित हत्या है।
योजना का मकसद बनाम सच्चाई
जन औषधि योजना का मकसद था दवा माफिया की कमर तोड़ना। काशी में वही योजना नया माफिया खड़ा करने का माध्यम बन गई है। हालात ये हैं कि सरकारी अस्पतालों में जन औषधि की दवा लिखी ही नहीं जाती
निजी ब्रांड की दवाएं जबरन लिखी जाती है। मरीज से साफ कहा जाता है कि जन औषधि बेअसर है खाओगे तो कैंसर हो जायेगा। कमीशन का पूरा गणित, हर ब्रांडेड दवा पर तय कमीशन डॉक्टर, दुकानदार, डीलर की त्रिकोणीय सांठगांठ मरीज सिर्फ भुगतान कर्ता।
निरीक्षण दिखावा और धोखा
पहले से सूचना केंद्रों में अस्थायी सुधार कार्रवाई शून्य, सीएमओ कार्यालय की भूमिका डॉ. संदीप चौधरी के कार्यकाल में शिकायतें आईं सबूत दिए गए लेकिन कार्रवाई नहीं। गरीब मरीज इसका सबसे बड़ा शिकार, इलाज छोड़ने को मजबूर, कर्ज लेकर दवा खरीद को मजबूर, बीमारी से ज्यादा डर खर्च का। प्रशासन की चुप्पी मासूम नहीं है। यह चुप्पी संरक्षण की गवाही देती है। क्या सीएमओ की संपत्ति की जांच होगी, चिकित्सकों के प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट होंगे, जन औषधि केंद्रों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट होगा।
* जन औषधि योजना काशी में लूट का माध्यम
* चिकित्सकों-दुकानदारों की संगठित मिलीभगत
* सीएमओ कार्यालय की संदिग्ध चुप्पी
* निरीक्षण केवल औपचारिकता
* गरीब मरीज सबसे बड़ा शिकार
* प्रशासनिक संरक्षण के बिना असंभव
* काशी की गरिमा पर गहरा आघात
काशी में स्वास्थ्य का मुखिया या भ्रष्टाचार का मौन संचालक
मुख्य चिकित्सा अधिकारी केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं होता। वह जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा, उसकी अंतरात्मा और उसकी जवाबदेही का सबसे ऊंचा बिंदु होता है। लेकिन जब वही चेहरा सवालों से बचने लगे, वही अंतरात्मा मौन साध ले और वही कुर्सी जनता की पीड़ा पर चुप्पी की चादर डाल दे तब समझ लेना चाहिए कि मामला लापरवाही का नहीं, संरक्षण का है। प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के नाम पर काशी में जो कुछ हो रहा है, वह किसी एक दुकान, एक डॉक्टर या एक कर्मचारी की गड़बड़ी नहीं है।
यह एक व्यवस्थित, संरक्षित और संस्थागत लूट है। जिसका सबसे बड़ा गवाह भी सीएमओ कार्यालय है और सबसे बड़ा आरोपी भी। डॉ.संदीप चौधरी के कार्यकाल में जन औषधि योजना गरीबों की दवा नहीं रही, बल्कि कमीशन आधारित चिकित्सा बाजार का हिस्सा बन चुकी है। सरकारी अस्पतालों में बैठा डॉक्टर जब मरीज को जन औषधि की दवा लिखने से इनकार करता है, वह खुलेआम कहता है कि ये दवा काम की नहीं है। जब मरीज को निजी मेडिकल स्टोर का पता थमा दिया जाता है तो यह सब किसी व्यक्तिगत राय का परिणाम नहीं होता। यह एक ऊपर तक फैले भरोसे का नतीजा होता है भरोसा कि कोई पूछने वाला नहीं। मरीजों की शिकायतें, लिखित प्रार्थना पत्र, विभागीय सूत्रों की गोपनीय जानकारियां सब कुछ सीएमओ कार्यालय तक पहुंचा। लेकिन हर शिकायत का अंत एक ही जगह आकर रुका कार्रवाई शून्य, न एफआईआर, न सार्वजनिक जांच रिपोर्ट, न किसी डॉक्टर की जवाबदेही तय हुई। यह कैसी व्यवस्था है जहां शिकायतें होती हैं, पर न्याय गायब हो जाता है? जिस दिन जन औषधि केंद्रों का निरीक्षण होना होता है, उसी दिन अचानक सब कुछ दुरुस्त दिखने लगता है दवाएं उपलब्ध, स्टॉक रजिस्टर अपडेट, रेट लिस्ट चमकती हुई। यह चमत्कार नहीं है, यह सूचना लीक होने का प्रमाण है। सूचना वहीं से लीक होती है, जहां से आदेश निकलते हैं। स्वास्थ्य विभाग के भीतर एक डर का माहौल है। कर्मचारी खुलकर बोलने से डरते हैं। नाम छापने की बात तो दूर, फाइल पर सवाल उठाना भी ट्रांसफर का न्योता माना जाता है। यह डर किसी बाहरी माफिया ने नहीं पैदा किया, यह डर प्रशासनिक संस्कृति की देन है, जिसका संचालन सीएमओ करता है। सबसे विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि जिस जन औषधि योजना को केंद्र सरकार दवा माफिया के खिलाफ हथियार बताती है, उसी योजना को वाराणसी में नए दवा माफिया की ढाल बना दिया गया है। यह सब उस शहर में हो रहा है जिसे देश प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण मॉडल कहा जाता है। यदि यह मॉडल है, तो सवाल यह है कि फिर बाकी देश की हालत क्या होगी। सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी की भूमिका अब सिर्फ एक अधिकारी की नहीं रह जाती। यह भूमिका तय करती है कि गरीब मरीज को सस्ती दवा मिलेगी या नहीं डॉक्टर कानून से डरेंगे या नहीं। जब इन सवालों का जवाब नकारात्मक हो, तो यह मान लेना पड़ेगा कि चुप्पी अपराध में बदल चुकी है।
सीएमओ की जिम्मेदारी और हकीकत
दवा की उपलब्धता सुनिश्चित करना, डॉक्टरों की जवाबदेही तय करना, योजनाओं की निगरानी, कोई प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट नहीं, कोई स्वतंत्र निरीक्षण नहीं, कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई। कितनी शिकायतों पर एफआईआर हुई, कितने डॉक्टर पर कार्रवाई हुई क्या इसका विवरण सीएमओ डॉ.संदीप चौधरी देंगे।
डॉक्टर बेलगाम हुए कैसे
जब तक ऊपर से संरक्षण न हो, डॉक्टर मरीज को धमका नहीं सकते, जन औषधि को बदनाम नहीं कर सकते, निजी दुकानों से खुलेआम सेटिंग नहीं कर सकते, यह बेलगामी सीएमओ की चुप्पी की देन है। निरीक्षण का खेल पहले सूचना, बाद में नाटक, स्वास्थ्य विभाग के भीतर चर्चा है कि निरीक्षण टीमों की सूची पहले भेजी जाती है केंद्रों को सजाया जाता है, रिपोर्ट पहले से तैयार होती है। अगर ऐसा नहीं है, तो सीएमओ सार्वजनिक करें कि निरीक्षण की वीडियोग्राफी कराई गई, अचानक मारे गए छापों का रिकॉर्ड कहां है। कर्मचारी बोलने से क्यों डरते हैं, स्वास्थ्य कर्मी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं यहां सवाल पूछना ट्रांसफर का न्योता है।




