
- तीनों संविधान संशोधन बिल पास करवाने के लिए सरकार को चाहिए था दो-तिहाई बहुमत
- बिल के समर्थन में पड़े 298 और विरोध में 230, चाहिए थे 352 वोट
- भाजपा पर परिसीमन के जरिए 2029 के लोकसभा चुनाव को जीतने की साजिश करने का आरोप
- सरकारी अधिसूचना के जरिए महिला आरक्षण बिल 16 अप्रैल से लागू
- अब सरकार को मौजूदा 543 सांसदों में ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देना होगा

नई दिल्ली। महिला आरक्षण की आड़ में संसद के विशेष सत्र में लाया गया संविधान संशोधन बिल शुक्रवार को लोकसभा में धाराशायी हो गया। केंद्र सरकार मूल रूप से देश की संसदीय सीटों का परिसीमन कर संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने के इरादे से तीनों संविधान संशोधन बिल लेकर आई थी। लेकिन एकजुट विपक्ष ने सरकार के इरादों पर पानी फेर दिया। बिल के समर्थन में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को बिल पास करवाने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन 54 वोट कम रह गए।
इस पहली हार से खीझे भाजपा की महिला सांसदों ने लोकसभा का सत्र खत्म होते ही सदन के बाहर आकर विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए नारेबाजी शुरू कर दी। इस बीच, पीएम नरेंद्र मोदी ने शनिवार सुबह कैबिनेट की बैठक बुलाई है। उम्मीद यही है कि सरकार इसमें महिला आरक्षण के मुद्दे को आम जनता के बीच ले जाने का रोडमैप तैयार करेगी। विपक्ष ने इसे हार के बावजूद जीत का सेहरा बांधने का भाजपा का प्रयास करार दिया है।
केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को संसद के तीन दिवसीय विशेष अधिवेशन के पहले दिए लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए थे। ये तीन विधेयक केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
और परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026) के रूप में पेश किए गए थे। सरकार को तीनों संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए कुल 362 वोटों की जरूरत थी। लेकिन शुक्रवार को लोकसभा में 543 में से 528 सांसद ही उपस्थित थे। सत्ता और विपक्ष के कई सांसद सदन में गैर हाजिर रहे, क्योंकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को विधानसभा चुनाव है।
संसद में मोदी सरकार की पहली हार
तीनों संविधान संशोधन विधेयकों को लोकसभा में पारित न करवा पाना केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की संसद में पहली हार है। इससे पहले 2002 में तत्कालीन केंद्र सरकार का आतंकवाद निरोधक कानून संसद में गिर गया था। संसद में केंद्र सरकार के विधेयक गिरने का पहला मामला 1990 में सामने आया था, जब सरकार का 64वां संविधान संशोधन कानून पास नहीं हो सका था।
अब आगे क्या होगा?
संसद सर्वसम्मति से महिला आरक्षण बिल 2023 में ही पास कर चुकी है। केंद्र सरकार असल में परिसीमन के साथ इस बिल को लागू करना चाह रही थी। लेकिन हार की आशंका से केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को ही एक अधिसूचना के जरिए महिलाओं को आरक्षण लागू कर दिया। इसके बाद शुक्रवार को परिसीमन बिल के गिरने के बाद केंद्र सरकार के पास वर्तमान लोकसभा के 543 सांसदों की संख्या के आधार पर ही महिला आरक्षण बिल को लागू करना होगा। यानी कुल 188 महिला सांसदों को चुनकर लोकसभा में भेजना ही होगा। इसके लिए रोटेशन के नियम भी संसद ही बनाएगी। केंद्र सरकार इस संबंध में नया बिल पेश कर सकती है। लेकिन सरकार जिस कम में नाकाम रही है, वह परिसीमन कानून को लागू न कर पाना है, वरना लोकसभा की सदस्य संख्या न केवल बढ़ जाती, बल्कि महिला सांसदों की संख्या में भी इजाफा हो जाता। हालांकि, अब यह काम जनगणना की ताजा प्रक्रिया के अगले साल पूरा होने के बाद ही संभव हो सकेगा। देश में जनगणना की प्रक्रिया भी 15 अप्रैल से ही शुरू हुई है और इसके पूरा होने में अभी डेढ़ साल का समय लग सकता है और तब तक सरकार को इंतजार करना होगा।
क्या है इन विधेयकों में?
केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल, 2026 को 16 अप्रैल, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। इसका उद्देश्य निम्नलिखित कानूनों में संशोधन करना है: (i) केंद्र शासित प्रदेश सरकार एक्ट, 1963, (ii) दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार एक्ट, 1991, और (iii) जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019। यह पुद्दूचेरी, दिल्ली और जम्मू एवं कश्मीर की विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के नियमों में बदलाव करता है। लेकिन जिन दो विधेयकों को लेकर संसद में बवाल है, उनमें सबसे पहले है संविधान संशोधन विधेयक 2026 (131वां) में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी। इनमें से 815 सीटें राज्यों से आएंगी और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों से। फ़िलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है, क्योंकि बाकी सात सीटें मनोनीत होती हैं। इसी के आधार पर केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव लेकर आई है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके। यह संविधान संशोधन विधेयक लाया ही इसलिए गया है, क्योंकि 1976 के बाद से संसद की सीटों की संख्या नहीं बढ़ पाई है, क्योंकि अनुच्छेद 81 यह कहता है कि जब तक जनगणना का काम खत्म नहीं हो जाता, सरकार संसद में सीटों की संख्या नहीं बढ़ा सकती। जनगणना का काम 15 अप्रैल 2026 से शुरू हुआ है, जिसमें संगणकों को घर-घर जाकर जनगणना करने के आदेश दिए गए हैं। पिछली जनगणना 2011 को हुई थी। कानूनन हर 10 साल बाद जनगणना कराने का प्रावधान है। इस आधार पर 2021 में जनगणना का काम शुरू हो जाना चाहिए था, जिसे सरकार ने कोविड महामारी के कारण टाल दिया। अब विपक्ष सवाल कर रहा है कि जब मौजूदा लोकसभा में कुल 543 सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई है तो फिर सरकार किस आधार पर सीटों की संख्या का बढ़ाकर 850 करने जा रही है?
विपक्ष को उलझाने महिला आरक्षण की आड़
केंद्र सरकार ने गुरुवार को जो परिसीमन कानून का मसौदा विधेयक के रूप में लेकर आई है, उस पर विपक्ष को उलझाने के लिए महिला आरक्षण का सवाल रखा गया है, जिसे संसद ने तीन साल पहले 2023 में पारित किया था। महिला आरक्षण बिल के पारित होने के बाद भी उसे इसलिए लागू नहीं किया जा सका, क्योंकि उसके लिए नई जनगणना के आधार पर महिला प्रतिनिधित्व की सीटें तय की जानी थीं। लेकिन चूंकि केंद्र सरकार ने कोविड की आड़ में जनगणना नहीं करवाई, इसलिए केंद्र सरकार अब चाहती है कि 2011 की पुरानी जनणना को आधार बनाकर परिसीमन कानून को संविधान संशोधन के जरिए लागू किया जाए। अब संसद को यह तय करना है कि परिसीमन कानून 2011 की जनगणना के आधार पर होगा कि 2026 की जनगणना के आधार पर।
बराबरी के अनुपात पर चोट
अब तक हर राज्य को मिलने वाली संसदीय सीटों की संख्या इस आधार पर तय होती रही है कि किसी राज्य की आबादी और उसकी निर्वाचन सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग बराबर रहे। यानी पूरे भारत में हर एक सीट लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करेगी। केंद्र सरकार की अब यह दलील है कि महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता तभी साफ हो सकता है, जब परिसीमन कानून लागू हो जाए। इसके लागू होने के बाद ही 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण को पूरी तरह से देश में लागू किया जा सकता है।
सरकार की मंशा पर सवाल
सरकार ने विपक्ष को महिला आरक्षण की आड़ में उलझाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन उत्तर-बनाम दक्षिणी राज्यों में नए परिसीमन कानून के कारण होने वाले नुकसान के दावे ने अब सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दक्षिणी राज्यों का कहना है कि चूंकि दक्षिण के पांच राज्यों में जनसंख्या वृद्धि का अनुपात उत्तर भारत के चार प्रमुख राज्यों से कम है, इसलिए उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में उनकी सीटें घट जाएंगी। यह संसदीय सीटों में जनसंख्या के अनुपात पर सीधे हमला है। इससे देश में प्रत्येक संसदीय और विधानसभा सीटा का जनसंख्या के आधार पर परे देश में बराबरी का अनुपात प्रभावित होगा। विपक्ष का भी यह कहना है कि केंद्र सरकार इसे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने और मुस्लिम सीटों को हिंदू बहुत करने के मकसद से कर रही है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को फायदा हो। विपक्ष के इस सवाल ने असल में महिला आरक्षण के सरकार के मुखौटे को उजागर कर दिया है। विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट है और इसी के कारण संसद में सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है।
सरकार की गारंटी पर यकीन नहीं
पीएम मोदी ने गुरुवार को महिला आरक्षण बिल से जुड़े संशोधनों पर कहा कि परिसीमन में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। यह मोदी की गारंटी है और वादा है। विपक्ष इसका क्रेडिट ले सकता है। प्रियंका गांधी ने कहा, ‘वे (पीएम) कह रहे हैं कि उन्हें इसका श्रेय नहीं चाहिए। मैं कहती हूं कि बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं पहचान लेती है। सावधान हो जाइए नहीं तो पकड़े जाएंगे।’ गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि एक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि 3 बिलों से साउथ के राज्यों की लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी। उन्होंने कहा, ‘लोकसभा की कुल 543 सीटों में दक्षिण राज्यों की 129 सीटें हैं। परिसीमन के बाद यह बढ़कर 195 हो जाएंगी। तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 होंगी।’ केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को कहा कि लोकसभा की कुल संख्या बढ़ाकर 815 की जाएगी, जिनमें से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। मेघवाल ने गुरुवार को कहा कि इस आरक्षण के लागू होने से न तो पुरुषों को और न ही किसी राज्य को कोई नुकसान होगा। प्रस्तावित कानूनों के अनुसार, लोकसभा की वर्तमान संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि इस विधेयक से किसी को नुकसान नहीं होगा।
अखिलेश ने सरकार को घेरा
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की ओर से बोलते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी महिला आरक्षण विधेयक का तब तक समर्थन नहीं करेगी जब तक इसमें ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रावधान शामिल नहीं होते। उन्होंने सरकार से विधेयकों को वापस लेने और इसके बजाय 2023 के कानून को लागू करने का आग्रह किया। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने विधेयक लाने की सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जनगणना क्यों नहीं कराई गई। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जातिगत जनगणना से बच रही है क्योंकि इससे आरक्षण बढ़ाने की मांग उठेगी। उन्होंने सरकार पर इन चिंताओं को दूर किए बिना जल्दबाजी में विधेयक लाने का आरोप लगाया। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि पार्टी संवैधानिक आधार पर तीनों विधेयकों का कड़ा विरोध करती है और आरोप लगाया कि ये संविधान को “विकृत” करने का प्रयास हैं, खासकर परिसीमन को जनगणना से अलग करके।
बिल की कॉपी जलाईं
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार को परिसीमन बिल की कॉपी जलाई। राज्य में सत्तारूढ़ स्टालिन सरकार ने काले कपड़ों में विरोध जताया। स्टालिन ने कहा कि राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश “लोकतंत्र पर हमला” है। उन्होंने कहा, “जब केंद्र सरकार ने हमसे जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण, छोटे परिवार रखने और परिवार नियोजन के उपाय अपनाने को कहा, तो हमने (तमिलनाडु ने) उसका पालन किया। क्या अब अनुशासित तरीके से काम करने की यही सज़ा है?” उधर, केंद्र सरकार बार-बार यह आश्वासन देती रही है कि संसद की मौजूदा संरचना में राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, लेकिन चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा कि इसे सुनिश्चित करने के लिए इन तीनों विधेयकों में कुछ भी नहीं है।

रेवंत रेड्डी का नया फॉर्मूला
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष और बीजेपी के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर उनसे अपील की है कि वे दक्षिणी राज्यों के साथ मिलकर सीटें बढ़ाने के ‘प्रो-राटा मॉडल’ का विरोध करें। रेड्डी का कहना है कि चूंकि दक्षिणी भारतीय राज्य अधिक विकसित हैं। देश की जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी ज्यादा है, उनका जीएसटी कलेक्शन भी उत्तर भारतीय राज्यों से अधिक है, इसलिए उन्हें ज्यादा सीटों की मांग करनी चाहिए।
भारत की आर्थिकी में दक्षिणी भारत के पांच राज्यों- तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आधंप्रदेश और तेलंगाना की बात की जाए तो जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 21 फीसदी होने के बाद भी भारत की जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी 31% के करीब है। वहीं, उत्तर भारत के चार राज्यों- यूपी बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान की जनसंख्या में हिस्सेदारी 42% तक है, लेकिन जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी 21% ही है। हालांकि, रेड्डी के इस फॉर्मूले के आधार पर उत्तर भारतीय राज्यों को उनकी पिछड़ेपन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी तरह आर्थिक उत्पादन के मामले में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच ढाई गुने से ज्यादा अंतर है।
परिसीमन आयोग का फैसला अंतिम
तीनों विधेयकों के पारित हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला परिसीमन आयोग इसे अंतिम रूप देगा। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होंगे। परिसीमन आयोग के फैसले को किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी और इसका फैसला अंतिम माना जाएगा। विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि भविष्य में किस जनगणना को परिसीमन का आधार बनाया जाएगा, यह संसद साधारण बहुमत से तय कर सकेगी। लेकिन अभी तो केंद्र सरकार को तीनों संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। इसका मतलब है कि किसी तरह सरकार को विपक्षी सांसदों को विधेयकों का समर्थन करने के लिए राजी करना ही होगा।


महिला वोट लेने का स्टंट
फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद (कुल सीटों का 14%) और राज्यसभा में 42 महिला सांसद (कुल सीटों का 18%) है। इन आंकड़ों के आधार पर सेंटर फॉर सोशल रिसर्च का बयान कहता है कि दुनिया भर में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व औसतन 27.2% है। यानी भारत में महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व दुनिया की तुलना में काफ़ी कम है। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में कहा गया है कि इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की “प्रभावी और समर्पित भागीदारी में देरी होगी”। आगे इसमें प्रस्ताव है कि सीटों के परिसीमन में यह आरक्षण “ताज़ा प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों” के आधार पर लागू किया जाए-यानी फिर से 2011 की जनगणना। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का रोटेशन हर डीलिमिटेशन साइकिल (परिसीमन चक्र) के बाद होगा। यह आरक्षण 15 साल की अवधि के लिए वैध रहेगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है। लेकिन पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद साकेत गोखले का कहना है कि “सरकार महिलाओं को बहाना बनाकर परिसीमन के अपने असली एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी की 39% सांसद महिलाएं हैं। उन्होंने कहा, “जब 2023 में यह बिल पारित हुआ था, तब विपक्षी दलों ने आरक्षण को तुरंत लागू करने की मांग की थी, लेकिन हमारी मांगों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इस अचानक सामने आए परिसीमन के विचार को देश के सामने स्वीकार्य बनाना असंभव होगा, क्योंकि इसका कोई आधार नहीं है।” इससे पहले सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने दिल्ली में जारी एक बयान में कहा कि 2023 में जब यह बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पारित हुआ था, तब महिला संगठनों ने सरकार से पूछा था कि इसे लागू करने में देरी क्यों की जा रही है और इसे जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया है। लेकिन उस क़ानून में प्रावधान था कि जनगणना या परिसीमन के बिना महिला आरक्षण नहीं होगा। कुछ ही महीनों में सरकार ने यू-टर्न ले लिया है और अब वह कह रही है कि वह इसे जनगणना और परिसीमन से अलग करना चाहती है। पारदर्शिता की मांग का मतलब यह नहीं है कि हम संसद में महिला आरक्षण के खिलाफ हैं।” राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भाजपा महिला आरक्षण के नाम पर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में महिला वोटरों को प्रभावित करना चाहती है। अगर इस क़दम से महिलाओं के 10 प्रतिशत वोट का झुकाव होता है, तो यह भाजपा के लिए बड़ा फ़ायदा है। जब चुनाव 3–4 प्रतिशत के अंतर से जीते जाते हैं, और आप 1–2 प्रतिशत अतिरिक्त वोट ले आते हैं, तो यह गेम, सेट, मैच हो जाता है।”
एक सांसद पर अब 25 लाख लोग
1952 में जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था, तब देश की आबादी करीब 36 करोड़ थी और सीटें 489 थीं। भारत में आज भी हम 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई 543 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। उस समय देश की आबादी लगभग 36 करोड़ थी, जो आज 140 करोड़ के पार है। नतीजा यह है कि एक सांसद अब 10 लाख नहीं, बल्कि औसतन 25 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। जन प्रतिनिधित्व का संतुलन कायम रखने के लिए सीटें बढ़ाना जरूरी माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि बेहतर शासन के लिए सीटों का बढ़ना जरूरी है। नए प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी, जिनमें से 815 राज्यों के लिए और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इस बदलाव का सीधा असर यह होगा कि अब संसद में और अधिक जनप्रतिनिधि होंगे और नीति निर्माण में बारीकी आएगी।
महिला आरक्षण 15 साल बाद होगा रोटेट
महिलाओं के लिए यह 33% आरक्षण 15 साल के लिए होगा। यानी 2029, 2034 और 2039 के चुनाव। खास बात यह है कि ये आरक्षित सीटें हर चुनाव में बदलती रहेंगी (रोटेशन)। इससे फायदा यह होगा कि हर क्षेत्र को महिला प्रतिनिधित्व का मौका मिलेगा। इसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए भी ‘कोटे के भीतर कोटा’ तय किया गया है।

यूपी को सबसे ज्यादा फायदा
उत्तर प्रदेश: यहां सबसे ज्यादा 40 सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर संख्या 120 हो जाएगी।
महाराष्ट्र: यहां 48 से बढ़कर 72 सीटें होंगी, जिनमें 24 महिलाओं के लिए होंगी।
बिहार: 40 से बढ़कर 60 सीटें होने का अनुमान है, जहाँ 20 महिला सांसद होंगी।
मध्य प्रदेश: यहां भी 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने की उम्मीद है।
तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों में भी सीटों में इजाफा होगा, लेकिन अनुपात के हिसाब से उत्तर भारतीय राज्यों का दबदबा बढ़ना तय है।
किसने क्या कहा?
पीएम मोदी- हमें क्रेडिट नहीं चाहिए जैसे ही पारित हो जाए तो मैं एड देकर सबको धन्यवाद देने तैयार हूं। सबकी फोटो छपवा देंगे। ले लो जी क्रेडिट। सामने से क्रेडिट का ब्लैंक चेक आपको दे रहा हूं।
प्रियंका गांधी- जिस तरह असम में उन्होंने मनचाही सीटों को काटा, नई सीमाएं बनाएं उसी तरह यह देश में करेंगे। मौजूदा सरकार जनता की आंखों में धूल झोंक रही है।
राहुल गांधी – चुनावी नक्शा बदलने के लिए महिला आरक्षण का सहारा लिया। सच यह है कि जादूगर पकड़ा गया है। बालाकोट, नोटबंदी और सिंदूर का जादूगर पकड़ा गया है।
अखिलेश यादव – ये लोग पिछड़े वर्ग की 33 प्रतिशत महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहते हैं। जब परिसीमन की बारी आई तो इन लोगों ने पूरी रणनीति बनाई, कि कैसे क्षेत्र बनाए जाएं कि इसका फायदा इन लोगों को ही मिले।
एमके स्टालिन – 23 अप्रैल को हम दिल्ली का अहंकार और उस अहंकार का समर्थन करने वाले गुलामों को हराएंगे।






