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बेतवा पर मौत का पुल,योगी राज में भ्र्ष्टाचार की झूला में अधिकारी रहे है झूल

तेज आंधी में ढहा निर्माणाधीन ढांचा, छह श्रमिकों की दर्दनाक मौत

बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले में विगत सप्ताह को एक भीषण हादसे ने विकास कार्यों की गुणवत्ता और निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। बेतवा नदी पर निर्माणाधीन पुल का एक बड़ा हिस्सा तेज आंधी और खराब मौसम के दौरान अचानक भरभराकर गिर पड़ा। मलबे के नीचे दबने से छह श्रमिकों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पिछले सप्ताह मौसम अचानक खराब हो गया। तेज हवाओं के साथ धूलभरी आंधी चलने लगी। इसी दौरान पुल के निर्माणाधीन हिस्से में जोरदार कंपन महसूस हुआ और देखते ही देखते लोहे तथा कंक्रीट का भारी ढांचा नदी किनारे कार्य कर रहे श्रमिकों पर गिर पड़ा। हादसा इतना अचानक हुआ कि श्रमिकों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

हादसे के तुरंत बाद चीख-पुकार मच गई। स्थानीय ग्रामीण और निर्माण स्थल पर मौजूद कर्मचारी बचाव कार्य में जुट गए। सूचना मिलने पर जिला प्रशासन, पुलिस और राहत दल मौके पर पहुंच गए। कई घंटे तक चले बचाव अभियान के दौरान मलबे में दबे श्रमिकों को बाहर निकाला गया। गंभीर रूप से घायल लोगों को नजदीकी चिकित्सालयों में भर्ती कराया गया।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मृतकों की संख्या छह तक पहुंच गई है। कुछ घायलों की हालत भी चिंताजनक बताई जा रही है। मृतकों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। कई परिवारों का एकमात्र कमाने वाला सदस्य इस हादसे का शिकार हो गया।

घटना की जानकारी मिलते ही शासन स्तर पर भी हलचल तेज हो गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को घायलों के समुचित उपचार तथा घटना की विस्तृत जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

प्रारंभिक जांच में निर्माण कार्य की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण स्थल पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। कई श्रमिक बिना समुचित सुरक्षा उपकरणों के काम कर रहे थे। लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार किया गया होता तो इतनी बड़ी दुर्घटना नहीं होती।

हादसे के बाद लोक निर्माण विभाग और संबंधित एजेंसियों की भूमिका जांच के घेरे में आ गई है। शासन ने प्रथम दृष्टया लापरवाही मानते हुए विभाग के एक सहायक अभियंता को निलंबित कर दिया है। साथ ही घटना की तकनीकी जांच के आदेश भी जारी किए गए हैं। जांच दल को यह पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है कि पुल का हिस्सा आखिर किन कारणों से गिरा और क्या निर्माण सामग्री या संरचनात्मक डिजाइन में कोई कमी थी।

राजनीतिक दलों ने भी इस घटना को लेकर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि विकास कार्यों में जल्दबाजी और निगरानी की कमी के कारण आम लोगों की जान जोखिम में पड़ रही है। उन्होंने मृतकों के परिजनों को पर्याप्त आर्थिक सहायता देने और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है।

दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि हादसे के हर पहलू की निष्पक्ष जांच होगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। जिला प्रशासन ने मृतकों के परिजनों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अधिकारियों का दावा है कि घायलों के उपचार में किसी प्रकार की कमी नहीं रहने दी जाएगी।

बुंदेलखंड क्षेत्र में हाल के वर्षों में सड़क और पुल परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर धन खर्च किया गया है। ऐसे में इस दुर्घटना ने निर्माण कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े पुल का निर्माण अत्यंत संवेदनशील तकनीकी प्रक्रिया होती है और इसमें थोड़ी सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है।

घटना स्थल पर देर शाम तक राहत और बचाव कार्य जारी रहा। पुलिस ने पूरे क्षेत्र को घेरकर आम लोगों की आवाजाही सीमित कर दी। तकनीकी विशेषज्ञों की टीम भी मौके पर पहुंची और ढहे हुए हिस्से का निरीक्षण किया। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हादसे के वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा।

फिलहाल बेतवा किनारे पसरा सन्नाटा उन छह श्रमिकों की दर्दनाक मौत की कहानी बयां कर रहा है, जो रोजी-रोटी कमाने के लिए निर्माण स्थल पर पहुंचे थे, लेकिन शाम होने से पहले ही काल के गाल में समा गए। हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास की दौड़ में कहीं सुरक्षा और जवाबदेही तो पीछे नहीं छूट रही।

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