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रील बनाकर पैसा कमाने वाले हो रहे बेरोजगार,मनमाने शोषण और इन्फ्लूएंसर्स की भीड़ ने कर दिया बंटाधार

  • जाली प्रोडक्ट और धोखेबाजी ने खोली पोल
  •  इंडस्ट्री का धंधा: न कोई एग्रीमेंट और न ही पर्याप्त पारिश्रमिक
  •  पैसा भी टाइम से नहीं मिलता, अक्सर धोखा ही मिलता है
  •  साख बचाने के लिए इन्फ्लूएंसर्स नहीं करते शिकायत
  •  ना करने पर समझौता करने खड़े हैं लाखों क्रिएटर्स

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर जाने-पहचाने चेहरों से रील बनवाकर अपने सामान या कंपनी का प्रमोशन करवाना इस डिजिटल युग के सबसे सस्ते साधनों में से एक है। टेलीविजन और अखबारों के मुकाबले ऐसे रील की दुनिया में कंपनियां न केवल ज्यादा लोगों तक पहुंच पाती है, बल्कि अपने उत्पादों की ब्रांडिंग भी कर लेती है। लेकिन अब रील की यह दुनिया फीकी पड़ रही है। भारत की 4000 करोड़ की इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी में रीलबाजी के धंधे का टशन मंदा पड़ता जा रहा है। पेमेंट में देरी, एजेंसियों की भरमार और भरोसे की कमी इस रील इकोनॉमी में वे दरारें हैं जो अब दिखने लगी हैं।

शोषण और धोखे का दूसरा नाम रील इकोनॉमी

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से रील बनवाकर अपना प्रोडक्ट बेचने के इस बाजार की सबसे बड़ी असलियत इसमें लगातार शोषण, कम पैसे में अपना काम करवाना, कम समय में सबसे अच्छा रिजल्ट देने का दबाव और भरोसे की कमी है। आज क्रिएटर्स के लिए ब्रांड्स या एजेंसियों पर फौरन भरोसा करना बहुत मुश्किल हो गया है। भरोसा बनने में समय लगता है, खासकर जब बात पेमेंट की हो। इन्फ्लुएंसर-मार्केटिंग एजेंसी ओप्राह के को-फाउंडर प्रणव पनपालिया कहते हैं कि कंपनियां अपने क्लाइंट्स को काफी देरी से पैसा देती हैं। वहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को भाड़े पर नियुक्त करने वाली एजेंसियां जल्दी पेमेंट देने का लालच देकर उनके काम करवाती हैं, लेकिन जब पेमेंट देने की बात होती है तो कई तरह के बहाने बनाए जाते हैं। इस आनाकानी की वजह से रिश्ते खराब होते हैं। एजेंसियां अब 30 दिन या उससे ज्यादा की पेमेंट टर्म्स ऑफर कर रही हैं, क्योंकि उन्हें ऐसे क्रिएटर्स की कमी नहीं है जो ऐसी शर्तें मान लें। यानी अगर कोई क्रिएटर ये शर्तें नहीं मानता, तो एजेंसी को दूसरा क्रिएटर मिल ही जाएगा।

व्हाट्सएप और फोन कॉल पर जुबानी समझौता

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से अमूमन कंपनियां कोई आधिकारिक समझौता नहीं करतीं। ऐसा इसलिए भी होता है, क्योंकि कागजी या ई-मेल पर कोई समझौता लीक होने पर कंपनियों का नाम खराब होता है और प्रोडक्ट की साख पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि इस मामले में कंपनियां कोई रिस्क नहीं लेना चाहतीं, क्योंकि इस तरह का समझौता वे किसी कंपनी से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति से कर रही होती हैं, जिससे राज खुलने का हमेशा खतरा होता है। ऐसे में कंपनियां कुछ एजेंसियों को आगे खड़ा करती हैं, जो लिखित अनुबंध के अभाव में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के साथ सिर्फ व्हाट्सएप मैसेज या फोन कॉल के आधार पर डील करती हैं। जिन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों ने अपनी कंपनी बना रखी है, उनके साथ भी इसी तरह का बर्ताव किया जाता है। केवल एक ई-मेल के जरिए प्रस्ताव रखा जाता है, लेकिन उसमें पेमेंट की डेडलाइन और बाकी शर्तों के बारे में कुछ नहीं लिख होता। ये सारी बातें अमूमन फोन या वॉट्सएप के माध्यम से तय की जाती हैं, जो कि किसी भी सूरत में वैधानिक रिकॉर्ड नहीं माना जा सकता। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ऐसी डील करने से मना भी नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पीछे लाखों ऐसे इन्फ्लुएंसर खड़े मिलते हैं, जो कम पैसों में बिना किसी लिखित दस्तावेज के भी काम करने से नहीं हिचकते।

2, सिर्फ 35 एजेंसियों के हाथ में 70% बाजार

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का 4000 करोड़ का बाजार केवल 35 एजेंसियों के हवाले है। आईपीएलआईएक्स मीडिया के को-फाउंडर और सीईओ नील गोगिया के मुताबिक, टॉप की 30-35 एजेंसियां 4,000 करोड़ रुपये के बाजार का 70-75% हिस्सा संभालती हैं। यानी बाकी की 1,200 से ज्यादा छोटी एजेंसियां बचे हुए 25-30% बाजार के लिए आपस में लड़ रही हैं। नील गोगिया के अनुसार, ‘महीने में 1-2 करोड़ रुपये का कारोबार करना आसान है, क्योंकि बहुत सारे क्रिएटर्स और ब्रांड्स हैं। लेकिन इससे ज्यादा बिजनेस करना हो तो यह बिना एग्रीमेंट के काफी मुश्किल दिखता है।’ ज्यादातर एजेंसियां 20 लाख से 1 करोड़ रुपये के रेवेन्यू ब्रैकेट में काम करती हैं और अक्सर सिर्फ 2-3 बड़े क्लाइंट्स के भरोसा रहती हैं। जब किसी शख्स के पास इंस्टाग्राम हैंडल की स्प्रेडशीट हो, वह खुद को एजेंसी कह सकता है। ब्रांड्स के लिए यह बताना मुश्किल हो जाता है कि असल में कंटेंट किसका है, स्क्रिप्ट के पीछे कौन सी एजेंसी है और पैसा कहां से ट्रांसफर हो रहा है। ऐसे मामलों में कई बार धोखाधड़ी और ठगी की भी शिकायतें आती हैं, लेकिन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अपनी साख को बरकरार रखने के लिए अक्सर समझौता कर लेते हैं। एजेंसियां अब वैल्यू के बजाय कीमत पर कॉम्पिटीशन कर रही हैं, जो लंबे समय में टिकाऊ नहीं है।’ इसका मतलब यह हुआ कि एजेंसियां एक-दूसरे से सस्ते दरों पर काम ले रही हैं, जिससे उनकी अपनी कमाई घट रही है। इससे क्रिएटर्स की फीस बढ़ रही है, लेकिन उन्हें दिए जाने वाले पारिश्रमिक के एवज में उतना मुनाफा नहीं मिल रहा है।

आधे से ज्यादा अवैध उत्पाद के मामले

पेमेंट और एजेंसियों की समस्या के अलावा इस इकोनॉमी के सामने एक और बड़ा संकट है- भरोसा। एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया ने 2025 में 1,घाटाला यह है कि एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ने 609 इन्फ्लुएंसर-बेस्ड एडवर्टाइजमेंट मामलों की जांच की। चौंकाने वाली बात यह है कि 97% से ज्यादा मामलों में संशोधन या सुधारात्मक कार्रवाई की जरूरत पड़ी। इनमें 50% से ज्यादा उल्लंघन अवैध उत्पादों के प्रमोशन से जुड़े थे। इसमें ऑफशोर बेटिंग प्लेटफॉर्म और शराब शामिल हैं। 869 इन्फ्लुएंसर अवैध बेटिंग या दूसरे प्रतिबंधित कैटेगरी के प्रमोशन में पकड़े गए। फोर्ब्स इंडिया की टॉप 100 डिजिटल स्टार्स लिस्ट में शामिल इन्फ्लुएंसरों में 76% 2025 में उल्लंघन में पाए गए, जो 2024 के 69% से ज्यादा था। एजेंसी ने साफ चेतावनी दी है, ‘इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की तेज ग्रोथ ने जवाबदेही व्यवस्था को पीछे छोड़ दिया है।’ ईटी प्ले की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी ‘क्वाइट रीसेट’ से गुजर रही है। ब्रांड्स अब इन्फ्लुएंसरों पर अपने खर्चों में कटौती कर रहे हैं और ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं। अब किसी भी विवादास्पद चूक या लापरवाह सोशल मीडिया पोस्ट से किसी बड़े ब्रांड एंडोर्समेंट को नुकसान पहुंच सकता है। ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ जैसे हालिया विवादों ने ब्रांड्स को और सतर्क कर दिया है।

 

मुश्किल में है इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत की इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ कई दरारें भी सामने आ रही हैं: क्रिएटर्स को 30 दिन या उससे ज्यादा का इंतजार करवाना और कोई ऑफिशियल एग्रीमेंट नहीं करना। सिर्फ 30-35 एजेंसियों के हाथ में 70-75% बाजार है। कीमत पर प्रतिस्पर्धा, मुनाफा घट रहा है।

97% मामलों में उल्लंघन, तो 76% टॉप इन्फ्लुएंसर नियम तोड़ रहे। खर्चों में कटौती और ज्यादा जांच-पड़ताल का पैंतरा। अगर ये दरारें नहीं भरी गईं, तो इन्फ्लूएंसर इकोनॉमी मुश्किलों में पड़ सकती है। आने वाले दिनों में ही यह तय होगा कि यह अपनी दरारों को पाट पाता है या बिखर जाता है।

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