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अरुणाचल में घुसी चीनी सेना,मोदी का इस घटना नही कोई लेना-देना

सड़कें, कैंप और बनाए बंकर, आदिवासियों के दावों पर सेना ने किया इनकार

  •  आदिवासियों के समुदाय ने डीसी को सौंपा ज्ञापन, प्रशासन ने होंठ सिले
  •  नाह वेलफेयर सोसायटी का दावा- पुरखों की जमीन पर है चीन का कब्जा
  •  न खेती कर पा रहे हैं और न ही जानवरों को चारा खिला पा रहे
  •  विदेश मंत्रालय और राज्य सरकार की चुप्पी से गहराया शक

नई दिल्ली/गुवाहाटी। अरुणाचल प्रदेश के नाह नाम के आदिवासी समुदाय ने राज्य के अपर सुवानसिरी जिले के घास के मैदानों में चीनी सेना के कब्जे का दावा किया है। उनका कहना है कि इलाके में चीनी सेना की मौजूदगी के कारण वे अपने पशुओं के लिए घास काटने नहीं जा पा रहे हैं। इस दावे पर भारत के विदेश मंत्रालय ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन सेना ने इन दावों को खारिज कर दिया है।

 

नाह समुदाय का दावा है कि वे बीते 6 साल से न केवल अपने घास के मैदानों में जा पा रहे हैं, बल्कि शिकार करने और खेती करने में भी उन्हें भारी दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि वहां चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का कब्जा है।

आदिवासियों ने सौंपा ज्ञापन

अपर सुवानसिरी के उपाध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन में नाह वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष ने कहा कि उनके पूर्वजों की उन जमीनों पर, जहां वे शिकार किया करते हैं और खेती करते हैं, वहां चीन के पीएलए का कब्जा है। वे वहां के मैदानों में अपने पशुओं को घास चराने भी नहीं जा पा रहे हैं। उन्होंने ज्ञापन में कहा कि इन जमीनों पर वे वर्षों से उन्मुक्त होकर शिकार और खेती किया करते थे। अपर सुवानसिरी का यह इलाका ताकसिंग राजस्व सर्कल के तहत आता है। अब वहां के लोगों का दावा है कि चीन सरकार अरुणाचल पर अपने दावे को मजबूत करने में जुटी है। चीनी सेना ने वहां अपनी मौजूदगी को और मजबूत किया है। नाचो के विधायक नाकल्प नालो ने कहा कि इस मसले की आधिकारिक सच्चाई सामने आनी चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। प्रशासन को आदिवासियों के दावे की सच्चाई बतानी चाहिए। नाह वेलफेयर सोसायटी का आरोप है कि चीन ने ताकसिंग बॉर्डर के इलाके में बीते 10 से 15 साल के दौरान अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं, ताकि वह जितनी हो सके, जमीनों पर कब्जा कर ले। सोसायटी का यह भी दावा है कि 2020 के बाद चीन अरुणाचल की सीमा के भीतर के इलाकों पर अपना परंपरागत कब्जा मजबूत कर रहा है।

ये इलाके चीन के कब्जे में

नाह वेलफेयर सोसायटी का कहना है कि असाफिला, चुजारता इलाके का पानियर, मरनाफे का मारपान और पोतरांग लेक के साथ ही टिनडिंगटांग भी चीनी पीएलए सैनिकों के कब्जे में चला गया है। ज्ञापन में यह साफ कहा गया है कि चीन ने भारत के इन इलाकों में सड़कें और सैन्य कैंप बना लिए हैं। आदिवासियों का कहना है कि उन्हें भारतीय सेना पर पूरा विश्वास है और वे वर्षों से उन इलाकों की सुरक्षा करते आए हैं, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। अरुणाचल के ताकसिंग इलाके में चीनी सेना की गतिविधि बहुत तेज है और यह वहां के लोगों के लिए चिंता का विषय है। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि लोगों की हर इंच जमीन रोजाना चीन के कब्जे में जा रही है। जिला प्रशासन ने इन दावों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। उपायुक्त गांबो तासो भी चुप हैं और अफसरों ने अपने होंठ सिल रखे हैं।

तस्वीरों के साथ किया दावा

एनएएच वेलफेयर सोसायटी ने जिले के डीसी को पत्र लिखकर दावा किया है कि जिन इलाकों में चीन की सेना ने अपना डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है, वहां कभी स्थानीय अरुणाचल प्रदेश के चरवाहे अपने मवेशियों को चराने के लिए लेकर जाते थे। सोसायटी ने अपने दावे के साथ इलाके की कई तस्वीरें भी ज्ञापन के साथ सौंपी हैं। सूत्रों ने बताया कि जिन जगहों के नाम इस वायरल लैटर में लिखे गए हैं, वे सभी एलएसी के उत्तर में है (यानी चीन के अधिकार-क्षेत्र में)। चिट्ठी में एक नाम ऐसा है, जो एलएसी के विवादित इलाके में है और जो 1962 के युद्ध से पहले से चीन के कब्जे में है।

सेना ने दावे का खंडन किया

भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी पीएलए की घुसपैठ की मीडिया रिपोर्टों को गलत और निराधार बताया है। सेना प्रमुख ने कहा कि सीमा पर स्थिति स्थिर लेकिन संवेदनशील है, जिसके लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता है। सेना ने कहा, “हमने कुछ मीडिया रिपोर्ट देखी हैं जिनमें अरुणाचल प्रदेश में चीन की पीएलए द्वारा हाल ही में घुसपैठ करने और शिविर लगाने का आरोप लगाया गया है। ये रिपोर्ट गलत और आधारहीन हैं।” भारत और चीन ने पिछले महीने बीजिंग में भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श व समन्वय के लिए कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) की 35वीं बैठक की थी। बाद में विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बातचीत को रचनात्मक और भविष्योन्मुखी बताया था।

 

अरुणाचल को अपना हिस्सा बताता है चीन

चीन ने कभी अरुणाचल प्रदेश को भारत के राज्य के तौर पर मान्यता नहीं दी है। वो अरुणाचल को ‘दक्षिणी तिब्बत’ का हिस्सा बताता है। उसका आरोप है कि भारत ने उसके तिब्बती इलाके पर कब्जा करके उसे अरुणाचल प्रदेश बना दिया है। चीन अरुणाचल के इलाकों के नाम क्यों बदलता है, इसका अंदाजा वहां के एक रिसर्चर के बयान से लगाया जा सकता है। 2015 में चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंस के रिसर्चर झांग योंगपान ने ग्लोबल टाइम्स को कहा था, ‘जिन जगहों के नाम बदले गए हैं वो कई सौ सालों से हैं। चीन का इन जगहों का नाम बदलना बिल्कुल जायज है। पुराने समय में जांगनान ( चीन में अरुणाचल को दिया नाम) के इलाकों के नाम केंद्रीय या स्थानीय सरकारें ही रखती थीं। इसके अलावा इलाके के जातीय समुदाय जैसे तिब्बती, लाहोबा, मोंबा भी अपने अनुसार जगहों के नाम बदलते रहते थे। जब जैंगनेम पर भारत ने गैर कानूनी तरीके से कब्जा जमाया तो वहां की सरकार ने गैर कानूनी तरीकों से जगहों के नाम भी बदले। झांग ने ये भी कहा था कि अरुणाचल के इलाकों के नाम बदलने का हक केवल चीन को होना चाहिए। अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य है। नॉर्थ और नॉर्थ वेस्ट में तिब्बत, वेस्ट में भूटान और ईस्ट में म्यांमार के साथ यह अपनी सीमा साझा करता है। अरुणाचल प्रदेश को पूर्वोत्तर का सुरक्षा कवच कहा जाता है। चीन का दावा तो पूरे अरुणाचल पर है, लेकिन उसकी जान तवांग जिले पर अटकी है। तवांग अरुणाचल के नॉर्थ-वेस्ट में हैं, जहां पर भूटान और तिब्बत की सीमाएं हैं।

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