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मोदी–शाह के डर की जड़ में RSS की विचारधारा,कुकर्मियों ने देश को बर्बाद करने का ठेका लिया है ढ़ेर सारा

  • आंदोलन, लोकतंत्र और सत्ता की असली परीक्षा!
  • आंदोलन से इतना परहेज क्यों? मोदी की सत्ता, शाह की सख्ती और मोहन भागवत के संघ की वैचारिक विरासत पर बड़े सवाल
  • क्या सरकार को जनता के सवालों का जवाब देने से डर लगता है?
  • क्या विरोध करने वाले छात्र, युवा और विपक्षी नेता लोकतंत्र के दुश्मन हैं?
  • क्या सत्ता की आलोचना को राष्ट्रीय हित के विरुद्ध बताना लोकतांत्रिक परंपरा है?
  • क्या सरकार यह भूल रही है कि आज सत्ता में बैठने वाले कल विपक्ष में भी हो सकते हैं?

लोकतंत्र की खूबसूरती केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने में नहीं, बल्कि असहमति को सुनने, सवालों का जवाब देने और शांतिपूर्ण विरोध को सम्मान देने में है। जब सरकार आलोचना से घबराने लगे, विपक्ष के सवालों को दुश्मनी समझने लगे और सड़कों पर उठती आवाजों का जवाब संवाद के बजाय प्रतिबंधों से देने लगे, तब लोकतंत्र की सेहत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सामने आज यही राजनीतिक सवाल खड़ा किया जा सकता है—आखिर सत्ता को आंदोलनों से इतनी परेशानी क्यों होती है?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए केवल मोदी और शाह की राजनीतिक शैली देखना पर्याप्त नहीं है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐतिहासिक रिश्ते तथा आंदोलन के प्रति संघ की वैचारिक सोच को भी समझना होगा।

मोदी और शाह की राजनीति के पीछे संघ की विचारधारा पर सवाल

नरेंद्र मोदी स्वयं लंबे समय तक संघ से जुड़े रहे हैं। भाजपा और आरएसएस के बीच वैचारिक तथा संगठनात्मक संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। मोहन भागवत के नेतृत्व वाला संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताता है, जबकि भाजपा चुनावी राजनीति के जरिए सत्ता संचालित करती है।

लेकिन यहां एक बुनियादी प्रश्न है—क्या सत्ता में आने के बाद संघ परिवार की राजनीतिक सोच असहमति और आंदोलनों के प्रति अधिक सहिष्णु हुई है?

जब विपक्ष सरकार के फैसलों पर सवाल उठाता है, छात्र संगठन प्रदर्शन करते हैं या नागरिक किसी नीति के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं, तब सरकार की प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक कसौटी पर परखी जानी चाहिए।

– मोदी की परीक्षा: क्या प्रधानमंत्री आलोचना को लोकतंत्र की ताकत मानते हैं?
– अमित शाह की परीक्षा: क्या गृह मंत्रालय कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार में संतुलन रखता है?
– मोहन भागवत की परीक्षा: क्या संघ का वैचारिक नेतृत्व असहमति, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक बहुलता को पर्याप्त महत्व देता है?

यह किसी संगठन के समर्थकों को दोषी ठहराने का सवाल नहीं, बल्कि उस विचारधारा और सत्ता-संबंध की पड़ताल है जो देश की राजनीति को प्रभावित करता है।

आजादी की लड़ाई और संघ का ऐतिहासिक रिकॉर्ड

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास आंदोलनों, जेल यात्राओं, जनसभाओं और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध व्यापक जनप्रतिरोध का इतिहास है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव को चुनौती दी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। इसलिए असहयोग आंदोलन के समय संघ एक संगठन के रूप में अस्तित्व में नहीं था। हालांकि उसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस की गतिविधियों से जुड़े रहे और स्वतंत्रता आंदोलन में जेल भी गए।

बाद के आंदोलनों में संघ की संगठनात्मक भूमिका सीमित रही। विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ ने संगठन के रूप में भाग नहीं लिया। संघ के तत्कालीन नेतृत्व ने संगठन के नियमित कार्य को जारी रखने पर जोर दिया।

यहीं से इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस शुरू होती है।

– जब देश का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था, तब संघ की प्राथमिकता संगठन निर्माण क्यों बनी रही?
– क्या स्वतंत्रता आंदोलन से संगठनात्मक दूरी उसकी रणनीतिक पसंद थी?
– क्या किसी संगठन की देशभक्ति का मूल्यांकन केवल उसके दावों से होना चाहिए, या उसके ऐतिहासिक आचरण से भी?

इन सवालों का जवाब ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर तलाशा जाना चाहिए। इतिहास को न तो राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदला जा सकता है और न ही जटिल घटनाओं को एक शब्द में समेटा जा सकता है।

गोलवलकर की सोच और आंदोलन की राजनीति

एम.एस. गोलवलकर के नेतृत्व में संघ ने संगठनात्मक अनुशासन और दीर्घकालीन संगठन निर्माण को प्राथमिकता दी। संघ के आलोचक इस दृष्टिकोण को जनआंदोलनों से दूरी के रूप में देखते हैं, जबकि समर्थक इसे संगठन की अलग कार्यपद्धति बताते हैं।

लेकिन लोकतंत्र में प्रश्न पूछना जरूरी है कि जब जनता अन्याय के खिलाफ संगठित होती है, तब उसे केवल अनुशासनहीनता के नजरिये से देखना कितना उचित है?

किसी आंदोलन में हिंसा हो तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल इसलिए रोक देना कि उससे सरकार की छवि खराब हो सकती है, लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत होगा।

आंदोलन हमेशा अराजकता नहीं होते; कई बार वे सत्ता की जवाबदेही तय करने का सबसे प्रभावी माध्यम बनते हैं।

– स्वतंत्रता आंदोलन ने जनता को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया।
– किसान आंदोलनों ने कृषि नीतियों पर सरकारों को पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
– छात्र आंदोलनों ने शिक्षा, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था की समस्याओं को राष्ट्रीय बहस बनाया।
– नागरिक आंदोलनों ने शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को मजबूत किया।

इसलिए आंदोलन को केवल सत्ता के लिए चुनौती मानना, जनता की राजनीतिक चेतना को कम करके आंकना है।

सावरकर की माफीनामे की बहस और देवरस का आपातकालीन दौर

विनायक दामोदर सावरकर की जेल याचिकाएं लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही हैं। उनके समर्थक इन दस्तावेजों को तत्कालीन परिस्थितियों और रणनीति के संदर्भ में देखते हैं, जबकि आलोचक उन्हें ब्रिटिश शासन के सामने झुकने के उदाहरण के रूप में पेश करते हैं।

इसी तरह आपातकाल के दौर में संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस और इंदिरा गांधी सरकार के बीच हुए पत्राचार को लेकर भी सवाल उठाए जाते हैं।

इन घटनाओं को सामने रखकर संघ की राजनीतिक रणनीति पर आलोचनात्मक चर्चा की जा सकती है। हालांकि किसी एक पत्र या याचिका के आधार पर लाखों लोगों के चरित्र पर अंतिम फैसला सुनाना उचित नहीं होगा।

असली सवाल यह है कि जो संगठन आज राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय गौरव की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाता है, वह स्वतंत्रता संघर्ष, आपातकाल और लोकतांत्रिक अधिकारों के इतिहास पर कितनी खुली आत्मसमीक्षा करता है?

 जंतर-मंतर से दिल्ली की सड़कों तक: विरोध का अधिकार किसका है?

अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन ने देश की राजनीति को हिला दिया था। उस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल सहित कई चेहरे उभरे। आंदोलन के पीछे आरएसएस या अन्य संगठनों की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—किसी आंदोलन में अलग-अलग विचारधारा के लोगों की भागीदारी अपने आप में उसे अवैध नहीं बना देती। आंदोलन का मूल्यांकन उसके उद्देश्यों, तरीकों और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

यही कसौटी आज भी लागू होती है। यदि छात्र परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं, विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है या नागरिक निर्वाचन आयोग से जवाब मांगते हैं, तो सरकार को तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।

यदि किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन होता है, तो निष्पक्ष और आनुपातिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को सामूहिक रूप से अपराधी मान लेना लोकतंत्र को कमजोर करता है।

मोदी की लोकप्रियता और शाह की सख्ती, दोनों की लोकतांत्रिक कसौटी

नरेंद्र मोदी की चुनावी लोकप्रियता और अमित शाह की संगठनात्मक रणनीति भाजपा की राजनीतिक ताकत के महत्वपूर्ण पहलू हैं। लेकिन चुनावी जीत किसी सरकार को आलोचना से मुक्त नहीं कर देती।

लोकतंत्र में बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, संविधान से ऊपर उठने का नहीं।

गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि राजनीतिक असहमति को खत्म करना। प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी केवल अपनी उपलब्धियां गिनाना नहीं, बल्कि नागरिकों के सवालों का जवाब देना भी है।

मोहन भागवत और संघ नेतृत्व के सामने भी सवाल है कि यदि संघ स्वयं को राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण मानता है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण असहमति और संवैधानिक अधिकारों पर उसका स्पष्ट रुख क्या है?

– सरकार से सवाल पूछना देशद्रोह नहीं है।
– चुनाव आयोग की आलोचना अपने आप में लोकतंत्र विरोधी नहीं है।
– शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किसी सरकार के खिलाफ साजिश का प्रमाण नहीं है।
– कानून का पालन प्रदर्शनकारियों और सरकार—दोनों के लिए अनिवार्य है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र बचाने के लिए सवाल पूछना जरूरी है

मोदी, शाह, भागवत और आरएसएस की राजनीति पर आलोचनात्मक सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन किसी भी राजनीतिक निष्कर्ष को प्रमाण, ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान घटनाओं की पुष्टि के आधार पर ही मजबूत बनाया जा सकता है।

आज देश के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा नेता आंदोलनों से डरता है, बल्कि यह है कि क्या भारत की सत्ता असहमति को लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा मानने के लिए तैयार है?

यदि सरकार को लगता है कि उसके फैसले सही हैं, तो उसे सवालों से घबराने के बजाय जवाब देने चाहिए। यदि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी है, तो उसकी विश्वसनीयता स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक तथ्यों से मजबूत होनी चाहिए। यदि कानून-व्यवस्था का प्रश्न है, तो कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार स्थायी नहीं होती, लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का महत्व स्थायी है।

मोदी सरकार हो या कोई दूसरी सरकार, भाजपा हो या कोई अन्य राजनीतिक दल—सभी को एक ही कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

देश किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। संविधान किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं है। लोकतंत्र किसी नेता की कृपा से नहीं चलता।

लोकतंत्र जनता की भागीदारी, असहमति के सम्मान और सत्ता की जवाबदेही से जीवित रहता है। इसलिए नागरिकों को सवाल पूछते रहना होगा, ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करनी होगी और हर सरकार को संविधान के दायरे में रहने के लिए जवाबदेह बनाना होगा।

क्योंकि जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, तब सत्ता जवाब देना भी जरूरी नहीं समझती। और जब सत्ता जवाब देना छोड़ देती है, तब लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा पैदा होता है।

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