छुआछूत के खिलाफ गुरु अवेद्यनाथ की रही हुंकार, प्रशंशनीय रहा महन्त जी का किरदार

- अंबेडकर के संघर्ष से जुड़ा सामाजिक समरसता का सूत्र
- दलित सम्मान के बिना हिंदू समाज की पूर्णता अधूरी
- गोरक्षपीठ की परंपरा में सामाजिक भेदभाव के खिलाफ लगातार उठती रही आवाज

गोरक्षपीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सामाजिक दृष्टि को समझने के लिए उनके गुरु ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के उस अभियान को समझना जरूरी है, जिसका केंद्र धार्मिक पहचान से अधिक सामाजिक समरसता और छुआछूत के खिलाफ संघर्ष रहा। महंत अवेद्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से मंदिरों में सभी जातियों के प्रवेश, दलितों को धार्मिक-सामाजिक सम्मान और सहभोज जैसी पहलों को आगे बढ़ाया। गोरखनाथ मंदिर की आधिकारिक सामग्री में उनके प्रयासों के तहत अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट दलित समाज के व्यक्ति से रखवाने और पटना के महावीर मंदिर में दलित पुजारी की प्रतिष्ठा के प्रयास का उल्लेख मिलता है। यही वह सामाजिक दृष्टि थी, जिसमें डॉ.भीमराव अंबेडकर के संघर्ष को केवल किसी एक राजनीतिक विचारधारा के चश्मे से देखने के बजाय जातिगत अपमान, अस्पृश्यता और सामाजिक असमानता के खिलाफ उनके ऐतिहासिक संघर्ष के रूप में समझने की जरूरत सामने आती है। राज्यसभा के प्रकाशित अंबेडकर संबंधी दस्तावेज में भी उन्हें सामाजिक क्रांतिकारी बताते हुए जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता के उन्मूलन को उनके चिंतन का केंद्रीय प्रश्न बताया गया है। डॉ.अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उनके अपने वक्तव्यों और उनके लेखन से स्पष्ट है कि धर्म परिवर्तन उनके लिए सामाजिक गरिमा और समानता के प्रश्न से जुड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले में भी 1956 के नागपुर धर्मांतरण का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अंबेडकर का उद्देश्य अनुसूचित जातियों के लोगों को सम्मानजनक सामाजिक स्थान दिलाना था और उन्होंने बौद्ध धर्म में सामाजिक समानता का आधार देखा।

गुरु की विरासत में ‘समरसता’ सिर्फ शब्द नहीं, सामाजिक प्रयोग
महंत अवेद्यनाथ के सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि उन्होंने छुआछूत के सवाल को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने दलित समाज के साथ सहभोज किए और मंदिरों में प्रवेश तथा धार्मिक गतिविधियों में समान भागीदारी की वकालत की। गोरखनाथ मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट महंत अवेद्यनाथ के सामाजिक समरसता अभियान को विशेष रूप से रेखांकित करती है। उसमें कहा गया है कि उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट दलित समाज के व्यक्ति से रखवाने का प्रस्ताव किया था। इसी क्रम में पटना के महावीर मंदिर में दलित पुजारी की प्रतिष्ठा के प्रयास का भी उल्लेख मिलता है। यह पहल उस दौर के सामाजिक वातावरण में महज प्रतीकात्मक नहीं थी। मंदिर का पुजारी कौन हो सकता है, कौन मंदिर में प्रवेश कर सकता है और किसके साथ बैठकर भोजन किया जा सकता है। ये सवाल भारतीय समाज में लंबे समय तक जातिगत विभाजन से जुड़े रहे हैं। महंत अवेद्यनाथ ने इसी क्षेत्र को चुनौती दी।
काशी के डोमराजा के घर सहभोज ने तोड़ी सामाजिक दूरी
महंत अवेद्यनाथ के सामाजिक समरसता अभियान से जुड़ा सबसे चर्चित प्रसंग काशी का है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक 18 मार्च 1994 को उन्होंने काशी के डोमराजा के घर जाकर भोजन किया। यह कदम उस समय इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि डोम समाज को लेकर सदियों से सामाजिक दूरी और अस्पृश्यता की मानसिकता रही है। महंत अवेद्यनाथ ने धार्मिक नेतृत्व को सामाजिक बराबरी के प्रश्न से जोड़ने की कोशिश की। उनका संदेश यह था कि यदि समाज स्वयं को एक मानता है तो भोजन, मंदिर और धार्मिक आस्था के स्तर पर भी भेदभाव का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि गोरक्षपीठ की सामाजिक भूमिका पर चर्चा करते समय केवल राम मंदिर आंदोलन या राजनीतिक गतिविधियों का उल्लेख पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उसके समानांतर चलने वाले सामाजिक समरसता अभियान को भी देखना होगा।
दलित पुजारी का सवाल मंदिर में जाति बड़ी या भक्ति?
महंत अवेद्यनाथ से जुड़े विवरणों में पटना के महावीर मंदिर में दलित पुजारी की प्रतिष्ठा का प्रसंग विशेष रूप से सामने आता है। उपलब्ध रिपोर्टों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और महावीर मंदिर ट्रस्ट के तत्कालीन अध्यक्ष किशोर कुणाल के हवाले से भी इस पहल का उल्लेख किया गया है। मुद्दा केवल एक व्यक्ति को पुजारी बनाने का नहीं था। असली सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति की जाति उसके धार्मिक अधिकार और योग्यता का निर्धारण कर सकती है? महंत अवेद्यनाथ की पहल का महत्व इसी सवाल में दिखाई देता है।
गोरखनाथ पीठ की आधिकारिक सामग्री भी कहती है कि उन्होंने मंदिरों में सभी जातियों के प्रवेश और विभिन्न जातियों के लोगों को पुजारी बनाए जाने का समर्थन किया। यानी सामाजिक समरसता का अर्थ केवल दलितों के प्रति सहानुभूति नहीं, बल्कि समान धार्मिक अधिकार की बात भी थी।
अंबेडकर को समझना है तो जाति और अस्पृश्यता के सवाल से गुजरना होगा
डॉ. भीमराव अंबेडकर को लेकर भारतीय राजनीति में अलग-अलग वैचारिक व्याख्याएं होती रही हैं। लेकिन उनके मूल सामाजिक संघर्ष को समझने के लिए उनके लेखन और सार्वजनिक जीवन को देखना जरूरी है।
राज्यसभा द्वारा प्रकाशित अंबेडकर संबंधी सामग्री में उन्हें सामाजिक क्रांतिकारी बताया गया है और उनके विचारों में जाति-व्यवस्था तथा अस्पृश्यता के उन्मूलन को महत्वपूर्ण माना गया है। अंबेडकर का संघर्ष किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध था जिसमें जन्म के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित होती थी। यही वजह है कि महंत अवेद्यनाथ की सामाजिक समरसता की पहल और अंबेडकर के जाति-विरोधी संघर्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद दिखाई देता है। सामाजिक अपमान समाप्त हो, समान सम्मान मिले और समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के कारण नीचे न माना जाए।
अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों चुना?
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. अंबेडकर ने बड़ी संख्या में अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उनके लेखन और उस समय के दस्तावेजों से पता चलता है कि यह निर्णय लंबे सामाजिक और वैचारिक मंथन का परिणाम था। उनका मानना था कि सामाजिक सम्मान और समानता के बिना मुक्ति अधूरी है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बाद के एक मामले में अंबेडकर के धर्मांतरण का संदर्भ देते हुए लिखा कि वे अनुसूचित जातियों को सम्मानजनक सामाजिक स्थान दिलाना चाहते थे और बौद्ध धर्म में सामाजिक समानता का आधार देखते थे। इसलिए अंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने को केवल ‘उपासना पद्धति बदलने’ तक सीमित करना उनके निर्णय की सामाजिक पृष्ठभूमि को छोटा कर देता है। यह उनके जाति-विरोधी आंदोलन और सामाजिक गरिमा के संघर्ष से गहराई से जुड़ा निर्णय था।
मुस्लिम समाज में जातिगत विभाजन पर अंबेडकर की टिप्पणी
अंबेडकर के लेखन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उन्होंने सामाजिक भेदभाव को केवल हिंदू समाज तक सीमित प्रश्न नहीं माना। पाकिस्तान आर द पार्टीशन ऑफ इंडिया में उन्होंने भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर भी सामाजिक श्रेणियों और जातिगत विभाजनों का उल्लेख किया है। उनके लेखन में बंगाल के मुस्लिम समाज में अशरफ, अजलफ और अर्जल जैसी श्रेणियों का संदर्भ मिलता है। इस तथ्य को किसी धर्म के पूरे समुदाय पर आरोप के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। अंबेडकर का तर्क व्यापक था कि सामाजिक ऊंच-नीच जिस समाज में भी मौजूद हो, उसका परीक्षण और सुधार जरूरी है। यही बात आज भी प्रासंगिक है। छुआछूत केवल कानून से समाप्त होने वाला प्रश्न नहीं है। यह सामाजिक व्यवहार, धार्मिक संस्थाओं, सार्वजनिक संसाधनों और रोजमर्रा के संबंधों से जुड़ा प्रश्न है।
योगी के लिए गुरु की विरासत का अर्थ क्या?
योगी आदित्यनाथ स्वयं महंत अवेद्यनाथ के शिष्य और गोरक्षपीठ की परंपरा के वर्तमान पीठाधीश्वर हैं। इसलिए उनकी सामाजिक दृष्टि को समझने में गुरु की विरासत महत्वपूर्ण संदर्भ बनती है। महंत अवेद्यनाथ ने जिस सामाजिक समरसता अभियान को आगे बढ़ाया, उसका केंद्रीय प्रश्न था कि क्या हिंदू समाज जातिगत विभाजन के साथ एकजुट रह सकता है? उनकी गतिविधियों का रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर सामाजिक व्यवहार में देने का प्रयास किया। दलितों के साथ सहभोज, मंदिर प्रवेश, दलित पुजारी की पहल और डोमराजा के घर भोजन जैसे कदम इसी क्रम में देखे जाते हैं। डॉ. अंबेडकर का रास्ता अलग था। उन्होंने जाति व्यवस्था की मूल संरचना पर कठोर प्रश्न उठाए और अंततः बौद्ध धर्म स्वीकार किया। लेकिन दोनों प्रसंगों के बीच एक साझा सामाजिक प्रश्न दिखाई देता है। मनुष्य की गरिमा जन्म से तय नहीं हो सकती।
यही वह बिंदु है जहां अंबेडकर को केवल राजनीतिक प्रतीक और अवेद्यनाथ को केवल धार्मिक नेता मानकर पढ़ना अधूरा होगा।
असली चुनौती आज भी वहीं छुआछूत खत्म हुई या सिर्फ रूप बदला?
भारत में कानून ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में भेदभाव के आरोप और घटनाएं आज भी सामने आती रहती हैं। इसलिए सामाजिक समरसता का सवाल इतिहास की किताबों में बंद विषय नहीं है। महंत अवेद्यनाथ का अभियान इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है। उन्होंने धार्मिक नेतृत्व के माध्यम से समाज के भीतर मौजूद छुआछूत को चुनौती देने की कोशिश की। डॉ. अंबेडकर ने संविधान, कानून, शिक्षा और सामाजिक आंदोलन के माध्यम से समानता का रास्ता बनाया। दोनों की पद्धतियां अलग थीं, लेकिन भारतीय समाज के सामने खड़ा प्रश्न एक था कि क्या जन्म किसी इंसान की गरिमा का पैमाना हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीतिक भाषणों में नहीं, बल्कि मंदिरों, गांवों, बस्तियों, सार्वजनिक संस्थानों और रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यही कारण है कि महंत अवेद्यनाथ द्वारा अंबेडकर को सम्मान से देखने की बात हो या योगी आदित्यनाथ की सामाजिक समरसता संबंधी राजनीति। इसे केवल हिंदुत्व बनाम अंबेडकर की बहस में सीमित करने के बजाय जाति और छुआछूत के खिलाफ भारतीय समाज के लंबे संघर्ष के संदर्भ में देखना अधिक सार्थक है। गोरक्षपीठ की परंपरा में सामाजिक समरसता की यह धारा बताती है कि धार्मिक पहचान और सामाजिक बराबरी के प्रश्न को अलग-अलग खांचों में रखने के बजाय उनके बीच संवाद भी संभव है और शायद यही सबसे बड़ा सवाल है जिस समाज में किसी व्यक्ति को जन्म के कारण छोटा समझा जाए, वह कितना भी धार्मिक क्यों न हो, तब तक समरस नहीं हो सकता जब तक सम्मान और समानता व्यवहार का हिस्सा न बन जाए।
* महंत अवेद्यनाथ ने छुआछूत को सामाजिक विकृति मानकर उसके खिलाफ अभियान चलाया।
* मंदिरों में सभी जातियों के प्रवेश और दलितों को पुजारी बनाए जाने की पहल का समर्थन किया।
* काशी में डोमराजा के घर संतों के साथ सहभोज सामाजिक समरसता अभियान का चर्चित प्रसंग रहा।
* अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट दलित समाज के व्यक्ति से रखवाने की पहल से जुड़ा उनका उल्लेख मिलता है।
* डॉ.अंबेडकर का संघर्ष जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध था, 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया।
* अंबेडकर ने मुस्लिम समाज में भी सामाजिक विभाजन और जातिगत श्रेणियों की आलोचना की थी।




