नरेंद्र मोदी का अंतिम सांस तक देशसेवा का दावा,छलिया का जारी है छलावा
मोदी जी, कुर्सी छोड़कर सेवा करके दिखाइए, देश देखना चाहता है कि बिना प्रधानमंत्री बने आप कितनी सेवा करते हैं!

- देशसेवा का सबसे बड़ा दावा करने वाले प्रधानमंत्री से एक सीधा सवाल—क्या देश की सेवा के लिए सत्ता की कुर्सी पर बैठे रहना जरूरी है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आखिरकार यह एहसास है कि उनकी भी एक दिन अंतिम सांस होगी। यह जानकर अच्छा लगा, क्योंकि उनके अनेक भाषणों और दावों को सुनकर कभी-कभी ऐसा लगता था कि मानो वे देश के राजनीतिक इतिहास में नहीं, बल्कि अमरत्व की किसी अलग ही दुनिया में विचरण कर रहे हों! उनकी बातों में अक्सर ऐसा आत्मविश्वास दिखाई देता है, जैसे देश की सारी उपलब्धियां उन्हीं से शुरू होती हैं और उनके बिना भारत की कल्पना ही अधूरी है।
लेकिन जिंदगी का सच किसी प्रधानमंत्री की कुर्सी, किसी पार्टी के बहुमत, किसी प्रचार अभियान या किसी भक्त की जय-जयकार से नहीं बदलता। हर इंसान की एक सीमा है। हर जीवन का अंत है। प्रधानमंत्री भी इसी मानवीय सच्चाई के अपवाद नहीं हैं।
सवाल यह नहीं है कि मोदी जी की अंतिम सांस कब आएगी। सवाल यह है कि जब तक सांस चल रही है, तब तक देशसेवा के नाम पर वे वास्तव में किसकी सेवा कर रहे हैं?
और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर वे सचमुच अंतिम सांस तक देश की सेवा करना चाहते हैं, तो क्या इसके लिए प्रधानमंत्री बने रहना अनिवार्य है?

देशसेवा का ठेका क्या केवल प्रधानमंत्री के पास है?
मोदी जी कहते हैं कि वे अंतिम सांस तक देश की सेवा करना चाहते हैं। बहुत अच्छी बात है! देशसेवा कोई बुरी चीज नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। लेकिन देशसेवा को इस तरह पेश करना कि मानो देश में केवल प्रधानमंत्री ही सेवा कर रहे हों और बाकी लोग अपनी जिंदगी व्यर्थ गंवा रहे हों, करोड़ों मेहनतकश भारतीयों के श्रम और योगदान का अपमान है।
इस देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो सुबह सूरज निकलने से पहले काम पर निकलते हैं और रात को थके हुए घर लौटते हैं। कोई खेत में पसीना बहाता है, कोई फैक्ट्री में मशीनों के बीच अपनी जिंदगी खपाता है, कोई सड़क पर रिक्शा चलाता है, कोई निर्माण स्थल पर ईंटें ढोता है, तो कोई बस, ट्रेन और मेट्रो में घंटों सफर करके अपनी रोजी-रोटी कमाता है।
कोई सफाईकर्मी गंदगी के बीच काम करता है। कोई नर्स रातभर मरीजों की देखभाल करती है। कोई शिक्षक बच्चों का भविष्य संवारता है। कोई जवान सीमा पर खड़ा रहता है। कोई मजदूर अपनी हड्डियां गलाकर उन इमारतों को खड़ा करता है, जिनमें बैठकर सत्ता के शिखर पर बैठे लोग विकास के भाषण देते हैं।
देशसेवा का अर्थ केवल देश के नाम पर भाषण देना नहीं, बल्कि देश के लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना है।
अठारह घंटे काम करने का दावा या मेहनतकशों के जीवन की हकीकत?
देश में लंबे समय से अठारह घंटे काम करने और छुट्टी न लेने जैसे दावों को राजनीतिक मेहनत का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता रहा है। लेकिन एक सवाल है—क्या किसी व्यक्ति के काम के घंटों की संख्या ही उसकी देशभक्ति का प्रमाण है?
एक मजदूर बारह घंटे काम करके भी महीने के अंत में किराया, राशन और बच्चों की फीस चुकाने के लिए संघर्ष करता है। एक दिहाड़ी मजदूर को काम न मिले तो उसके घर का चूल्हा ठंडा पड़ जाता है। एक किसान मौसम की मार, लागत और कर्ज के दबाव में अपनी फसल बचाने की जद्दोजहद करता है।
इन लोगों के लिए रविवार और सोमवार का फर्क कई बार खत्म हो जाता है। बीमारी के बावजूद काम पर जाना उनकी मजबूरी बन जाता है। छुट्टी लेना उनके लिए आराम नहीं, बल्कि मजदूरी गंवाने का दूसरा नाम होता है।
फिर भी उनकी मेहनत पर कोई विशेष अभियान नहीं चलता। उनकी थकान को देशभक्ति का तमगा नहीं मिलता। उनके पसीने से सने कपड़ों में कोई चुनावी चमक नहीं दिखाई जाती।
मोदी जी, सवाल यह नहीं कि आप कितने घंटे काम करते हैं। सवाल यह है कि आपके काम से आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया?
हम चुपचाप देशसेवा करते हैं, हमें किसी प्रचारतंत्र की जरूरत नहीं!
हम करोड़ों भारतीय अपने-अपने तरीके से देश की सेवा करते हैं। हममें से बहुत से लोगों का कोई भक्त नहीं है। हमारी जय-जयकार करने वाला कोई गोदी मीडिया नहीं है। हमारे जन्मदिन पर सरकारी प्रचार का शोर नहीं मचता और हमारे रोजमर्रा के काम को महान उपलब्धि बताकर पेश करने के लिए कोई तंत्र खड़ा नहीं होता।
हम बस में सफर करते हैं, लोकल ट्रेन और मेट्रो में धक्के खाते हैं, कई किलोमीटर पैदल चलते हैं। हम अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खाने, किराये, बिजली, दवा और बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं। हमारे पास महंगे कपड़े नहीं होते, सरकारी बंगले नहीं होते और सुरक्षा के लंबे काफिले नहीं होते।
हम दुकानों में सामान बेचते हैं, खेतों में अनाज उगाते हैं, सड़कों पर वाहन चलाते हैं, अस्पतालों में मरीजों की देखभाल करते हैं और निर्माण स्थलों पर इमारतें खड़ी करते हैं। हम उन लोगों के लिए भी काम करते हैं, जिनके व्यवहार से हमें शिकायत होती है। क्योंकि हमारी रोजी-रोटी, हमारा सामाजिक जीवन और हमारा मानवीय विवेक हमें अपना कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देते हैं।
संविधान की शपथ और सत्ता की जवाबदेही
प्रधानमंत्री का पद किसी व्यक्ति को देश का मालिक नहीं बनाता। यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री जनता के प्रति जवाबदेह होता है और उसका अधिकार संविधान तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं से निर्धारित होता है।
इसलिए जब कोई प्रधानमंत्री देशसेवा का दावा करता है, तो उसके दावे को भावनाओं की कसौटी पर ही नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और शासन के परिणामों की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए।
संविधान की शपथ लेना एक औपचारिक रस्म भर नहीं है। उसका अर्थ है कि सरकार जनता के अधिकारों का सम्मान करेगी, संस्थाओं की स्वतंत्रता बनाए रखेगी और असहमति को लोकतंत्र का हिस्सा मानेगी।
विपक्ष सवाल पूछे तो उसे दुश्मन समझना, पत्रकार जवाब मांगें तो उन्हें निशाना बनाना और हर राजनीतिक आलोचना को देशविरोध से जोड़ देना लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना के अनुकूल नहीं है।
प्रधानमंत्री से सवाल पूछना देश का अपमान नहीं है। प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना करना देश के खिलाफ जाना नहीं है। लोकतंत्र में नागरिक सरकार चुनते हैं, लेकिन सरकार नागरिकों की आलोचना करने का अधिकार समाप्त नहीं कर सकती।
अडानी-अंबानी की संपत्ति बढ़े, लेकिन आम आदमी की जिंदगी का क्या?
देश की अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। उद्योग, निवेश और रोजगार किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है?
जब आम आदमी महंगाई से जूझता है, नौजवान रोजगार के लिए भटकता है, छोटे कारोबारी बाजार के दबाव में संघर्ष करते हैं और किसान अपनी उपज की उचित कीमत पाने के लिए परेशान रहते हैं, तब केवल बड़े उद्योगपतियों की सफलता को राष्ट्रीय सफलता का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।
अडानी-अंबानी जैसे बड़े कारोबारी समूहों की आर्थिक गतिविधियों पर सवाल उठाना उद्योग-विरोध नहीं है। सवाल यह है कि सरकार की नीतियां सभी के लिए समान अवसर पैदा कर रही हैं या नहीं? क्या प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष है? क्या सार्वजनिक संसाधनों और नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता है? क्या विकास का लाभ समाज के निचले तबकों तक पहुंच रहा है?
महंगाई का बोझ ढोता आम आदमी भी इसी देश की सेवा करता है
आम आदमी की जिंदगी का संघर्ष किसी चुनावी मंच पर बोले गए वाक्य से कहीं अधिक कठोर होता है।
रसोई का बजट बिगड़ता है तो सबसे पहले परिवार अपनी जरूरतें कम करता है। बच्चों की फीस बढ़ती है तो माता-पिता अपने खर्चों में कटौती करते हैं। बीमारी आती है तो गरीब परिवार कर्ज लेने को मजबूर हो सकता है। नौकरी चली जाए या मजदूरी न मिले तो पूरे परिवार की आर्थिक सुरक्षा डगमगा जाती है।
किसी परिवार के लिए एक वक्त का भोजन छोड़ देना आंकड़ों में छोटा मामला लग सकता है, लेकिन उस घर के बच्चों और माता-पिता के लिए वह जीवन का दर्दनाक अनुभव होता है।
किसी गरीब की मौत किसी जर्जर इमारत के नीचे हो जाए, किसी मजदूर की जान कार्यस्थल पर चली जाए या कोई व्यक्ति इलाज के अभाव में दम तोड़ दे, तो उसके परिवार के लिए यह कोई सामान्य घटना नहीं होती। वह एक पूरी दुनिया के उजड़ जाने जैसा होता है।
ऐसे परिवारों के दुख को समझना और उनकी सुरक्षा के लिए व्यवस्था बनाना भी देशसेवा है।
देश की सेवा केवल राष्ट्रीय गौरव की बातें करने से पूरी नहीं होती। इसके लिए ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें नागरिक को भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षित जीवन के अवसर मिल सकें।
अब सबसे बड़ा सवाल,जिस पर होता है बवाल
मोदी जी, अगर आपका संकल्प वास्तव में अंतिम सांस तक देश की सेवा करने का है, तो इस सेवा को प्रधानमंत्री पद से जोड़ने की जरूरत क्यों है?
देश में लाखों सामाजिक कार्यकर्ता बिना किसी बड़े पद के काम करते हैं। डॉक्टर गरीबों का इलाज करते हैं। शिक्षक वंचित बच्चों को पढ़ाते हैं। किसान अन्न उगाते हैं। मजदूर निर्माण करते हैं। सामाजिक संगठन जरूरतमंदों की मदद करते हैं। बहुत से लोग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद दूसरों के जीवन में बदलाव लाने की कोशिश करते हैं।
उनके पास न प्रधानमंत्री का पद है, न सरकारी बंगला और न ही विशाल प्रचारतंत्र। फिर भी वे अपने काम के जरिए समाज की सेवा करते हैं।
इसलिए प्रधानमंत्री पद छोड़ना किसी व्यक्ति के लिए सेवा का अंत नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में पद स्थायी नहीं होते। सरकारें बदलती हैं, नेता आते-जाते हैं और जनता का अधिकार सर्वोपरि रहता है।



