Newsई-पेपरउत्तर प्रदेशराजनीतिलखनऊ

सवाल पूछना नही है गुनाह,मोदी तानाशाही से खुद हो जाएंगे फनाह लोकतंत्र की पहली शर्त ‘दिमागी नक्सल’ के लेबल से उठे बड़े सवाल

  • सत्ता से असहमति को देशद्रोह की तरह पेश करने की कोशिश लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत
  • सरकार से सवाल करने वाले पत्रकार और आलोचक अब निशाने पर
  • राजदीप सरदेसाई को ‘दिमागी नक्सल’ बताने पर एडिटर्स गिल्ड की आपत्ति
  • पत्रकार को राजनीतिक लेबल देना प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ
  • बहुमत सत्ता को मजबूत करता है, लेकिन सवालों से मुक्ति नहीं देता
  • स्वतंत्र मीडिया कमजोर हुआ तो लोकतंत्र में जनता की आवाज भी कमजोर होगी
  • विरोध की आवाज दबाने के बजाय सत्ता को सवालों का सामना करने की जरूरत

लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुमत नहीं, बल्कि जनता के सवालों का सामना करने का साहस होता है। जिस दिन सत्ता अपने आलोचकों को सुनने के बजाय उन्हें बदनाम करने, डराने या किसी राजनीतिक लेबल में बांधने लगे, उसी दिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद पर सवाल खड़े होने लगते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह चिंता और गंभीर हो जाती है, जहां संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का अधिकार देता है। सत्ता के विरोध में उठने वाली हर आवाज राष्ट्रविरोधी नहीं होती और सरकार की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति उसका दुश्मन नहीं हो सकता। हाल में भाजपा के आधिकारिक सोशल मीडिया मंच से ‘दिमागी नक्सल कौन है’ शीर्षक वाले वीडियो में विपक्षी नेताओं के साथ पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अभिनेता प्रकाश राज, यूट्यूबर ध्रुव राठी और गायक विशाल ददलानी जैसे लोगों को शामिल किए जाने से इसी सवाल ने नया रूप ले लिया है। खास तौर पर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में पेश किए जाने पर एडिटर्स गिल्ड की आपत्ति ने मीडिया की स्वतंत्रता और राजनीतिक सत्ता के रिश्ते पर बहस तेज कर दी है। सवाल सिर्फ एक पत्रकार को दिए गए राजनीतिक विशेषण का नहीं है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना अब किसी वैचारिक अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। यदि ऐसा वातावरण बना तो कल सवाल पूछने वाला पत्रकार, नागरिक और उसके बाद सरकार की आलोचना करने वाला कोई भी व्यक्ति निशाने पर हो सकता है। यही वह मोड़ है जहां लोकतंत्र को सजग होने की जरूरत है।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द ने बढ़ाई राजनीतिक बहस

लोकतंत्र में सत्ता और नागरिक के बीच सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता सवालों का होता है। जनता सवाल करती है, पत्रकार सवाल करते हैं, विपक्ष सवाल करता है और सत्ता को उन सवालों के जवाब देने होते हैं। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब सवालों का जवाब तर्क से देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही कठघरे में खड़ा किया जाने लगे, तब समस्या सिर्फ राजनीतिक नहीं रहती, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत का सवाल बन जाती है। भारत में इस समय असहमति और आलोचना की आवाज को लेकर जिस तरह की बहस चल रही है, वह इसी चिंता को सामने लाती है। सत्ता के विरोध को कुचलना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसका काम आलोचना से बचना नहीं, बल्कि आलोचना का जवाब देना है। 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा शुरू हुई। इसके बाद 20 अगस्त को भाजपा के आधिकारिक सोशल मीडिया मंच से ‘दिमागी नक्सल कौन है’ जैसे गीत के साथ एक वीडियो सामने आया, जिसमें राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, राजदीप सरदेसाई, प्रकाश राज, ध्रुव राठी और विशाल ददलानी जैसे चेहरे दिखाए गए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजनीतिक विरोध और वैचारिक असहमति के बीच सीमा कहां खींची जाएगी। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल राजनीतिक दलों का नेतृत्व करते हैं और भाजपा के प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। लेकिन राजदीप सरदेसाई पत्रकार हैं, प्रकाश राज अभिनेता हैं। ध्रुव राठी डिजिटल माध्यम पर सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं और विशाल ददलानी संगीत जगत से जुड़े व्यक्ति हैं। इन सभी को एक ही राजनीतिक विशेषण के दायरे में रख देने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले हर व्यक्ति को एक ही खांचे में रख दिया जाएगा?
पत्रकार का काम सत्ता की जय-जयकार करना नहीं
पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल करना है। पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता नहीं होता। उसका दायित्व जनता के सवालों को सत्ता तक पहुंचाना और सत्ता के निर्णयों की पड़ताल करना है।

राजदीप सरदेसाई को ‘दिमागी नक्सल’ बताए जाने पर एडिटर्स गिल्ड की आपत्ति

यदि कोई पत्रकार सरकार की आलोचना करता है तो उसका जवाब तथ्य और तर्क होना चाहिए। उसे राजनीतिक दुश्मन की तरह पेश करना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। यही कारण है कि राजदीप सरदेसाई को ‘दिमागी नक्सल’ बताए जाने पर एडिटर्स गिल्ड ने आपत्ति जताई। गिल्ड ने इसे गलत बताते हुए कहा कि लंबे पत्रकारिता जीवन में सरदेसाई ने समाचारों और राजनीतिक घटनाक्रमों का पेशेवर और निष्पक्ष विश्लेषण किया है। गिल्ड का यह भी कहना है कि किसी पत्रकार को केवल इसलिए सार्वजनिक रूप से बदनाम करना कि वह सरकार से सवाल करता है या उसकी नीतियों का विश्लेषण करता है, लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ है। यह आपत्ति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला किसी अनजान सोशल मीडिया ट्रोल तक सीमित नहीं है। आरोप सत्ता पक्ष के आधिकारिक सोशल मीडिया मंच से लगाए गए राजनीतिक लेबल को लेकर है। यहीं से चिंता और गंभीर हो जाती है। सवालों से डर कैसा, अगर सरकार अपने फैसलों पर आश्वस्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनता ने बहुमत दिया है। सरकार के पास राजनीतिक जनादेश है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि सरकार अपने फैसलों और नीतियों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है तो उसे तीखे सवालों से परेशानी क्यों होनी चाहिए। एक मजबूत सत्ता का परिचय यह नहीं कि उसके आसपास केवल प्रशंसा की आवाजें सुनाई दें। मजबूत सत्ता वह है जो सबसे कठिन सवाल सुन सके और उसका जवाब दे सके।

सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व

पत्रकार पूछे कि बेरोजगारी क्यों है, महंगाई क्यों है, किसान परेशान क्यों हैं, संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं, प्रेस की स्वतंत्रता पर चिंता क्यों जताई जा रही है, तो इन सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है। सवाल पूछने वाले को ‘दुश्मन’ घोषित कर देना जवाब नहीं है।

प्रेस की स्वतंत्रता पर चिंता

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की स्थिति लगातार बहस का विषय रही है। यही वजह है कि मीडिया संगठनों और पत्रकारों को इस मुद्दे पर अधिक सजग रहने की जरूरत है। विडंबना यह है कि जब विदेशी पत्रकार भारतीय प्रधानमंत्री से सवाल करते हैं तो कई बार बहस सवाल के जवाब से हटकर पत्रकार की योग्यता, शैली या पृष्ठभूमि पर पहुंच जाती है। लेकिन लोकतंत्र में असली प्रश्न पत्रकार का नहीं, सवाल का होना चाहिए। पत्रकार ने सवाल गलत पूछा है तो सरकार तथ्य रख सकती है। सवाल में तथ्यात्मक त्रुटि है तो उसे सुधारा जा सकता है। लेकिन पत्रकार को ही निशाना बना देना समस्या का समाधान नहीं है।

चाटुकारिता और पत्रकारिता के बीच फर्क मिटना खतरनाक

आज भारतीय मीडिया के सामने एक और बड़ी चुनौती है। पत्रकारिता और सत्ता की चाटुकारिता के बीच की सीमा का लगातार धुंधला होना। ऐसे टीवी कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की कमी नहीं, जहां सार्वजनिक महत्व के मुद्दों की जगह हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद और दूसरे भावनात्मक विवादों को प्रमुखता मिलती है। यह भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है। संसद में क्या हो रहा है। अस्पतालों में क्या स्थिति है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, महंगाई और कानून-व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर क्या है। यदि मीडिया का बड़ा हिस्सा इन सवालों के बजाय केवल सत्ता के पक्ष में माहौल बनाने में व्यस्त हो जाए तो लोकतंत्र में सूचना का संतुलन बिगड़ जाता है।

विरोध का दमन लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को संसद मार्च से रोकने के लिए बल प्रयोग और बिहार में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज तथा पानी की बौछार जैसे घटनाक्रमों को लेकर भी सवाल उठे हैं। किसी भी प्रदर्शन की अपनी कानूनी सीमाएं हो सकती हैं। प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र में यह भी उतना ही जरूरी है कि शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश बनी रहे। सरकार से अपना हक मांगना लोकतांत्रिक अधिकार है। विरोध करना अपराध नहीं है। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी पहचान है।

संविधान सत्ता से बड़ा

भारत का संविधान किसी सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह नागरिकों से केवल समर्थन की अपेक्षा करे। संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल स्तंभों में स्थान देता है। यही वजह है कि सत्ता बदलती रहती है, लेकिन संवैधानिक संस्थाएं कायम रहती हैं। आज जो दल सत्ता में है, वह हमेशा सत्ता में नहीं रहेगा। आज जो नेता बहुमत में हैं, कल विपक्ष में भी हो सकते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा किसी एक राजनीतिक दल के हित में नहीं, बल्कि हर दल और हर नागरिक के हित में है। एडिटर्स गिल्ड का बयान चेतावनी भी है कि पत्रकारों को बदनाम करने के लिए न किया जाए। यह बयान केवल राजदीप सरदेसाई का बचाव नहीं है। यह उस सिद्धांत का बचाव है कि पत्रकार को सरकार की आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए। पत्रकार संगठनों को केवल बयान जारी करने से आगे बढ़कर यह भी देखना होगा कि पत्रकारों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा व्यवहार में कैसे होगी। यदि हर बार किसी पत्रकार को निशाना बनाए जाने के बाद केवल एक बयान जारी हो और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाए, तो ऐसे बयानों की प्रभाव शीलता सीमित रह जाएगी।

लोकतंत्र में असली खतरा चुप्पी

लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा केवल सत्ता की कठोरता से नहीं, बल्कि समाज की चुप्पी से होता है। जब पत्रकार सवाल पूछना बंद कर दें, जब विपक्ष सवाल उठाने से डरने लगे, जब नागरिक आलोचना से बचने लगे और जब संस्थाएं दबाव महसूस करने लगें तब लोकतंत्र का बाहरी ढांचा भले कायम रहे, उसकी आत्मा कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए आज जरूरत किसी दल विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। जरूरत इस सिद्धांत के पक्ष में खड़े होने की है कि सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं है। पत्रकार सत्ता का विरोधी नहीं होता। वह जनता की आंख और कान होता है। वह गलत हो सकता है, उसकी आलोचना की जा सकती है, उसके सवालों का जवाब दिया जा सकता है। लेकिन उसे राजनीतिक दुश्मन बताकर चुप कराने की कोशिश लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है।

* सत्ता से सवाल करना लोकतंत्र का अधिकार है, अपराध नहीं।
* ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक लेबल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस तेज की।
* राजदीप सरदेसाई को निशाना बनाए जाने पर एडिटर्स गिल्ड ने आपत्ति जताई।
* सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकार को राजनीतिक विरोधी की तरह पेश करना चिंताजनक।
* बहुमत सरकार को जनादेश देता है, सवालों से छूट नहीं।
* प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के हर मामले में संयम और जवाबदेही जरूरी।
* मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर हुई तो जनता तक पहुंचने वाली सूचनाओं का संतुलन बिगड़ेगा।
* सत्ता बदलेगी, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थायी रहनी चाहिए।
* पत्रकार संगठनों को बयान से आगे बढ़कर प्रेस स्वतंत्रता की वास्तविक रक्षा करनी होगी।
* लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं, लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button