अंग्रेजों के मुखबिर रहे संघी गैंग किस मुँह से करता है,वंदेमातरम की बात,बेहयाई बतियाने में ये है उस्ताद

- वंदे मातरम् पर राष्ट्रभक्ति की परीक्षा या सियासत का नया इम्तिहान?
- गीत याद नहीं, मगर देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने निकली भाजपा
- 150 साल पुराने गीत को नया सरकारी प्रोटोकॉल मिला
- वंदे मातरम् पहले, जन गण मन बाद में गृह मंत्रालय ने तय किया नया सरकारी अनुशासन
- छह छंद गाने की अनिवार्यता के बीच भाजपा नेताओं की अपनी याददाश्त पर उठे सवाल
- जिस गीत पर मुस्लिम समाज भी एकमत नहीं, उसे सियासी ध्रुवीकरण का औजार बनाने का खतरा
- कुपोषण, बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक के बीच राष्ट्रगीत की नई परीक्षा क्यों
- राष्ट्रगीत का सम्मान जरूरी, मगर देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटना किसका अधिकार
- वंदे मातरम् के पीछे राष्ट्रप्रेम कितना और राजनीतिक नैरेटिव कितना यही असली सवाल

‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति, मातृभूमि के प्रति भाव और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा ऐतिहासिक गीत है। इसके सम्मान पर किसी गंभीर लोकतांत्रिक समाज में विवाद की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब किसी राष्ट्रीय प्रतीक को सम्मान देने के बजाय उसे राजनीतिक पहचान की कसौटी बना दिया जाए, तब सवाल गीत का नहीं, उसके इस्तेमाल का हो जाता है। 2026 में ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने इसके औपचारिक गायन के लिए नया प्रोटोकॉल जारी किया। गृह मंत्रालय के 28 जनवरी 2026 के निर्देश के अनुसार, जब राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाएं तो ‘वंदे मातरम्’ पहले होगा और उसका छह-छंद वाला आधिकारिक संस्करण करीब 3 मिनट 10 सेकंड का है। ऐसे औपचारिक अवसरों पर उपस्थित लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहने का निर्देश भी दिया गया है। यहां तक बात राष्ट्रीय प्रतीक के सम्मान की है। मगर इसके साथ ही राजनीति ने पुराने विवाद को फिर जगा दिया है पूरा गीत कौन गाएगा, कौन नहीं गाएगा, किसे राष्ट्रभक्त माना जाएगा और किसे राष्ट्रगीत का अपमान करने वाला। विडंबना यह है कि जिस गीत को लेकर दूसरों से राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांगा जा रहा है, उसी गीत के पूरे छह छंद देश के अधिकांश राजनेताओं और आम नागरिकों को याद नहीं हैं। सरकार के नए प्रोटोकॉल के बाद पुराना सवाल और तीखा हो गया है। देशभक्ति का अर्थ कठिन संस्कृत-बांग्ला पंक्तियां कंठस्थ कर लेना है, या उस देश के नागरिकों को बेहतर जीवन देना भी उसका हिस्सा है। जब युवा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और भ्रष्टाचार से जूझ रहे हों, तब राष्ट्रगीत के सम्मान के साथ राष्ट्र की वास्तविक हालत पर बात करना भी जरूरी है। क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ केवल गीत गाना नहीं, मातृभूमि को सम्मान देना भी है। अगर मातृभूमि के करोड़ों बच्चे भूख, बेरोजगारी और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से जूझ रहे हों, तो सवाल उठेगा ही मां को प्रणाम करने की रस्म बड़ी है या मां के बच्चों की जिंदगी।

राष्ट्रगीत पर नया प्रोटोकॉल, पुरानी राजनीति
भारत सरकार ने 2026 में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसके गायन को लेकर विस्तृत प्रोटोकॉल जारी किया है। गृह मंत्रालय के निर्देश के अनुसार, जब ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ एक साथ प्रस्तुत किए जाएंगे तो पहले ‘वंदे मातरम्’ होगा। आधिकारिक छह-छंद वाला संस्करण लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का है और निर्धारित सरकारी समारोहों में इसके गायन, वादन का प्रावधान किया गया है। आकाशवाणी ने भी 26 मार्च 2026 से छह-छंद वाले संस्करण के प्रसारण की शुरुआत की। इससे पहले स्वतंत्रता के बाद से उसके नियमित प्रसारण में आम तौर पर दो-छंद वाला संस्करण लगभग 65 सेकंड में प्रस्तुत किया जाता था। यानी सरकार ने केवल एक गीत को याद करने की अपील नहीं की है, बल्कि उसके औपचारिक प्रस्तुतिकरण के लिए एक समान व्यवस्था बनाने की कोशिश की है। लेकिन राजनीति ने इस प्रशासनिक व्यवस्था को वैचारिक संघर्ष में बदल दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने 22 अगस्त 2026 को ‘वंदे मातरम्’ की पूरी विरासत के सम्मान के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया और कांग्रेस द्वारा केवल पहले दो छंदों तक सीमित रहने की नीति की आलोचना की। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त 2026 को पार्टी कार्यक्रमों में पहले दो छंदों की अपनी पुरानी परंपरा कायम रखने का फैसला दोहराया, जिसकी जड़ 1937 के कांग्रेस निर्णय में है। इस तरह गीत अब सिर्फ गीत नहीं रहा। वह राजनीतिक अखाड़ा बन गया है।
1875 का गीत, 2026 का राजनीतिक हथियार
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी और बाद में यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी चेतना को गहरा प्रभाव दिया। 1950 में संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की बात स्वीकार की थी, जबकि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा मिला। संवैधानिक व्यवस्था ने दोनों के सम्मान को स्वीकार किया, लेकिन दोनों की भूमिकाएं समान नहीं रखीं। राष्ट्रीय गीत का सम्मान और राष्ट्रगान की संवैधानिक स्थिति अलग-अलग विषय हैं। लेकिन राजनीतिक भाषणों में दोनों को इस तरह पेश किया जाने लगा है मानो एक को लेकर असहमति देशभक्ति पर ही सवाल हो।
छह छंद बनाम दो छंद की ऐतिहासिक बहस
‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति भावनात्मक सम्मान का चित्रण है। बाद के छंदों में देवी-रूपक और हिन्दू धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ आते हैं। 1937 में कांग्रेस ने सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों के लिए शुरुआती दो छंदों को अपनाने का निर्णय किया था। उस समय मुस्लिम नेताओं और अन्य वर्गों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया था। ऐतिहासिक विवरणों में यह भी दर्ज है कि गीत के बाद के हिस्सों में दुर्गा आदि के संदर्भ होने के कारण धार्मिक संवेदनशीलता का प्रश्न उठा था।
इस ऐतिहासिक निर्णय को आज कोई सही माने या गलत बहस की जा सकती है। लेकिन उसे इतिहास से काटकर केवल ‘देशभक्ति बनाम देशद्रोह’ का प्रश्न बना देना इतिहास के साथ भी अन्याय है और लोकतंत्र के साथ भी।
मुस्लिम समाज की आपत्ति
‘वंदे मातरम्’ को लेकर मुस्लिम समाज की स्थिति एकरूप नहीं रही है। कुछ धार्मिक विद्वानों और संगठनों को इसके उन हिस्सों पर आपत्ति है जिनमें मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लामी एकेश्वरवाद की दृष्टि से किसी अन्य सत्ता की उपासना स्वीकार्य न होने के कारण कुछ मुसलमान पूरे गीत के गायन से परहेज करते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा मुस्लिम समाज ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करता है। देश में ऐसे असंख्य मुस्लिम नागरिक, कलाकार और सार्वजनिक व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इसे राष्ट्रप्रेम के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया है। ‘मां तुझे सलाम’ जैसे लोकप्रिय सांस्कृतिक रूपांतरणों ने भी इस भाव को व्यापक समाज तक पहुंचाया। इसलिए बहस को ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ में बदलना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देता है। संविधान में आस्था की जगह भी है, असहमति की भी भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यही भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है। कोई ‘वंदे मातरम्’ को पूरे सम्मान से गाए उसे अधिकार है। कोई उसके पहले दो छंद गाए उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा हो सकती है। कोई धार्मिक कारणों से कुछ अंश गाने से परहेज करे उसकी संवैधानिक स्थिति पर बहस हो सकती है। लेकिन किसी नागरिक की देशभक्ति का प्रमाणपत्र केवल इस आधार पर जारी कर देना कि उसने गीत की हर पंक्ति गाई या नहीं गाई यह लोकतांत्रिक दृष्टि से बेहद सतर्कता मांगता है। देशभक्ति आदेश से पैदा नहीं होती। वह नागरिक के मन में पैदा होती है।
भाजपा के लिए असली परीक्षा
भाजपा और उसके नेता ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान को लेकर कांग्रेस और विपक्ष पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन यहां एक असहज प्रश्न भाजपा के सामने भी खड़ा है। यदि यह गीत राष्ट्र गौरव का इतना महत्वपूर्ण प्रतीक है तो क्या पार्टी के सभी प्रमुख नेता इसके पूरे छह छंद ठीक से जानते हैं। समय-समय पर सामने आए वीडियो में भाजपा नेताओं को गीत की पंक्तियों या धुन को लेकर असहज होते देखा गया है। कुछ मामलों में नेताओं को शब्द याद करने के लिए मोबाइल तक देखना पड़ा। ऐसी घटनाएं राजनीतिक विरोधियों के लिए हथियार बनती हैं। जो पार्टी दूसरों से राष्ट्रगीत का हिसाब मांगती है, उसके अपने नेताओं की परीक्षा भी कभी-कभी कैमरा ले लेता है। राष्ट्रभक्ति की परीक्षा यदि होनी ही है तो वह सबकी होनी चाहिए। मान लेना चाहिए कि छह छंद याद न होना अपने आप में देशद्रोह नहीं है। भारत के करोड़ों लोग ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करते हैं लेकिन पूरा पाठ कंठस्थ नहीं रखते। गीत कठिन है, भाषा संस्कृतनिष्ठ है, लंबाई अधिक है और दशकों से सार्वजनिक रूप से मुख्यतः शुरुआती दो छंद ही गाए जाते रहे हैं। इसलिए किसी नागरिक को सिर्फ इस आधार पर कटघरे में खड़ा करना कि उसे पूरा गीत नहीं आता, हास्यास्पद होगा। क्या ‘वंदे मातरम्’ गाने से बेरोजगारी समाप्त हो जाएगी, पेपर लीक बंद हो जाएगा, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और दवाएं पर्याप्त हो जाएगी, महंगाई कम हो जाएगी, भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा, कुपोषित बच्चों को पोषण मिल जाएगा, गरीब परिवारों की आय बढ़ जाएगी, किसानों की समस्याएं खत्म हो जाएंगी, स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधर जाएगी निश्चित रूप से नहीं।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि राष्ट्रगीत बेकार है।
राष्ट्रीय प्रतीक समाज को जोड़ने का काम करते हैं। वे इतिहास की याद दिलाते हैं। वे स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति को जीवित रखते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब प्रतीक नीतियों का विकल्प बन जाए। राष्ट्रगीत जरूरी, लेकिन राष्ट्र की चिंता उससे ज्यादा जरूरी। किसी देश को केवल गीतों से नहीं, संस्थाओं से मजबूती मिलती है।
सिर्फ झंडे से नहीं, उसके नीचे खड़े नागरिकों के अधिकारों से। ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए यदि कोई नागरिक अपने बच्चे के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल के बाहर भटक रहा है तो राष्ट्रप्रेम की परीक्षा वहां भी है। कोई युवा डिग्री लेकर बेरोजगार बैठा है तो राष्ट्रप्रेम की परीक्षा वहां भी है। किसी गरीब परिवार के पास भोजन की स्थायी सुरक्षा नहीं है तो राष्ट्रप्रेम की परीक्षा वहां भी है। मां को प्रणाम करना अच्छी बात है। लेकिन मां के बच्चों को भूखा न रहने देना उससे बड़ी बात है।
धार्मिक ध्रुवीकरण का खतरा
‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को कोई गंभीर व्यक्ति नकार नहीं सकता। लेकिन जब इसके बहाने बार-बार मुस्लिम समाज की धार्मिक संवेदनशीलताओं को राजनीतिक भाषण का विषय बनाया जाता है, तो राष्ट्रगीत धीरे-धीरे राष्ट्रीय एकता के प्रतीक से राजनीतिक ध्रुवीकरण के औजार में बदल सकता है। यही वह जगह है जहां सावधानी की जरूरत है। अगर कोई मुस्लिम नागरिक धार्मिक कारण से गीत के कुछ हिस्से नहीं गाता, तो उससे देशभक्ति का प्रमाण मांगने के बजाय संविधान और इतिहास की रोशनी में बहस होनी चाहिए।
* ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
* 2026 के गृह मंत्रालय प्रोटोकॉल में संयुक्त प्रस्तुति के दौरान ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ से पहले रखने और आधिकारिक छह-छंद संस्करण के गायन का प्रावधान किया गया है।
* आकाशवाणी ने 26 मार्च 2026 से छह-छंद वाले संस्करण का प्रसारण शुरू किया।
* 1937 में कांग्रेस ने ऐतिहासिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को देखते हुए सार्वजनिक आयोजनों में पहले दो छंदों को अपनाने का निर्णय लिया था।
* मुस्लिम समाज ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एकमत नहीं है; विरोध और समर्थन दोनों मौजूद हैं।
* किसी राष्ट्रीय गीत का सम्मान और किसी नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता दोनों को साथ लेकर चलना लोकतंत्र की चुनौती है।
* भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जरूरी है कि राष्ट्रगीत को राजनीतिक ध्रुवीकरण से ऊपर रखें।
राष्ट्रगीत का ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन देशभक्ति का अंतिम प्रमाण नहीं।




