स्कूल हटाइए, कॉरिडोर बनाइए,गाय गोबर पढाईये,देश को बर्बाद कराइये
नई शिक्षा नीति का नया पाठ मंदिर बड़ा, बच्चा छोटा! महाकाल के पड़ोस में बच्चियों का स्कूल बेकार, क्योंकि वहां शिक्षा नहीं ‘भव्यता’ चाहिए!

- महाकाल लोक की भव्यता के आगे बेटियों की पढ़ाई छोटी क्यों?
- स्कूल दूर, कॉरिडोर करीब विकास के इस मॉडल में बच्चियों की जगह कहां
- मंदिरों पर करोड़ों, शिक्षा पर सवाल विश्वगुरु बनने का यह कैसा रास्ता
- पेपर लीक से स्कूल तक बच्चों के भविष्य के साथ व्यवस्था का लगातार खिलवाड़
- धर्म की घंटियां तेज, स्कूल की घंटियां कमजोर शिक्षा की प्राथमिकता पर बड़ा सवाल
- कॉरिडोर चमक रहे हैं, प्रयोगशालाएं तरस रही, विश्वगुरु के दावे की असली परीक्षा
उज्जैन में महाकाल मंदिर के पास स्थित शासकीय सराफा कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय को हटाकर करीब 12 किलोमीटर दूर दाऊदखेड़ी के नूतन स्कूल परिसर में समाहित करने की योजना ने शिक्षा व्यवस्था के उस नए दर्शन की झलक दिखा दी है, जिसमें बच्चियों का स्कूल शायद विकास में सबसे बड़ा अवरोध है। बच्चियां रो रही हैं, प्रदर्शन कर रही हैं, कलेक्टर कार्यालय पहुंच रही हैं और कह रही हैं हमें स्कूल यहीं चाहिए। सरकार शायद कह रही होगी बेटियों, तुम्हें स्कूल चाहिए या महाकाल लोक? यह सवाल केवल एक विद्यालय का नहीं है। यह उस प्राथमिकता का सवाल है जिसमें एक तरफ बच्चियों को उनके घर के पास शिक्षा देने वाला स्कूल हटाने की तैयारी है और दूसरी तरफ धार्मिक पर्यटन के नाम पर विशाल कॉरिडोर, सौंदर्यीकरण और सुविधाओं की योजनाएं देश के विकास का पैमाना बनती जा रही हैं। महाकाल लोक हो, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो या अयोध्या का राम मंदिर क्षेत्र धार्मिक स्थलों का विकास अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब विकास की चमक में स्कूल, अस्पताल, रोजगार और नागरिक सुविधाएं पृष्ठभूमि में चली जाएं और हमारी सरकारों की विशेषता देखिए बच्चियां स्कूल बचाने के लिए रो रही हैं, लेकिन व्यवस्था को शायद आंसुओं से ज्यादा कॉरिडोर की डिजाइन दिखाई देती है। शिक्षा का बजट कितना है, स्कूलों में शिक्षक कितने हैं, कितने बच्चे बुनियादी पढ़ाई कर पा रहे हैं, परीक्षाएं समय पर हो रही हैं या नहीं इन सवालों का जवाब देने में व्यवस्था को पसीना आता है। लेकिन मंदिर का नया शिखर कितना चमकेगा, कॉरिडोर कितना चौड़ा होगा और श्रद्धालुओं की संख्या कितनी बढ़ेगी इसका हिसाब बड़ी तेजी से निकल आता है। उधर राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा व्यवस्था का हाल यह है कि विद्यार्थी महीनों मेहनत करके परीक्षा देते हैं और फिर कभी पेपर लीक, कभी प्रशासनिक गड़बड़ी, कभी तकनीकी विवाद और कभी परिणाम संबंधी संकट उनके सपनों पर पानी फेर देता है। तो फिर शिक्षा व्यवस्था का नया सूत्र क्या है? स्कूल दूर करो, मंदिर पास करो। किताब कम करो, कॉरिडोर बढ़ाओ। शिक्षक पूछे तो बजट दिखाओ, भक्त पूछे तो भव्यता दिखाओ।
और अगर कोई सवाल करे तो उसे समझाइए कि देश विश्वगुरु बन रहा है। विश्वगुरु बनने की तैयारी ऐसी कि दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बहस कर रही है और हम बच्चों को यह समझाने में व्यस्त हैं कि इतिहास में किस राजा ने किस मंदिर में कितनी बार घंटी बजाई थी। क्योंकि शिक्षा की इस दुर्दशा पर केवल आंकड़े गिनाने से बात पूरी नहीं होती। जब बच्चियां स्कूल बचाने के लिए कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर रोती हैं और सत्ता को उनकी आंखों में दिखाई देने वाले भविष्य से ज्यादा जमीन का वर्तमान दिखाई देता है, तब सवाल केवल शिक्षा का नहीं रहता। सवाल यह होता है कि देश आखिर किस दिशा में पढ़ाया जा रहा है किताबों की ओर या कॉरिडोर की ओर?

बच्चियां रोती रहीं, विकास मुस्कुराता रहा
उज्जैन में छात्राओं का विरोध अपने आप में एक गंभीर संदेश है। वे किसी राजनीतिक दल के कार्यालय पर नहीं गईं। उनकी मांग भी कोई असंभव मांग नहीं थी।
वे कह रही थीं स्कूल यहीं रहने दीजिए। स्कूल उनके घर के आसपास है। उनकी दिनचर्या, परिवार, सुरक्षा और आवागमन उसी क्षेत्र से जुड़ा है। अचानक विद्यालय को दूर ले जाना उनके लिए केवल भवन बदलना नहीं है।
यह रोजमर्रा की जिंदगी बदलना है। खासकर किशोरियों के लिए विद्यालय की दूरी सुरक्षा, परिवहन और परिवार की आर्थिक क्षमता से जुड़ा प्रश्न होती है। लेकिन विकास का सरकारी शब्दकोश बड़ा विचित्र है। जहां बच्चियां पढ़ती हैं वहां जमीन की कीमत दिखाई देती है। जहां मंदिर है वहां पर्यटन की संभावना दिखाई देती है।
जहां गरीब रहते हैं वहां पुनर्विकास दिखाई देता है।
और जहां स्कूल है वहां स्थानांतरण की संभावना दिखाई देती है। शिक्षा के मंदिर को हटाकर धार्मिक मंदिर का विस्तार करने की प्राथमिकता अगर सचमुच बन रही है तो फिर नई शिक्षा नीति का अगला अध्याय शायद यही होगा विद्यालय वहीं रखें जहां जमीन सस्ती हो।
महाकाल लोक बड़ा हो, लेकिन महाकाल की बेटियों का स्कूल भी तो बड़ा सवाल
धार्मिक पर्यटन का विकास होना चाहिए। मंदिरों के आसपास सुविधाएं बढ़नी चाहिए। श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि विकास का मतलब क्या केवल धार्मिक ढांचे का विस्तार है? क्या उसी शहर में स्कूलों का विस्तार भी विकास नहीं है?
क्या अस्पताल का विस्तार विकास नहीं है? क्या सरकारी कॉलेजों में नए विभाग खोलना विकास नहीं है? क्या पुस्तकालय बनाना विकास नहीं है? क्या छात्राओं के लिए सुरक्षित परिवहन व्यवस्था विकास नहीं है? अगर महाकाल लोक के विस्तार के लिए जगह चाहिए तो सरकार को जनता के सामने पूरी परियोजना, जमीन का उपयोग, वैकल्पिक व्यवस्था और छात्राओं पर प्रभाव स्पष्ट करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार का काम केवल परियोजना बनाना नहीं है।
शिक्षा बनाम आस्था का झूठा मुकाबला
यहां एक बात साफ होनी चाहिए। मंदिर बनाम स्कूल का मुकाबला खड़ा करना भी गलत है। देश को मंदिर भी चाहिए और स्कूल भी। धार्मिक पर्यटन भी चाहिए और वैज्ञानिक शिक्षा भी। संस्कृति भी चाहिए और आधुनिक तकनीक भी। समस्या मंदिर से नहीं है, समस्या प्राथमिकता से है। जब सरकार के पास सीमित संसाधन हों और वह तय करे कि किस क्षेत्र में कितना निवेश करना है, तभी असली राजनीतिक चरित्र सामने आता है। एक तरफ परीक्षा व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में हो। दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की कमी हो। तीसरी तरफ उच्च शिक्षा महंगी होती जाए और चौथी तरफ धार्मिक स्थलों पर करोड़ों-अरबों की परियोजनाएं चमकती रहें। तब नागरिक पूछेगा ही मेरे बच्चे की किताब कब चमकेगी?
एनटीए का कमाल परीक्षा दो, इंतजार करो और फिर सुनो परीक्षा ही रद्द थी!
भारतीय विद्यार्थी के लिए प्रतियोगी परीक्षा अब परीक्षा कम और आध्यात्मिक साधना ज्यादा होती जा रही है।
पहले तैयारी करो, फिर आवेदन करो, फिर परीक्षा दो, फिर परिणाम का इंतजार करो, फिर खबर आए गड़बड़ी हुई है। फिर जांच, अदालत, नई तारीख फिर परीक्षा व परिणाम। अंत में विद्यार्थी समझ जाता है कि उसका असली मुकाबला दूसरे विद्यार्थियों से नहीं, व्यवस्था से था। एनटीए से जुड़ी परीक्षाओं पर पिछले वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा प्रक्रिया और परिणाम को लेकर गंभीर विवाद हुए हैं। नीट-यूजी 2024 और यूजीसी-नेट 2024 ने विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। विद्यार्थी का सवाल सीधा है अगर परीक्षा ही भरोसेमंद नहीं तो मेरिट किसकी? एक गरीब परिवार का बच्चा वर्षों की मेहनत और पैसा लगाकर परीक्षा की तैयारी करता है। उसके पास कोचिंग करने के लिए पैसा नहीं। दूसरी बार तैयारी करने के लिए समय नहीं। बार-बार परीक्षा देने के लिए मानसिक ऊर्जा नहीं और अगर व्यवस्था की गलती से उसकी परीक्षा रद्द हो जाए तो उसकी भरपाई कौन करेगा? सरकार, एनटीए या वह बच्चा खुद?
शिक्षा का बजट राशि बढ़ी, हिस्सा घटा तो तालियां किस बात की
शिक्षा पर सरकार कितना खर्च कर रही है, इसे केवल कुल रकम से नहीं समझा जा सकता। महंगाई बढ़ती है, जनसंख्या बढ़ती, नई योजनाएं आती हैं इसलिए यह देखना जरूरी है कि कुल सरकारी बजट में शिक्षा का हिस्सा कितना है और जीडीपी के अनुपात में खर्च कितना है। एनईपी 2020 ने शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश को जीडीपी के लगभग 6 प्रतिशत तक ले जाने की महत्वाकांक्षी दिशा निर्धारित की थी। यदि वास्तविक खर्च उस लक्ष्य से काफी नीचे बना रहता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि भाषण में विश्वगुरु बनने से विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय नहीं होते। उसके लिए चाहिए
शिक्षक, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, अनुसंधान, छात्रवृत्ति, तकनीक और सबसे जरूरी स्वतंत्र सोच। यदि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चे को सवाल पूछने से रोकना और केवल आधिकारिक कहानी याद कराना बन जाए तो फिर वह शिक्षा नहीं, परीक्षा-पूर्व प्रशिक्षण है।एएसईआर की घंटी वर्षों से बज रही है, मगर सत्ता को मंदिर की घंटी ज्यादा सुनाई देती है, एएसईआर की रिपोर्टों ने वर्षों से ग्रामीण भारत में बच्चों की बुनियादी पढ़ने और गणित की क्षमता को लेकर चिंता जताई है। कक्षा पांच का बच्चा यदि अपेक्षित स्तर की पाठ्य सामग्री नहीं पढ़ पा रहा है तो यह किसी एक सरकार की आलोचना से बड़ा प्रश्न है।
धर्म निजी आस्था है, संवैधानिक पद सार्वजनिक जिम्मेदारी
विश्वगुरु की तरफ जाने का रास्ता मंदिर से नहीं, प्रयोगशाला से भारत विश्वगुरु बनना चाहता है, बहुत अच्छी बात है। लेकिन विश्वगुरु बनने के लिए केवल प्राचीन गौरव की कथाएं पर्याप्त नहीं हैं। दुनिया एआई बना रही है। क्वांटम कंप्यूटिंग पर काम कर रही है। बायोटेक्नोलॉजी में निवेश कर रही है। अंतरिक्ष अनुसंधान आगे बढ़ा रही है। सेमीकंडक्टर निर्माण पर अरबों डॉलर खर्च कर रही है हमें भी इसी दौड़ में होना है। इसके लिए बच्चे को प्रयोगशाला, शिक्षक, विश्वविद्यालय स्वतंत्र शोध चाहिए।
वैज्ञानिकों को सम्मान और संसाधन चाहिए। यदि वैज्ञानिक संस्थानों से प्रतिभाएं बाहर जा रही हैं, यदि शोध का वातावरण कमजोर हो रहा है और यदि शिक्षा का राजनीतिकरण बढ़ रहा है तो विश्वगुरु का दावा केवल भाषण बनकर रह जाएगा। ऋषि-मुनियों की कहानियां प्रेरणा दे सकती हैं; लेकिन आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला में ही बनता है। महर्षि दधीचि का त्याग याद कीजिए। लेकिन आज के बच्चे से यह भी पूछिए वह वैज्ञानिक क्यों नहीं बनना चाहता? क्योंकि उसके पास प्रयोगशाला नहीं है, उसके पास छात्रवृत्ति नहीं है, उसका पेपर बार-बार रद्द होता है?
* उज्जैन में छात्राओं का स्कूल बचाने के लिए प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल है।
* धार्मिक पर्यटन का विकास गलत नहीं, लेकिन उसके साथ स्कूल और अस्पतालों का विकास भी अनिवार्य है।
* एनटीए की परीक्षाओं को लेकर बार-बार उठे विवाद ने विद्यार्थियों के भरोसे को चोट पहुंचाई है।
* एनईपी2020 ने शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश को जीडीपी के लगभग 6 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था।
* एएसईआर की रिपोर्टें वर्षों से बुनियादी सीखने की क्षमता में सुधार की जरूरत बताती रही हैं।
* शिक्षा का मूल्य केवल भवनों की संख्या नहीं, बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता से तय होना चाहिए।
* मंदिर जाना व्यक्तिगत आस्था है संवैधानिक पद की जिम्मेदारी सभी नागरिकों के प्रति है।
* भारत को विश्वगुरु बनाने का रास्ता केवल धार्मिक पर्यटन से नहीं, शिक्षा, शोध, विज्ञान और तकनीक से होकर जाता है।
* इतिहास पढ़ाना जरूरी है, लेकिन इतिहास को राजनीतिक हथियार बनाना शिक्षा को कमजोर करता है।
* बच्चों को अतीत का गौरव भी बताइए और भविष्य की तकनीक भी सिखाइए।
* भव्य कॉरिडोर के साथ भव्य सरकारी स्कूल कब बनेंगे?
* मंदिर की घंटी बजती रहे, लेकिन स्कूल की घंटी बंद नहीं होनी चाहिए




