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उप निदेशक मंडी संजय सिंह “चोर”,हर अनैतिक काम मे मनी मांगे “मोर”

पहड़िया मंडी में भ्रष्टाचार का बोलबाला, शुल्क से लेकर आवास तक हर स्तर पर खेल के आरोप

  • भ्रष्टाचार का साम्राज्य गेट से गेस्ट हाउस तक ‘सेटिंग’ का खेल
  • मंडी के नाम पर वसूली: काटा निःशुल्क, फिर भी हर गाड़ी से उगाही
  • पहड़िया मंडी बनी ‘कमाई का अड्डा’? बाहर से माल पार, अंदर जेबें गर्म
  • मंडी शुल्क में बड़ा खेल! कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप
  • सरकारी आवास पर कब्जा, गेस्ट हाउस बना निजी ठिकाना! पहड़िया मंडी में सवाल ही सवाल
  • फल-सब्जी व्यापारियों का आरोप: बिना चढ़ावे नहीं निकलती गाड़ी
  • पहड़िया मंडी में ‘अघोषित टैक्स’ का जाल, भ्रष्टाचार से कराह रहे व्यापारी

वाराणसी। सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मंडियों में शामिल पहड़िया मंडी इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है। व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी इस मंडी पर भ्रष्टाचार, अवैध वसूली, सरकारी नियमों की अनदेखी और अधिकारियों कर्मचारियों की मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोप यह है कि मंडी के भीतर जो व्यवस्था किसानों और व्यापारियों की सुविधा तथा सरकार के राजस्व के लिए बनाई गई थी, वही अब कुछ लोगों की अवैध कमाई का जरिया बन चुकी है। मंडी नियमों के अनुसार बाहर से आने वाली हर फल और सब्जी की गाड़ी को पहड़िया मंडी में प्रवेश कराना, उसका वजन कराना और निर्धारित मंडी शुल्क जमा कराना अनिवार्य है। लेकिन व्यापारियों का आरोप है कि वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है। आरोपों के मुताबिक उप मंडी निदेशक संजय सिंह कुछ कर्मचारियों व पालतू टॉमी की मिलीभगत से बड़ी मात्रा में माल मंडी परिसर के बाहर ही छोटी गाड़ियों में ट्रांसफर कर अन्य बाजारों और गोदामों में भेज दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी शुल्क जमा नहीं होता और कथित रूप से नकद रकम सीधे एक नम्बर के चोरकट उप निदेशक मंडी संजय सिंह की जेब में पहुंचती है।

व्यापारियों का दावा है कि प्रतिदिन 20 से 30 गाड़ियों तक माल मंडी के बाहर इधर-उधर कराया जाता है। इससे जहां सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है, वहीं ईमानदारी से शुल्क जमा करने वाले व्यापारियों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि जो व्यापारी नियमों का पालन करते हैं, वही आर्थिक बोझ झेलते हैं, जबकि ‘सेटिंग’ वाले लोग बिना शुल्क दिए माल निकाल लेते हैं। इससे मंडी व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सिर्फ मंडी शुल्क ही नहीं, बल्कि लाइसेंस और नवीनीकरण प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि लाइसेंस बनवाने और उसके नवीनीकरण के नाम पर व्यापारियों से अतिरिक्त धन की मांग की जाती है। व्यापारी खुलकर तो सामने नहीं आ रहे, लेकिन दबे स्वर में उनका कहना है कि बिना ‘सुविधा शुल्क’ दिए कोई काम समय से नहीं होता।

मंडी के गेट नंबर-1 स्थित धर्मकांटे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यहां बोर्ड पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि गाड़ियों का वजन निःशुल्क किया जाता है, लेकिन आरोप है कि कर्मचारियों द्वारा प्रति गाड़ी 50 से 100 रुपये तक की वसूली की जाती है। यही नहीं, गाड़ियों को बाहर निकालने के नाम पर भी कथित तौर पर अलग से रकम ली जाती है। व्यापारियों का आरोप है कि यह ‘अघोषित टैक्स’ वर्षों से जारी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। मामला यहीं खत्म नहीं होता। मंडी परिसर के गेस्ट हाउस को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि उप मंडी निदेशक ने गेस्ट हाउस को ही अपना आवास बना रखा है, जबकि उन्हें सरकार की ओर से आवास भत्ता भी मिलता है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसके लिए कोई अधिकृत किराया जमा किया जा रहा है? यदि हां, तो उसकी प्रक्रिया और विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं है? इसके अलावा मंडी के सरकारी आवासों में निजी लोगों के अवैध रूप से रहने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। मंडी सचिव के आवास के सामने तक बाहरी लोगों के कब्जे की चर्चा है। व्यापारियों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक कोई कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या मंडी प्रशासन में बैठे जिम्मेदार अधिकारी उप निदेशक मंडी संजय सिंह के कुकर्मो से से अनजान हैं या फिर सब कुछ उनकी जानकारी में हो रहा है? पहड़िया मंडी में उठ रहे ये सवाल अब केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रह गए, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुके हैं।

नियमों को दरकिनार कर बाहर ही हो रहा माल का ट्रांसफर

वाराणसी की पहड़िया मंडी पूर्वांचल की प्रमुख फल एवं सब्जी मंडियों में गिनी जाती है। यहां प्रतिदिन बड़ी मात्रा में फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद पहुंचते हैं। पूर्वांचल के कई जिलों के किसान, व्यापारी और ट्रांसपोर्टर इस मंडी पर निर्भर हैं। लेकिन जिस मंडी को किसानों और व्यापारियों की आर्थिक धुरी माना जाता है, वहीं अब भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के आरोपों का केंद्र बनती जा रही है। मंडी नियम स्पष्ट कहते हैं कि बाहर से आने वाली हर गाड़ी को मंडी परिसर में प्रवेश कराना और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसका वजन व शुल्क जमा कराना अनिवार्य है। लेकिन व्यापारियों का आरोप है कि इस नियम को खुलेआम उप निदेशक मंडी संजय सिंह द्वारा ताक पर रखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार कई बड़े ट्रक और लोडर मंडी के बाहर ही रोक लिए जाते हैं। वहां से माल छोटी निजी गाड़ियों में लादकर अलग-अलग बाजारों और गोदामों में भेज दिया जाता है। इससे मंडी शुल्क बच जाता है और कथित रूप से नकद लेन-देन के जरिए अवैध कमाई की जाती है। व्यापारियों का कहना है कि यह कोई एक-दो दिन का खेल नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही संगठित व्यवस्था है। आरोप है कि प्रतिदिन 20 से 30 गाड़ियों तक माल बाहर ही इधर-उधर किया जाता है। यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो तो करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का मामला सामने आ सकता है।

सेटिंग वालों को राहत, ईमानदार व्यापारी परेशान

मंडी में व्यापार करने वाले कई छोटे व्यापारियों का कहना है कि यहां दो तरह की व्यवस्था चल रही है। एक वे लोग हैं जो नियमों का पालन करते हुए पूरा शुल्क जमा करते हैं। दूसरे वे लोग हैं जिनकी बेईमान उप निदेशक संजय सिंह और अन्य कर्मचारियों से ‘सेटिंग’ है। व्यापारियों का आरोप है कि सेटिंग वाले लोगों को आसानी से माल बाहर भेजने की छूट मिल जाती है, जबकि सामान्य व्यापारी को छोटी-छोटी बातों पर परेशान किया जाता है। इससे मंडी में असमान प्रतिस्पर्धा का माहौल बन रहा है। एक व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि कोई व्यापारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके वाहनों की जांच बढ़ा दी जाती है, कागजी कार्रवाई में अड़चनें डाली जाती हैं और उसे मानसिक रूप से संजय सिंह द्वारा प्रताड़ित किया जाता है।

लाइसेंस और नवीनीकरण में कथित वसूली

मंडी समिति द्वारा व्यापारियों के लाइसेंस जारी करने और उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। व्यापारियों का आरोप है कि बिना अतिरिक्त रकम दिए फाइलें आगे नहीं बढ़ती। कई व्यापारियों का कहना है कि नियमों के अनुसार शुल्क जमा करने के बावजूद उन्हें अलग से ‘सुविधा शुल्क’ देना पड़ता है। यदि कोई व्यापारी ऐसा करने से मना कर दे तो उसकी फाइल लंबित कर दी जाती है। व्यापारियों का आरोप है कि यह वसूली व्यवस्थित तरीके से उप निदेशक मंडी संजय सिंह द्वारा कराई जाती है। और इसमें नीचे से ऊपर तक कई लोग शामिल रहते हैं। हालांकि इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रही शिकायतों ने मंडी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

धर्मकांटे पर निःशुल्क सेवा के बावजूद वसूली का आरोप

मंडी के गेट नंबर-1 स्थित धर्मकांटे पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि गाड़ियों का वजन निःशुल्क किया जाता है। लेकिन व्यापारियों का आरोप है कि कर्मचारियों द्वारा प्रति गाड़ी 50 से 100 रुपये तक लिए जाते हैं।

ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि यदि कोई पैसा देने से मना कर दे तो उसके वाहन को इस लम्पट धूर्त व चोर उप निदेशक मंडी संजय सिंह द्वारा घंटों रोक दिया जाता है। इससे समय और आर्थिक नुकसान दोनों होता है। मजबूरी में लोग पैसे देकर आगे बढ़ जाते हैं।

व्यापारियों के अनुसार यह रकम छोटी दिखाई देती है, लेकिन यदि प्रतिदिन आने-जाने वाली गाड़ियों की संख्या को देखा जाए तो यह लाखों रुपये का अनधिकृत संग्रह बन जाता है।

गाड़ी बाहर निकालने के नाम पर अलग उगाही

आरोप यह भी है कि मंडी के गेट नंबर-2 पर गाड़ी बाहर निकालने के नाम पर अलग से वसूली की जाती है। व्यापारी बताते हैं कि बिना पैसे दिए कई बार वाहनों को रोका जाता है या अनावश्यक बहस की जाती है। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है। कई बार शिकायतें भी हुईं, लेकिन कोई स्थायी कार्रवाई नहीं हुई। इससे कर्मचारियों के हौसले और बढ़ गए हैं।

गेस्ट हाउस बना अधिकारियों का निजी आवास

मंडी परिसर स्थित गेस्ट हाउस को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि उप मंडी निदेशक संजय ने इसे अपना स्थायी आवास बना रखा है। व्यापारियों का कहना है कि यदि अधिकारी को सरकार की ओर से आवास भत्ता मिल रहा है तो फिर गेस्ट हाउस में रहने का औचित्य क्या है? यदि कोई किराया जमा किया जा रहा है तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। लोगों का कहना है कि गेस्ट हाउस मूल रूप से आगंतुक अधिकारियों और विशेष परिस्थितियों के लिए बनाया जाता है, लेकिन यदि उसे निजी आवास की तरह इस्तेमाल किया जाए तो यह सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।

किसानों पर भी पड़ रहा असर

इस पूरे कथित भ्रष्टाचार का असर केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं है। किसान भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि जब अवैध वसूली बढ़ती है तो उसका आर्थिक बोझ अंततः किसानों और उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है। यदि मंडी शुल्क और अन्य प्रक्रियाओं में पारदर्शिता हो तो किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं और उपभोक्ताओं तक सामान उचित कीमत पर पहुंच सकता है।

प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल

इतने गंभीर आरोपों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अब तक इस घूसखोर बागड़बिल्ले संजय सिंह पर कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई है। यही वजह है कि व्यापारियों और स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराई जाए, सीसीटीवी फुटेज खंगाली जाए और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच हो तो पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है। व्यापारियों ने कई मांगें उठाई कि मंडी शुल्क व्यवस्था की डिजिटल मॉनिटरिंग हो, सभी गेटों पर सीसीटीवी कैमरों की लाइव निगरानी हो, धर्मकांटे की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन हो, गाड़ियों की एंट्री और निकासी का सार्वजनिक रिकॉर्ड बने, अवैध कब्जों की जांच कर कार्रवाई हो, गेस्ट हाउस उपयोग का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए, लाइसेंस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। पहड़िया मंडी से जुड़े आरोप अब आम चर्चा का विषय बन चुके हैं। व्यापारी, किसान और ट्रांसपोर्टर अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?

क्या सरकार मंडी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए कठोर कदम उठाएगी? क्या राजस्व की कथित चोरी करने वाले उप निदेशक मंडी संजय सिंह के अवैध वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?

इन सवालों के जवाब आने बाकी हैं, लेकिन इतना जरूर है कि पहड़िया मंडी में उठ रही आवाजें अब दबने वाली नहीं दिख रही हैं।

  •  मंडी के बाहर ही माल ट्रांसफर कर शुल्क चोरी के आरोप
  •  प्रतिदिन 20-30 गाड़ियों से कथित अवैध कारोबार
  •  उप निदेशक मंडी संजय सिंह, मंडी सचिव, निरीक्षक और कर्मचारियों की मिलीभगत के आरोप
  •  लाइसेंस और नवीनीकरण में वसूली की चर्चा
  •  धर्मकांटे पर निःशुल्क सेवा के बावजूद प्रति गाड़ी वसूली का आरोप
  •  गाड़ी बाहर निकालने के नाम पर अलग उगाही
  •  गेस्ट हाउस को निजी आवास की तरह इस्तेमाल करने के आरोप
  •  सरकारी आवासों पर अवैध कब्जे की चर्चा
  •  व्यापारियों ने निष्पक्ष जांच और डिजिटल मॉनिटरिंग की मांग उठाई
  •  मंडी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े

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