योगी के पास आवास एवं शहरी नियोजन का प्रभार,अपने पीए सन्दीप का लिया जान, कातिल सरीखा है वीडीए उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा का किरदार
उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा का सन्दीप मिश्रा नही सह सके तानाशाही, हार्ट अटैक से जान गवाई

- दिनांक 19/8/2026 को सुबह 7 से 9 के बीच उपाध्यक्ष को बताया कि मेरी तबियत नही ठीक है,लेकिन पूर्ण बोरा नही दी छुट्टी कहा जियो चाहे मरो आफिस आना ही होगा
- जब सन्दीप की चली गयी जान तो डैमेज कंट्रोल के लिये 24 घण्टे रहा सन्दीप मिश्रा की डेड बॉडी के साथ
- प्रधिकरण के उपाध्यक्ष ने कथित तौर पर 10 लाख दिए और 40 लाख देने का किया वादा
- साथी सन्दीप मिश्रा की मौत से प्राधिकरण के कर्मचारी बेहद गुस्से में,जल्दी ही करेंगे पूर्ण बोरा के खिलाफ आंदोलन
- सन्दीप मिश्रा की मौत और वीडीए की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

वाराणसी/लखनऊ/। यूं तो हर सरकारी सेवक जनता का सेवक होता है। चाहे वह कलेक्टर हो या चपरासी, पुलिस कमिश्नर हो या डीजीपी, आईएएस अधिकारी हो या किसी विभाग का कर्मचारी—हर व्यक्ति की जिम्मेदारी जनता की सेवा करना, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करना है। वरिष्ठ अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह काम लेने के साथ-साथ अपने मातहतों की परेशानियों और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखे।
लेकिन जब किसी सरकारी कर्मचारी की अचानक मृत्यु हो जाती है और उसके बाद कार्यस्थल के दबाव तथा वरिष्ठ अधिकारी के व्यवहार को लेकर सवाल उठने लगते हैं, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।

वाराणसी विकास प्राधिकरण यानी वीडीए में तैनात सन्दीप मिश्रा की 19 अगस्त 2026 को हुई मौत को लेकर भी ऐसे ही गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। उनके सहयोगियों और संबंधित लोगों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह वीडीए उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा की कथित कठोर कार्यशैली और काम के दबाव से परेशान थे।
यह भी दावा किया जा रहा है कि 19 अगस्त की सुबह करीब सात से नौ बजे के बीच सन्दीप मिश्रा ने अपनी तबीयत खराब होने की जानकारी दी थी और छुट्टी की मांग की थी, लेकिन आरोप है कि उन्हें इसके बावजूद कार्यालय आने के लिए कहा गया।
यदि यह आरोप सही है तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल है कि जब कोई कर्मचारी अपनी खराब तबीयत की सूचना देता है तो उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?
क्या उसकी समस्या को गंभीरता से लिया गया?
क्या उसे आराम या चिकित्सा सहायता लेने की सलाह दी गई?
या फिर केवल कार्यालयी काम को प्राथमिकता दी गई?
इन सवालों का जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।

19 अगस्त की सुबह का घटनाक्रम
मामले में लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार सन्दीप मिश्रा ने उस सुबह अपने वरिष्ठ अधिकारी को बताया था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि उन्होंने छुट्टी या आराम की अनुमति मांगी थी।
आरोप है कि उन्हें कार्यालय आने के लिए कहा गया।
यदि वास्तव में ऐसा हुआ था तो इस बातचीत की परिस्थितियां जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए। उस दिन की फोन कॉल, संदेश, कार्यालयी रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
यह भी देखा जाना चाहिए कि सन्दीप मिश्रा की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति पहले से कैसी थी और क्या उन्होंने इससे पहले कभी अपनी परेशानी किसी अधिकारी या सहकर्मी को बताई थी।
पूर्ण बोरा को क्यो न समझा जाए अपने पीए सन्दीप मिश्रा कातिल
पूरे देश मे सारे सरकारी ऑफिस 10 से 5 चलते है कभी कभी विशेष परिस्थितियों में 2 या 3 घण्टे ज्यादा भी चल जाते है,लेकिन ये कभी कभार ही होता है।बड़े ही खेद का विषय है कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में वाराणसी विकास प्राधिकरण का कार्यालय विगत 6 महीनों से रोज 9 बजे तक चलाया जा रहा था।यह कुकर्म वीडीए के उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा द्वारा किया जा रहा था।कार्यो की अधिकता के कारण सारे बड़े और छोटे कर्मचारी गहरे अवसाद में है।सन्दीप मिश्रा जो उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा के पीए रहे है,बेहद तनाव के चलते हार्ट अटैक के शिकार हो गया और इनका निधन हो गया।तो पूर्ण बोरा को क्यो न सन्दीप की मौत का जिम्मेदार माना जाए।
मौत के बाद भी उठे सवाल
सन्दीप मिश्रा की मौत के बाद वीडीए की कार्यशैली को लेकर कई सवाल उठने लगे। यह आरोप भी सामने आया कि वीडीए उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा डैमेज कंट्रोल के लिए करीब 24 घंटे तक मृतक के शव के साथ रहा।
यदि ऐसा हुआ है तो इसकी वास्तविक परिस्थितियों को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
क्या वह परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए वहां मौजूद थे? क्या कोई प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही थी? क्या परिवार की मदद के लिए वह वहां रहे?
इन सवालों का जवाब संबंधित लोगों और उपलब्ध रिकॉर्ड से मिल सकता है।
किसी मृत कर्मचारी के परिवार के साथ खड़ा होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब उसी मामले में वरिष्ठ अधिकारी की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हों तो पारदर्शिता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आर्थिक सहायता को लेकर भी चर्चा
मामले में यह आरोप भी लगाया गया है कि प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से कथित तौर पर 10 लाख रुपये की सहायता दी गई और आगे 40 लाख रुपये देने का आश्वासन दिया गया।
यदि ऐसा हुआ है तो इसकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
- क्या 10 लाख रुपये दिए गए?
- यदि दिए गए तो किस माध्यम से?
- क्या इसकी कोई रसीद या आधिकारिक रिकॉर्ड है?
- 40 लाख रुपये देने का आश्वासन किस रूप में दिया गया?
- क्या इसके संबंध में कोई लिखित दस्तावेज मौजूद है?
इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए ताकि किसी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे।
आर्थिक सहायता निश्चित रूप से परिवार की तत्काल जरूरतों में मदद कर सकती है, लेकिन आर्थिक सहायता से मृत्यु से जुड़े मूल सवाल समाप्त नहीं होते। परिवार को यह जानने का अधिकार है कि उनके सदस्य की मृत्यु से पहले क्या परिस्थितियां थीं।
क्या काम के दबाव में थे सन्दीप?
इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू कथित कार्यदबाव है।
यह साबित करना कि काम के दबाव के कारण ही किसी व्यक्ति को हृदयाघात हुआ, चिकित्सकीय प्रमाण के बिना संभव नहीं है। इसलिए इस विषय में सावधानी आवश्यक है।
लेकिन यदि उनके सहकर्मी यह कह रहे हैं कि सन्दीप मिश्रा काम के दबाव में थे या वरिष्ठ अधिकारी की कथित कार्यशैली से परेशान थे, तो इस दावे को भी जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए।
- उनके ऊपर कितना काम था?
- क्या उनके काम के घंटे सामान्य थे?
- क्या वह पहले कभी कार्यदबाव की शिकायत कर चुके थे?
- क्या उन्होंने परिवार या सहकर्मियों के सामने अपनी परेशानी बताई थी?
- क्या कार्यालय में उनके व्यवहार या स्वास्थ्य में कोई बदलाव देखा गया था?
- इन सभी पहलुओं से सच्चाई सामने आ सकती है।
सरकारी कर्मचारी मशीन नहीं है
सरकारी कार्यालयों में काम का दबाव होना स्वाभाविक है। अधिकारी अपने लक्ष्य पूरा करवाते हैं और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। लेकिन कोई भी कर्मचारी मशीन नहीं होता।
उसका स्वास्थ्य है, परिवार है, व्यक्तिगत परेशानियां हैं और शारीरिक सीमाएं हैं।
यदि कोई कर्मचारी कहता है कि उसकी तबीयत खराब है तो उसकी बात सुनना मानवीय और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से जरूरी है।
काम महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी कार्यालयी काम से अधिक महत्वपूर्ण कर्मचारी का जीवन है।
इसीलिए यदि सन्दीप मिश्रा ने वास्तव में अपनी खराब तबीयत की जानकारी दी थी तो उस सूचना के बाद क्या कार्रवाई हुई, यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।
कर्मचारियों में कथित आक्रोश
सन्दीप मिश्रा की मौत के बाद वीडीए के कर्मचारियों में कथित रूप से आक्रोश की स्थिति बताई जा रही है। यह भी चर्चा है कि कर्मचारी जल्द ही पूर्ण बोरा के खिलाफ आंदोलन कर सकते हैं।
यदि कर्मचारी आंदोलन करते हैं तो प्रशासन को इसे टकराव में बदलने के बजाय बातचीत के माध्यम से हल करने की कोशिश करनी चाहिए।
कर्मचारियों की शिकायतें सुनी जानी चाहिए। उनके पास जो तथ्य, दस्तावेज या शिकायतें हैं, उन्हें जांच के सामने रखने का अवसर मिलना चाहिए।
साथ ही जिस अधिकारी पर आरोप लगाए जा रहे हैं, उसे भी अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए।
निष्पक्ष जांच का अर्थ यही है कि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों की बात सुनी जाए।
पूर्ण बोरा पर लगाए गए आरोप
माया रानी अग्रहरि, एडवोकेट द्वारा लिखे गए लेख में वीडीए उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा की कार्यशैली को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। लेख में कथित भ्रष्टाचार, अवैध धन उगाही, कर्मचारियों के उत्पीड़न और कठोर व्यवहार जैसे आरोप लगाए गए हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। किसी भी अधिकारी को बिना जांच दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
लेकिन गंभीर आरोप सामने आने के बाद उनकी जांच होना भी जरूरी है।
यदि आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेज, शिकायत, सरकारी रिकॉर्ड, ऑडियो या वीडियो मौजूद हैं तो उन्हें सक्षम अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारी को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलना चाहिए।
योगी सरकार और शासन के सामने सवाल
वाराणसी विकास प्राधिकरण राज्य के आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा है। ऐसे में वीडीए में किसी कर्मचारी की मौत और वरिष्ठ अधिकारी की कार्यशैली को लेकर उठ रहे सवालों को शासन स्तर पर भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
क्यारिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत होने पर निष्पक्ष जांच होती है?
क्या क वीडीए में कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण है?
क्या कर्मचारी अपनी समस्या बिना डर के बता सकते हैं?
क्या वर्मचारियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाता है?
और यदि किसी कर्मचारी की अचानक मौत होती है तो क्या उसके कार्यस्थल की परिस्थितियों की भी जांच की जाती है?
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
निष्पक्ष जांच ही रास्ता
सन्दीप मिश्रा की मौत की जांच केवल मेडिकल रिपोर्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। मृत्यु के कारण का चिकित्सकीय परीक्षण अपनी जगह जरूरी है, लेकिन मृत्यु से पहले की परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए।
- उनकी मेडिकल हिस्ट्री की जांच हो।
- उनके पिछले दिनों के काम और कार्यभार की जानकारी ली जाए।
- 19 अगस्त की सुबह हुई कथित बातचीत की पुष्टि की जाए।
- सहकर्मियों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाएं।
- यदि उन्होंने पहले कोई शिकायत की थी तो उसका रिकॉर्ड देखा जाए।
- कथित 10 लाख रुपये की सहायता और 40 लाख रुपये के आश्वासन की वास्तविकता स्पष्ट की जाए।
- इन सभी तथ्यों के सामने आने के बाद ही निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
परिवार को चाहिए सच्चाई
सन्दीप मिश्रा के परिवार के लिए सबसे बड़ी क्षति उनका अपना सदस्य खोना है। कोई भी आर्थिक सहायता इस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती।
परिवार यह जानना चाहता होगा कि उनके अपने व्यक्ति के साथ आखिरी समय में क्या हुआ।
- क्या उन्होंने अपनी तबीयत खराब होने की सूचना दी थी?
- क्या उन्होंने छुट्टी मांगी थी?
- क्या उन्हें कार्यालय आने के लिए कहा गया?
- क्या वह पहले से तनाव में थे?
- क्या उनकी मृत्यु के पीछे कोई प्रशासनिक लापरवाही थी?
- इन सवालों का जवाब परिवार का अधिकार है।
सन्दीप मिश्रा की मौत ने वीडीए की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
19 अगस्त की सुबह उनकी कथित खराब तबीयत की सूचना, कार्यालय आने को लेकर लगाए जा रहे आरोप, उसके बाद उनकी अचानक मौत, वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका, कथित आर्थिक सहायता और कर्मचारियों में उठता आक्रोश—इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि उन्होंने अपनी खराब तबीयत की जानकारी दी थी और इसके बावजूद उन पर अनुचित दबाव बनाया गया, तो निश्चित रूप से प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल उठेगा।और यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो पूर्ण बोरा को भी अपना पक्ष स्पष्ट करने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
क्योंकि न्याय का मतलब किसी एक पक्ष को सही साबित करना नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाना है।
सन्दीप मिश्रा के परिवार को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि अपने सवालों के जवाब चाहिए।
वीडीए के कर्मचारियों को केवल आदेश नहीं, बल्कि सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य वातावरण चाहिए।
और प्रशासन को केवल अपने अधिकारियों का बचाव नहीं, बल्कि हर गंभीर शिकायत की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
किसी भी सरकारी फाइल, आदेश या लक्ष्य से बड़ा किसी कर्मचारी का जीवन है।
अब सवाल यही है कि क्या सन्दीप मिश्रा की मौत से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होगी? क्या उनके परिवार को सच्चाई और न्याय मिलेगा? क्या वीडीए कर्मचारियों की शिकायतें सुनी जाएंगी? और यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो क्या जिम्मेदारी तय होगी?
इन सवालों के जवाब जरूरी हैं, ताकि सन्दीप मिश्रा की मौत केवल एक खबर बनकर न रह जाए, बल्कि सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों के सम्मान, स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चेतावनी बने।
योगी सरकार और शासन के सामने सवाल



