Newspublicई-पेपरउत्तर प्रदेशवाराणसीशासन प्रशासन

बड़ागांव पुलिस की लापरवाही, महिला ने गंवाई जान, निकम्मों को शर्म न आई!

रास्ते के विवाद से परेशान महिला ने शौचालय में फांसी लगाकर दी जान, परिवार का आरोप

  • शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने नहीं हटवाया अवैध कब्जा
  • वाराणसी में इंसानियत और व्यवस्था पर गंभीर सवाल

वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाली एक बेहद गंभीर घटना सामने आई है। बड़ागांव थाना क्षेत्र के  अहरक गांव  में रास्ते के विवाद से कथित तौर पर परेशान एक अधेड़ महिला  कविता उपाध्याय  ने शौचालय में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। घटना के बाद परिवार ने स्थानीय पुलिस और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
परिजनों का आरोप है कि घर के सामने मौजूद करीब छह फीट चौड़ी सरकारी जमीन पर कथित अवैध कब्जे को लेकर परिवार पिछले करीब दो वर्षों से अधिकारियों के यहां शिकायत करता रहा, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। परिवार का दावा है कि आखिरी शिकायत  22 जुलाई 2026  को जिलाधिकारी की जनसुनवाई में की गई थी। इसके बाद राजस्व विभाग की रिपोर्ट को लेकर भी परिजनों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।नोटिस और नापी के कथित कब्जा हट नही पाया।

पीड़ित परिवार की ओर से सामने आई

जानकारी के मुताबिक, कथित अवैध कब्जा हटाने के लिए कई बार नोटिस लगाए गए थे। इसके बाद लेखपाल ने मौके पर पहुंचकर जमीन की नापी भी की।
परिजनों का कहना है कि नापी के दौरान कुछ स्थानों पर सरकारी भूमि यानी नवीन परती जमीन होने की बात सामने आई और वहां निशान भी लगाए गए। आरोप है कि संबंधित लोगों को कथित अवैध निर्माण हटाने के लिए कहा गया, लेकिन इसके बावजूद आगे कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

यही वह बिंदु है जहां अब प्रशासन से सबसे बड़ा सवाल पूछा जा रहा है—

यदि जमीन सरकारी थी और उसकी नापी के बाद निशान भी लगाए गए थे, तो कथित अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हुई?

दो साल की शिकायतों के बाद भी नहीं मिला समाधान

परिजनों के अनुसार, रास्ते को लेकर विवाद कोई नया नहीं था। परिवार लंबे समय से अधिकारियों से शिकायत कर रहा था। उनका आरोप है कि बार-बार शिकायत और अधिकारियों के संज्ञान में मामला आने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया।22 जुलाई को जिलाधिकारी की जनसुनवाई में शिकायत किए जाने का दावा भी परिवार की ओर से किया गया है। परिजनों के मुताबिक, इसके बाद राजस्व कर्मियों की ओर से शिकायत के निस्तारण संबंधी रिपोर्ट लगाई गई, जिसे परिवार गलत और तथ्यहीन बता रहा है।
यदि शिकायत के निस्तारण में वास्तव में गलत रिपोर्ट लगाई गई है तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का मामला हो सकता है। हालांकि, रिपोर्ट की वास्तविकता और उसमें दर्ज तथ्यों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

विवाद बढ़ा तो पुलिस के सामने मारपीट का आरोप

मृतका की परिजन  दीक्षा उपाध्याय  ने आरोप लगाया कि रास्ते के विवाद को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले भी तनाव और मारपीट की स्थिति बन चुकी थी।

दीक्षा के मुताबिक, एक घटना के दौरान पुलिस की मौजूदगी में उनके पति का गला पकड़ने का आरोप लगाया गया। उनका कहना है कि स्थिति बिगड़ने पर पुलिस कुछ लोगों को थाने भी ले गई थी।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उनके परिवार के साथ मारपीट की गई और इस दौरान वह स्वयं भी घायल हुईं। उनका दावा है कि विवाद के दौरान मृतका के देवर का भी गला दबाने का प्रयास किया गया।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में पुलिस की जांच और संबंधित पक्षों के बयान से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

महिला की मौत के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित

कविता उपाध्याय की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या रास्ते का विवाद समय रहते प्रशासनिक स्तर पर सुलझाया जा सकता था?

क्या सरकारी भूमि पर कथित कब्जे की शिकायत की निष्पक्ष जांच हुई?

क्या राजस्व विभाग की रिपोर्ट सही थी?

क्या पुलिस ने विवाद की गंभीरता को समझते हुए दोनों पक्षों के बीच स्थायी समाधान कराने का प्रयास किया? और सबसे अहम  क्या एक परिवार को अपने ही घर तक पहुंचने के रास्ते के लिए इतना लंबा संघर्ष करना पड़ना चाहिए कि मामला एक महिला की मौत तक पहुंच जाए?

अब जांच और जवाबदेही की जरूरत

महिला की मौत के बाद शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। परिवार के आरोपों की निष्पक्ष जांच के साथ-साथ भूमि संबंधी दस्तावेज, राजस्व अभिलेख, पूर्व शिकायतें, मौके की नापी और कथित कब्जे से जुड़े रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।

यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं यदि परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई तथ्य गलत पाया जाता है, तो प्रशासन को उसे भी स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए।

एक महिला की जान चली गई, लेकिन सवाल अभी जिंदा हैं।

वाराणसी जैसे शहर में जहां शासन-प्रशासन आम नागरिक को न्याय और सुरक्षा का भरोसा देता है, वहां एक रास्ते के विवाद का इतना गंभीर रूप लेना पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

अब देखना यह होगा कि कविता उपाध्याय की मौत के बाद प्रशासन जागता है या परिवार की वर्षों पुरानी शिकायतें भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के बड़ागांव थाना क्षेत्र से सामने आई एक घटना ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अहरक गांव निवासी कविता उपाध्याय ने कथित तौर पर रास्ते के विवाद से परेशान होकर  27 अगस्त 2026  को फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। परिवार का आरोप है कि जिस समस्या को लेकर वे लंबे समय से अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे, उसका समय रहते समाधान नहीं किया गया। सबसे गंभीर बात यह सामने आ रही है कि  परिवार ने करीब एक साल पहले ही प्रशासन को आगाह कर दिया था कि यदि उनके घर तक आने-जाने का रास्ता नहीं मिला तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। परिवार का दावा है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद रास्ते से संबंधित विवाद का स्थायी समाधान नहीं हुआ और आखिरकार 27 अगस्त को कविता उपाध्याय की मौत ने पूरे मामले को कटघरे में खड़ा कर दिया। एक साल पहले दी गई चेतावनी क्या अनसुनी रह गई?परिवार के मुताबिक, उनके घर के सामने करीब छह फीट चौड़ी सरकारी जमीन पर पड़ोसियों द्वारा कथित कब्जे को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। उनका कहना है कि रास्ते को लेकर कई बार अधिकारियों को शिकायत दी गई और कथित अवैध कब्जा हटाने के लिए नोटिस भी लगाए गए परिजनों के अनुसार, राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर जमीन की नापी भी की थी। परिवार का दावा है कि नापी के दौरान कुछ हिस्सों में सरकारी भूमि होने की बात सामने आई और निशान भी लगाए गए। इसके बावजूद कथित कब्जा हटाने की प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

जिला प्रशासन व बड़ागांव पुलिस की भूमिका नगण्य रही

अब सवाल यह है कि  जब परिवार पहले ही अपनी परेशानी और संभावित गंभीर परिणामों को लेकर प्रशासन को आगाह कर चुका था, तो आखिर उस शिकायत को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?
27 अगस्त को चली गई एक जिंदगी परिवार का कहना है कि लगातार विवाद, तनाव और रास्ते की समस्या से कविता उपाध्याय बेहद परेशान थीं।  27 अगस्त 2026 को उन्होंने कथित तौर पर शौचालय में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
एक महिला की मौत के बाद अब परिवार की वर्षों पुरानी शिकायतें फिर सवाल बनकर सामने खड़ी हैं। क्या प्रशासन ने समय रहते विवाद को सुलझाने की कोशिश की थी? क्या पुलिस और राजस्व विभाग ने शिकायतों को गंभीरता से लिया? और क्या किसी स्तर पर ऐसी स्थिति बनने से रोकने का प्रयास किया गया था?इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं।

मौत के करीब 24 घंटे बाद हुआ अंतिम संस्कार

घटना के बाद शव को लेकर भी परिवार और स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं। परिजनों के अनुसार,  कविता उपाध्याय की मौत के लगभग 24 घंटे बाद अंतिम संस्कार किया गया।
शव का अंतिम संस्कार किन परिस्थितियों में और किस प्रक्रिया के तहत हुआ, इस संबंध में पुलिस और प्रशासन की आधिकारिक जानकारी सामने आना आवश्यक है। ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम, पंचनामा और अन्य कानूनी प्रक्रिया की स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि किसी भी तरह की शंका की गुंजाइश न रहे। मारपीट और पुलिस की मौजूदगी के भी आरोप
मृतका की परिजन  दीक्षा उपाध्याय  ने आरोप लगाया कि रास्ते के विवाद को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले भी तनाव और मारपीट की घटनाएं हुई थीं। उनका दावा है कि एक विवाद के दौरान पुलिस की मौजूदगी में उनके पति के साथ कथित तौर पर मारपीट और गला पकड़ने की घटना हुई।
दीक्षा के मुताबिक, विवाद बढ़ने पर पुलिस कुछ लोगों को थाने भी ले गई थी। उनका यह भी आरोप है कि बाद में उनके परिवार के साथ मारपीट हुई और इस दौरान वह स्वयं भी घायल हुईं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस और दूसरे पक्ष का बयान इस मामले की पूरी तस्वीर सामने लाने के लिए जरूरी है।
एक मौत, लेकिन कई सवाल
कविता उपाध्याय की मौत ने सिर्फ परिवार को नहीं झकझोरा, बल्कि स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं।

वर्षों से चल रहा था रास्ते का विवाद

अगर रास्ते का विवाद वर्षों से चल रहा था, शिकायतें लगातार दी जा रही थीं और राजस्व विभाग ने मौके पर नापी भी की थी, तो विवाद का समाधान क्यों नहीं हुआ? अगर परिवार ने एक साल पहले ही गंभीर परिणाम की चेतावनी दी थी, तो उस चेतावनी पर क्या कार्रवाई की गई? और अगर सरकारी जमीन पर कथित कब्जे की पुष्टि हुई थी, तो कब्जा हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों का जवाब अब सिर्फ परिवार नहीं, बल्कि पूरा गांव और प्रशासन से मांग रहा है। अब निष्पक्ष जांच ही सबसे बड़ा रास्ता इस पूरे मामले में प्रशासन को परिवार की पूर्व शिकायतों, जनसुनवाई में दिए गए प्रार्थना-पत्रों, राजस्व विभाग की रिपोर्ट, मौके की नापी, कथित कब्जे से जुड़े दस्तावेज और पुलिस की पूर्व कार्रवाई की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं यदि परिवार के आरोप तथ्यों से मेल नहीं खाते हैं तो प्रशासन को भी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। *क्योंकि कविता उपाध्याय अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत से जुड़े सवाल अभी भी जिंदा हैं।  एक परिवार का दावा है कि उसने पहले ही चेताया था । “रास्ता नहीं मिला तो जान देनी पड़ेगी।”अब सवाल यह है कि उस चेतावनी को अगर समय रहते गंभीरता से लिया जाता, तो क्या एक जिंदगी बचाई जा सकती थी?

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button