
- फेमा के दीवानी प्रावधानों के कथित उल्लंघन का लगा आरोप
- जेपी समूह के अधिग्रहण में अदानी समूह पर गलत तरीके से बोली जीतने का लग चुका है आरोप
- सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर आमने-सामने हैं वेदांता और अदानी
- छापे को लेकर सोशल मीडिया से लेकर विपक्ष तक ने उठाए सवाल
- छापा खत्म, नहीं मिला ईडी को कुछ भी गलत
नई दिल्ली। कभी पीएम मोदी की जमकर तारीफ करने वाले देश की बड़ी माइनिंग कंपनी वेदांता समूह पर इस माह की पहली तारीख को ईडी, यानी केंद्र सरकार के प्रवर्तन निदेशालय का छापा पड़ गया। छापे की कार्रवाई फेमा के दीवानी प्रावधानों के कथित उल्लंघन को लेकर शुरू की गई है, जिसमें फंड ट्रांसफर और विदेशी लेन-देन से जुड़ी गड़बड़ियां शामिल हैं। यह छापा जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण मामले में बोली जीतने के बाद भी उदानी समूह की जीत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के एक महीने के भीतर की गई। इससे सोशल मीडिया पर यह सवाल खड़े हो गए कि कहीं अदानी समूह ने केंद्र की मोदी सरकार के जरिए तो यह छापा नहीं डलवाया गया ? वेदांता समूह ने 2025 में भाजपा को 97 करोड़ का चंदा दिया था।

छापे को लेकर क्यों उठे सवाल?
मार्च 2026 के अंत में, अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर यह दावा किया था कि वेदांता को दिवालिया हो चुकी कंपनी ‘जयप्रकाश एसोसिएट्स’ के अधिग्रहण की लिखित पुष्टि मिल चुकी थी। वेदांता ने इस बोली को जीत लिया था। हालांकि, बाद में इस फैसले को कथित तौर पर पलट दिया गया और यह डील अडानी समूह के पक्ष में चली गई। इस फैसले से असंतुष्ट होकर वेदांता समूह ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वेदांता ने करीब 14,500 से 16,000 करोड़ रुपए) मूल्य की इन संपत्तियों के लिए अडानी समूह की समाधान योजना पर रोक लगाने की मांग की है। वेदांता का आरोप है कि जयप्रकाश एसोसिएट्स के लेनदारों ने प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं बरती। कंपनी का दावा है कि नेट प्रेजेंट वैल्यू के आधार पर वेदांता की ₹12,505.85 करोड़ की बोली सबसे ऊंची थी, जबकि अडानी समूह की कुल बोली मूल्य के हिसाब से कम थी। इसके बावजूद बैंकों और कर्जदाताओं की समिति ने अडानी की योजना को मंजूरी दे दी क्योंकि अडानी समूह ने तत्काल नकद भुगतान और तेजी से भुगतान की बात कही थी।

छापे में ईडी को कुछ नहीं मिला
ईडी का 1 जून से 3 जून तक चला छापा अब समाप्त हो चुका है और जांच एजेंसी ने कंपनी पर किसी तरह का कोई जुर्माना नहीं लगाया है। साथ ही कंपनी के बिजनेस ऑपरेशंस या कॉर्पोरेट गतिविधियों पर भी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। ईडी की कार्रवाई की खबर सामने आने के बाद निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई थी और शेयर में भी दबाव देखने को मिला था। हालांकि अब कंपनी के स्पष्टीकरण के बाद स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है। प्रवर्तन निदेशालय की यह कार्रवाई वेदांता लिमिटेड द्वारा अपनी ब्रिटेन स्थित मूल कंपनी वेदांता रिसोर्सेज को किए गए कुछ भुगतान थे। जांच एजेंसी यह समझने की कोशिश कर रही है कि ब्रांड फीस और रॉयल्टी के तौर पर किए गए भुगतान सभी नियामकीय नियमों के अनुरूप थे या नहीं। इसी सिलसिले में दिल्ली, मुंबई और उदयपुर समेत कई स्थानों पर दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की गई। अब जबकि छापे में ईडी को ऐसा कुछ मिला नहीं है, जिससे वेदांता के खिलाफ कार्रवाई की जा सके, यह सवाल और भी मौजूं हो गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट में अदानी को चुनौती देने के बदले में सरकार ने कंपनी पर ईडी से छापा डलवाया? जाहिर तौर पर छापे को लेकर ईडी के पास सूचना कम थी या केवल शक के आधार पर उसने यह छापा डाला। हालांकि, यह तो तय है कि इस छापे से भाजपा और केंद्र सरकार की समर्थक रहे वेदांता ग्रुप की छवि खराब हुई और उसे आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।
कंपनी ने क्या कहा ?
बाजार में सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कहीं ईडी की कार्रवाई का असर वेदांता के डीमर्जर प्लान पर न पड़ जाए। कंपनी ने साफ कर दिया है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है और डीमर्जर की प्रक्रिया पहले की तरह आगे बढ़ रही है। वेदांता अपने कारोबार को पांच अलग-अलग सूचीबद्ध कंपनियों में बांटने की तैयारी कर रही है। इस योजना के तहत एल्युमिनियम, ऑयल एंड गैस, पावर, स्टील और बेस मेटल्स कारोबार को अलग-अलग संस्थाओं के रूप में विकसित किया जाएगा। कंपनी को इस प्रक्रिया के लिए पहले ही कई जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं। हालांकि ईडी की जांच पूरी तरह बंद नहीं हुई है और नियामकीय प्रक्रिया जारी रहेगी, इसलिए निवेशकों की नजर आगे आने वाले आधिकारिक अपडेट्स पर बनी रहेगी। 4 जून को कंपनी के शेयर एनएसई पर 0.21 फीसदी टूटकर 327.50 रुपये पर बंद हुए।

बिहार से है तगड़ा कनेक्शन
वेदांता ग्रुप देश में सबसे बड़ा नेचुरल रिसोर्सेज कंपनी है। कंपनी जिंक, चांदी, ऑयल एंड गैस, एल्युमीनियम, आयरन ओर, स्टील और कॉपर की माइनिंग करती है। इसकी सहयोगी कंपनियों में हिंदुस्तान जिंक और केयर्न ऑयल एंड गैस शामिल है। अनिल अग्रवाल का जन्म बिहार के एक मारवाड़ी परिवार में हुआ था और उन्हें बिहार का सबसे बड़ा रईस माना जाता है। उन्होंने 20 साल की उम्र में ही बिहार छोड़ दिया था और खाली हाथ मुंबई आ गए थे। उनके पास उस समय केवल एक टिफिन बॉक्स था। मुंबई आकर उन्होंने जमकर मेहनत की। साल 1970 में उन्होंने कबाड़ के धंधे से अपने कारोबारी करियर की शुरुआत की। उन्होंने अपनी पहली कंपनी की स्थापना की, जिससे उन्हें अच्छी-खासी कमाई हुई। कंपनी के करीब 64 हजार कर्मचारी और कॉन्ट्रैक्टर्स हैं। मुख्य रूप से यह कंपनी भारत, अफ्रीका, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया में है। दुनियाभर में कंपनी के प्रोडक्ट्स बिकते हैं। फोर्ब्स के मुताबिक अनिल अग्रवाल की नेटवर्थ करीब 4.9 अरब डॉलर यानी करीब 47,000 करोड़ रुपये है और वह भारत के टॉप 100 अमीरों में शामिल हैं। वेदांता का मार्केट कैप करीब 1,30,724.27 करोड़ रुपये है।
कांग्रेस ने उठाया सवाल
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने ईडी की कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जेपी एसोसिएट्स मामले में अदालत जाने और अडानी समूह को चुनौती देने के कुछ ही दिनों बाद वेदांता पर छापेमारी होना कई सवाल खड़े करता है। सरकार या जांच एजेंसियों की ओर से अब तक ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है जो ईडी की कार्रवाई को जेपी एसोसिएट्स विवाद से जोड़ता हो। ऐसे में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध है या यह महज समय का संयोग है।




