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डोनाल्ड ट्रम्प अपनी हरकतों से नही आ रहे बाज,भारत की अर्थव्यवस्था पर गिरा रहे गाज

ट्रंप का टैरिफ, मोदी का संतुलन डगमगाया भारत के उद्योगों पर आर्थिक बमबारी

हर्षितेश्वर मणि तिवारी

वाराणसी। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद अमेरिका ने अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के नाम पर जो टैरिफ हथौड़ा चलाया है, उसने भारत की एक्सपोर्ट मशीनरी की रीढ़ हिला दी है। कपड़ा से लेकर कोडिंग तक, और हीरे से लेकर हब-कैप तक हर सेक्टर में नौकरियों की गिलोटिन लटक गई है। भारत की मोदी सरकार के लिए यह सिर्फ व्यापारिक संकट नहीं, बल्कि राजनीतिक सिरदर्द भी है, क्योंकि इसका असर सीधे लाखों परिवारों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और चुनावी गणित तक पहुंचेगा।

टैरिफ का ट्रंप कार्ड अमेरिका का आर्थिक राष्ट्रवाद

ट्रंप प्रशासन ने भारत, चीन, वियतनाम सहित कई एशियाई देशों के उत्पादों पर औसतन 40-50 फीसदी तक टैरिफ बढ़ा दिया है।
आधिकारिक तर्क है कि अमेरिकी नौकरियां बचाना और घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देना है। विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भर अमेरिकी कंपनियां अब मैक्सिको, ब्राजील, तुर्की, थाईलैंड की ओर मुड़ रही हैं। यह वही नीति है जिसने पहले भी ‘मेक इन अमेरिका’ के नाम पर आईटी आउटसोर्सिंग और मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स पर रोक लगाई थी।

टेक्सटाइल सेक्टर करघों से बेरोजगारी की बुनाई

भारत हर साल अमेरिका को 8.2 बिलियन डॉलर का टेक्सटाइल निर्यात करता है। टैरिफ के बाद अमेरिकी आयातक अब वियतनाम, मैक्सिको और बांग्लादेश की ओर रुख कर रहे हैं।
* 10 फीसदी निर्यात घटने पर 1.2 लाख मजदूरों की नौकरी पर खतरा
* पावरलूम सेक्टर में तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, भिवंडी में ऑर्डर 15-20 फीसदी तक घटने के संकेत
* मजदूरों की पाली कम, ओवरटाइम खत्म, कई जगह मजदूरी बकाया

कम ऑर्डर, कम उत्पादन, ज्यादा बेरोजगारी

भारत का टेक्सटाइल सेक्टर अमेरिका को हर साल 8.2 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है।
अब टैरिफ बढ़ने के कारण अमेरिकी आयातक कंपनियाँ भारतीय जैकेट्स, टी-शर्ट्स और होजरी की जगह वियतनाम या मैक्सिको की तरफ झुक रही है। आकलन करे अगर इसका तो हर 10 फीसदी एक्सपोर्ट घटने पर लगभग 1.2 लाख मजदूरों की नौकरी खतरे में पड़ती है।

75,000 नौकरियां प्रभावित

भारत की 150 बिलियन डॉलर की आईटी इंडस्ट्री में से एक बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है। अमेरिकी कंपनियां भारतीय इंजीनियरों को प्रोजेक्ट देती थीं क्योंकि यहां लागत कम थी। अब टैरिफ और पॉलिटिकल दबाव के चलते अमेरिका में ‘मेक इन अमेरिका’ पर जोर है। अमेरिका की फिनटेक कंपनी ने हाल ही में बेंगलुरु स्थित ऑफिस से 600 में से 150 इंजीनियरों को निकाला, क्योंकि उनका प्रोजेक्ट फ्रीज कर दिया गया। इसका आंकलन लगाए तो अगर आईटी एक्सपोर्ट में 5 फीसदी की गिरावट आई है, जिससे लगभग 50,000 से 75,000 नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।

ज्वेलरी और डायमंड

भारत के गुजरात का सूरत शहर अमेरिका को हीरा और ज्वेलरी निर्यात करता है। 2023 में भारत ने अमेरिका को 11 बिलियन डॉलर की ज्वेलरी भेजी। अब टैरिफ के बाद अमेरिका की रिटेल कंपनियां थाईलैंड और तुर्की से सस्ते विकल्प तलाश रही हैं। इसके परिणाम यह होंगे कि सूरत के लगभग 50,000 डायमंड वर्कर्स इस साल तक आंशिक बेरोजगारी में जा चुके हैं।

ऑटो पार्ट्स और स्मॉल मैन्युफैक्चरिंग

भारत से अमेरिका को ऑटोमोटिव पार्ट्स का 1.8 बिलियन डॉलर का निर्यात होता है। अब अमेरिकी कंपनियां मेक्सिको और ब्राजील से खरीद पर विचार कर रही हैं। इससे गुड़गांव, चेन्नई, पुणे जैसे औद्योगिक शहरों के छोटे और मध्यम उद्यमों पर चोट पड़ी है। आंकलन करे तो यहां भी वही बेरोजगारी का आलम है।

मदद किसे मिल रही

अमेरिका का यह कदम उसके अपने कारखानों, श्रमिक यूनियनों और स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स को फायदा पहुंचा रहा है। लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए ये कदम ‘अप्रत्यक्ष आर्थिक हमले’ के बराबर हैं। टैरिफ से सिर्फ माल नहीं रुकता। एक पूरी सप्लाई चेन लड़खड़ा जाती है।

* मजदूर को फैक्ट्री में शिफ्ट कम हो रही है, ओवरटाइम बंद, और काम से छुट्टी।
* इंजीनियर को प्रोजेक्ट फ्रीज, कॉन्ट्रैक्ट खत्म
* छोटे व्यापारी को सप्लाई बंद, ऑर्डर कैंसिल
* लोगों की तनख्वाह नहीं मिलेगी तो खरीदारी कम होगी
* डिमांड कम होने से मैन्युफैक्चरिंग नीचे जायेगा

क्या कर रही है सरकार?

सरकार अब तक जवाबी टैरिफ लगाने या विश्व व्यापार संगठन में केस दर्ज करने की बातें कर रही है, लेकिन भारत की सामरिक और कूटनीतिक स्थिति अमेरिका के सामने बहुत सीमित है। अगर हम टेक्सटाइल, आईटी, ज्वेलरी या एक्सपोर्ट आधारित किसी भी सेक्टर में काम कर रहे हैं, तो ये समझ लेना चाहिए कि नौकरी की सुरक्षा एक सिर्फ भ्रम है।

व्हाइट हाउस से आई आर्थिक गरज

बुनाई बस्ती में दोपहर का सन्नाटा असामान्य है। गलियों में करघों की लयबद्ध आवाज की जगह अब मशीनें चुप पड़ी हैं। मोहम्मद शमी जो 22 साल से पावरलूम चला रहे हैं उनका कहना है कि पहले अमेरिका वाले ऑर्डर साल भर काम देते थे। अब मालिक बोल रहा है, आधी मशीनें बंद करनी पड़ेंगी। इस अचानक आई आफत का नाम है ट्रंप टैरिफ पॉलिसी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में वापसी के बाद, अमेरिका फर्स्ट को सिर्फ नारे में नहीं, बल्कि व्यापार नीति के हर पन्ने में उकेर दिया है।

* नया फैसला एशियाई देशों से आने वाले उत्पादों पर 40 से 50 फीसदी तक आयात शुल्क।
* अमेरिकी फैक्ट्रियों को जिंदा करना, स्थानीय नौकरियां बचाना।

यह कदम एक साथ चीन, भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे देशों को हिला देता है।
भारत के लिए झटका इसलिए और बड़ा है। टेक्सटाइल, आईटी, हीरा-ज्वेलरी और ऑटो पार्ट्स में अमेरिका सबसे बड़े निर्यात बाजार में से एक है। अर्थशास्त्री इसे आर्थिक बमबारी कहते हैं। जहां टैंक और मिसाइल नहीं, टैरिफ और कोटा काम करते हैं। असर भी वैसा ही फैक्ट्रियां ठंडी, नौकरियां खत्म, और बाजार सिकुड़ते।

टेक्सटाइल का सूत उलझा कारखाने सूने

तिरुपुर की सुबह अब वैसी नहीं। जहां पहले ट्रकों में कपड़े लदते थे, वहां आज गिनती के ऑर्डर हैं। लुधियाना के बलविंदर सिंह, जो 200 मशीनों के मालिक हैं, बताते हैं अमेरिका से आए मेल में लिखा था। नई डील रोक दी जाए क्योंकि टैरिफ के बाद कीमत दोगुनी हो जाएगी। टैरिफ की मार सिर्फ कारखानों तक नहीं। धागा बनाने वाले मिल, डाईंग यूनिट्स, ट्रांसपोर्टर, और यहां तक कि चाय की दुकानों तक इसका असर दिखने लगा है। भिवंडी के एक मजदूर का कहना है कि पहले ओवरटाइम से बच्चों की फीस निकलती थी, अब आधा वेतन भी नहीं मिल रहा।

आईटी सेक्टर की कोड-क्राइसिस, सिलिकॉन वैली से व्हाइटफील्ड तक

आईटी इंडस्ट्री को झटका कम दिखता है, लेकिन असर गहरा है। बेंगलुरु की इंजीनियर नेहा जो पांच साल से एक अमेरिकी बैंक के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी का कहना है कि एक मेल आया कि प्रोजेक्ट खत्म हो गया है, कंपनी अब अमेरिका में ही टीम बना रही है।

* आईटी एक्सपोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी 60 फीसदी
* 5 फीसदी गिरावट 50 हजार से 75 हजार नौकरियां खतरे में
* ट्रंप प्रशासन का तर्क अमेरिकी कॉलेज से निकलने वाले इंजीनियर बेरोजगार, तो आउटसोर्सिंग क्यों
* कंपनियां अब वर्क-विजा कम दे रही हैं,
* बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे में प्रोजेक्ट बेंच की लिस्ट लंबी हो रही

सूरत की खामोश गलियां, हीरा-ज्वेलरी की चमक फीकी

सूरत के वराछा में सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक हीरा पॉलिशिंग यूनिट्स में चहल-पहल रहती थी। आज कई यूनिट्स में ताले लटके हैं।
टैरिफ के बाद अमेरिकी ज्वेलरी चेन अब थाईलैंड और तुर्की की तरफ मुड़ गई हैं। 2023 में अमेरिका को निर्यात 11 बिलियन डॉलर का होता था।

आंशिक बेरोजगारी 50 हजार से ज्यादा कर्मचारी

रमेश का कहना है कि पहले महीने में 25–30 हजार कमा लेते थे, अब 12 हजार भी कमाना मुश्किल हो गया है। सोने-चांदी के व्यापारी, पैकेजिंग कंपनियां, यहां तक कि छोटे ढाबे सब पर इसका असर पड़ा है।

गियर की जगह ठहराव, ऑटो पार्ट्स इंडस्ट्रियल बेल्ट में सन्नाटा

गुड़गांव, मानेसर, पुणे, चन्नई जहां कार के पुर्जे बनते थे, वहां अब उत्पादन घटा है। मानेसर के एसएमई मालिक अरविंद यादव कहते हैं अमेरिका के लिए बनाए पुर्जे अब गोदाम में धूल खा रहे हैं। इस मंदी का असर स्टील, टायर, बैटरी, और छोटे वेंडर्स पर भी पड़ रहा है।

मजदूर से बाजार तक आय की गिरावट, मांग का पतन

* जब मजदूर की जेब खाली, तो बाजार भी सूना।
* टेक्सटाइल का मजदूर कपड़े नहीं खरीदता
* आईटी इंजीनियर बाहर खाने से बचता
* ज्वेलरी कारीगर त्योहार पर खरीद टाल देता
* सरकार और कूटनीति की सीमाएं अमेरिका से उलझने की मुश्किल

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