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मोदी जी ने कार्यपालिका,व्यवस्थापिका,व मीडिया का कर दिया सत्यानाश,न्यायपालिका से बची है आस,न्याय की भी उखड़ रही है साँस

जस्टिस दिपांकर दत्ता, सावरकर विवाद और लोकतंत्र का मौन संकट

∼  प्रियंका गांधी का तीखा वार बयान जो सुर्खियों में छा गया

∼  जस्टिस दिपांकर दत्ता और राहुल गांधी पर ‘लगातार’ टिप्पणी का सिलसिला

∼  सावरकर स्वतंत्रता सेनानी या विभाजन सिद्धांत के जन्मदाता?

∼  न्यायपालिका में वंशवाद अदालत के गलियारों में ‘परिवार’ की ताकत

∼  परीक्षा बनाम सेटिंग जनता और न्यायपालिका के बीच का भेदभाव

∼  लोकतंत्र का असंतुलन: जजों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

∼  राजनीति और न्यायपालिका की खतरनाक नजदीकियां

∼  संविधान की कसौटी पर न्यायपालिका की पारदर्शिता

पँचशील अमित मौर्या

हमारे महामानव नानबायोजिकल प्रातः स्मरणीय बात बात पर झूठ बोलने वाले श्री श्री 1008 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जब से सत्ता में आये है। लोकतंत्र के चारो स्तम्भ का सत्यानाश कर दिया है।कार्यपालिका,व्यवस्थापिका ,व प्रेस की स्वतंत्रता का इन्होंने चीरहरण कर दिया है एक न्यायपालिका बची थी उसका भी ये लोग बर्बाद करना चाहते है जस्टिस लोया की हत्या के बाद तो जजों में जान का डर बैठ गया है।आये दिन न्यायालय से ऐसे ऐसे टिप्पणी व निर्णय आते है जिससे साफ साफ ये प्रतीत होता है कि मोदी सरकार के चंगुल में न्याय दम तोड़ रहा है।ताजा मामला राहुल गांधी से जुड़ा है इस पर प्रियंका गांधी का जस्टिस दिपांकर दत्ता पर सीधा और तीखा हमला सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक गूंज रहा है। वजह सुप्रीम कोर्ट के इस न्यायाधीश का राहुल गांधी पर दोहराया गया निशाना, खासतौर पर सावरकर के मुद्दे पर। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि एक जज का सार्वजनिक बयान किस हद तक उचित है, बल्कि यह भी कि देश की न्यायपालिका के शीर्ष पर पहुंचने के रास्ते में किसका ‘मेहनत’ है और किसकी ‘विरासत’। यह बहस अब व्यक्तिगत टिप्पणी से कहीं आगे निकलकर न्यायपालिका के भीतर मौजूद वंशवाद, पारिवारिक नेटवर्क और जवाबदेही के सवालों पर केंद्रित हो गई है।

जस्टिस दिपांकर दत्ता का राहुल गांधी पर ‘लगातार’ टिप्पणी का सिलसिला

यह पहला मौका नहीं था जब जस्टिस दत्ता ने राहुल गांधी पर टिप्पणी की हो। इससे पहले भी उन्होंने राहुल गांधी की सावरकर पर की गई टिप्पणियों को ‘गैर-जिम्मेदाराना’ करार देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि भविष्य में इस तरह के बयान दिए गए तो अदालत स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा था महाराष्ट्र में सावरकर की पूजा की जाती है, आप स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते। यह बयान खुद में राजनीतिक रंग लिए हुए था, क्योंकि यह सावरकर की विरासत पर भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही वैचारिक जंग का हिस्सा बन गया। सवाल उठता है कि क्या एक सुप्रीम कोर्ट का जज इस तरह के मुद्दों पर सार्वजनिक बयान देकर अपनी निष्पक्षता पर सवाल उठाने का जोखिम उठा सकता है?

सावरकर स्वतंत्रता सेनानी या विभाजन सिद्धांत के जन्मदाता ?

सावरकर का नाम भारतीय राजनीति में हमेशा विवादों में रहा है। एक ओर भाजपा उन्हें वीरता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानती है, वहीं दूसरी ओर इतिहास के कई पन्ने बताते हैं कि उन्होंने द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत सबसे पहले रखा था। वह भी मोहम्मद अली जिन्ना से पहले। यही नहीं, जेल से रिहाई के लिए ब्रिटिश सरकार को कई माफीनामे लिखने और जीवनभर ब्रिटिश हुकूमत की पेंशन लेने के आरोप भी इतिहास में दर्ज हैं। फिर भी, उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहकर महिमामंडित करना और उनके खिलाफ आलोचना करने वालों को चेतावनी देना लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करता है। सावरकर कौन थे उसकी आलोचना करना क्या ‘अदालत’ की निगरानी के दायरे में आना चाहिए।

न्यायपालिका में वंशवाद अदालत के गलियारों में ‘परिवार’ की ताकत

जस्टिस दिपांकर दत्ता का पारिवारिक बैकग्राउंड न्यायपालिका में वंशवाद के आरोपों को हवा देता है। उनके पिता स्वर्गीय सलिल कुमार दत्ता कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे, जबकि उनके बहनोई जस्टिस अमिताव रॉय भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं। भारत में जज बनने का रास्ता आमतौर पर ‘सीधे भर्ती’ से कम और ‘नेटवर्क’ से ज्यादा तय होता है। यह स्थिति आम प्रशासनिक सेवाओं से बिल्कुल अलग है, जहां किसी पद के लिए कठोर प्रतिस्पर्धी परीक्षा देनी पड़ती है।

परीक्षा बनाम सेटिंग जनता और न्यायपालिका के बीच का भेदभाव

यह देश का दुर्भाग्य है कि एक चपरासी बनने के लिए भी परीक्षा पास करनी होती है, पंचायत का सदस्य बनने के लिए जनता का समर्थन जुटाना पड़ता है, और मजिस्ट्रेट बनने के लिए यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के लिए अक्सर ‘परिवारिक पृष्ठभूमि’ और ‘बार एसोसिएशन की राजनीति’ अहम भूमिका निभाती है। इससे न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर होता है, क्योंकि जनता को लगता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले वही लोग हैं जिनके परिवार पहले से इस व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं।

लोकतंत्र का असंतुलन जजों की जवाबदेही कौन तय करेगा

न्यायपालिका को संविधान में सर्वोच्च स्थान दिया गया है, लेकिन जवाबदेही के मामले में यह सबसे कम पारदर्शी संस्थाओं में से एक है। जजों की नियुक्ति कोलेजियम सिस्टम से होती है, जिसमें खुद जज ही तय करते हैं कि अगला जज कौन बनेगा। इसमें जनता की कोई भागीदारी नहीं है और न ही संसद की निर्णायक भूमिका। इस व्यवस्था के चलते, अगर किसी जज पर पक्षपात या अनुचित बयानबाजी के आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच भी उसी सिस्टम के भीतर होती है, जहां पारदर्शिता का अभाव है।

राजनीति और न्यायपालिका की खतरनाक नजदीकियां

जस्टिस दत्ता का बयान और सावरकर पर उनका पक्ष यह संकेत देता है कि राजनीति और न्यायपालिका के बीच की दूरी तेजी से घट रही है। ऐसे बयान न सिर्फ न्यायपालिका की निष्पक्षता पर दाग लगाते हैं, बल्कि न्याय के प्रति जनता का भरोसा भी कमजोर करते हैं। राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करना एक जज के लिए वैसा ही है जैसे किसी रेफरी का मैच के बीच में किसी टीम के पक्ष में बोलना। इससे खेल की निष्पक्षता खत्म हो जाती है।

संविधान की कसौटी पर न्यायपालिका की पारदर्शिता

संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका को स्वतंत्र रखने के लिए कई सुरक्षा दीं, लेकिन उनका मकसद इसे ‘जवाबदेही से मुक्त’ बनाना नहीं था। आज जरूरत है कि जजों की नियुक्ति और उनके आचरण की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र, पारदर्शी और जनता के प्रति जवाबदेह व्यवस्था बनाई जाए। जब तक न्यायपालिका में वंशवाद, पारिवारिक नेटवर्क और राजनीतिक झुकाव जैसी समस्याएं खत्म नहीं होतीं, तब तक लोकतंत्र में संतुलन बनाना मुश्किल होगा।

* प्रियंका गांधी का सीधा वार जस्टिस दिपांकर दत्ता की राजनीतिक रंग लिए टिप्पणियों पर सवाल, न्यायपालिका की निष्पक्षता पर चोट

* जस्टिस दत्ता का राहुल गांधी पर बार-बार सार्वजनिक टिप्पणी करना, खासकर सावरकर विवाद में

* सावरकर की विरासत पर विवाद स्वतंत्रता सेनानी बनाम विभाजन सिद्धांत के जन्मदाता, राजनीतिक विमर्श में सीमाएं और अदालत की चेतावनी।

* जस्टिस दत्ता का न्यायिक परिवार से आना; पिता और बहनोई दोनों हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट जज रहे

* परीक्षा बनाम सेटिंग अन्य पदों के लिए कठोर परीक्षाएं, लेकिन न्यायपालिका में परिवारिक नेटवर्क और बार राजनीति का दबदबा

* कोलेजियम सिस्टम में जज ही जजों की नियुक्ति तय करते हैं, जनता और संसद की भागीदारी नहीं

* राजनीति न्यायपालिका नजदीकी का खतरा राजनीतिक मुद्दों पर जजों के बयान से जनता का भरोसा कमजोर

* संविधान और पारदर्शिता स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही से मुक्ति नहीं; नियुक्ति और आचरण की समीक्षा के लिए पारदर्शी सिस्टम की जरूरत

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