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फकीर नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर शाही इंतजाम,जनता के करोड़ो रूपये का काम तमाम

मोदी के जन्मदिन पर दीयों की कतार, लोकतंत्र के सवालों पर अंधेरा!

  • 76 की उम्र में भी सत्ता का मोह? ‘मार्गदर्शक मंडल’ की पुरानी परिपाटी भूली भाजपा
  • ‘आशीर्वाद के दीये’ से सरकारी आयोजनों तक, जन्मदिन बना सत्ता के शक्ति-प्रदर्शन का मंच
  • 76 की उम्र में भी सत्ता का मोह, 75 की परिपाटी का पैमाना मोदी पर क्यों नहीं?
  • बाढ़, हिंसा और हादसों के बीच जश्न की रोशनी, क्या यही है संवेदनशील शासन की तस्वीर?
  • दीये जलते रहें, सवाल न बुझें लोकतंत्र की असली रोशनी जवाबदेही और अभिव्यक्ति की आजादी में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को 76 वर्ष के हो गए। उनके जन्मदिन पर भाजपा ने देशभर में महीने भर चलने वाले ‘सेवा संकल्प अभियान’ की शुरुआत की। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने लोगों से प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर घरों में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील की। हरियाणा सरकार ने भी इस अपील को सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाया, जबकि दिल्ली सरकार ने 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक सेवा-संकल्प अभियान चलाने की घोषणा की। यहीं से सवाल भी खड़ा होता है क्या किसी प्रधानमंत्री का जन्मदिन अब व्यक्तिगत अवसर है या उसे सरकारी और राजनीतिक आयोजनों के जरिए राष्ट्रीय उत्सव का रूप दिया जा रहा है? भाजपा के पक्ष में इसे सेवा, जनभागीदारी और प्रधानमंत्री के 25 वर्ष के सार्वजनिक जीवन के सम्मान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दूसरी ओर आलोचकों का सवाल है कि जब देश के कई हिस्से बाढ़, विस्थापन, हादसों और सामाजिक संकटों से जूझ रहे हों, तब सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा जन्मदिन को इतने बड़े सार्वजनिक अभियान में बदलना लोकतांत्रिक मर्यादाओं की कसौटी पर कैसे देखा जाए।
2014 के बाद भाजपा में 75 वर्ष की आयु के बाद सक्रिय सरकारी जिम्मेदारियों से वरिष्ठ नेताओं को अलग रखने की एक अनलिखी परिपाटी चर्चा में रही थी। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं को मोदी मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला और बाद में ‘मार्गदर्शक मंडल’ की व्यवस्था सामने आई। यह कोई स्पष्ट संवैधानिक या वैधानिक नियम नहीं था, बल्कि राजनीतिक संगठन की घोषित-अघोषित कार्यशैली के रूप में देखा गया। ऐसे में मोदी के 76 वर्ष पूरे होने पर सवाल केवल जन्मदिन मनाने का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक कसौटी का भी है जिसे भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं के लिए कभी महत्वपूर्ण माना था।

 

75 की परिपाटी दूसरों के लिए, मोदी के लिए अलग रास्ता? 

राजनीति में नियमों की असली परीक्षा तब होती है जब वही कसौटी अपने और पराये दोनों पर समान रूप से लागू हो। 2014 में भाजपा के भीतर 75 वर्ष की उम्र को लेकर जिस राजनीतिक परिपाटी की चर्चा हुई, उसका सबसे बड़ा असर आडवाणी और जोशी जैसे नेताओं पर पड़ा। उन्हें सत्ता की कार्यकारी भूमिका से बाहर कर संगठन के मार्गदर्शक वर्ग में रखा गया। आज वही पार्टी नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन को एक महीने तक चलने वाले राष्ट्रीय अभियान के रूप में मना रही है। भाजपा का कहना है कि यह अभियान मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने और सेवा-भाव को रेखांकित करने के लिए है। लेकिन आलोचना करने वालों के लिए यही बात दोहरे मापदंड का सवाल बन जाती है। किसी लोकतंत्र में व्यक्ति से बड़ा पद और पद से बड़ा संस्थान होना चाहिए। प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाना किसी भी दल का अधिकार है, लेकिन जब मुख्यमंत्री, मंत्री, सरकारी विभाग, शिक्षण संस्थान और सार्वजनिक संस्थाएं किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के जन्मदिन से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने लगें तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि पार्टी और सरकार की सीमारेखा कितनी स्पष्ट बची है।

‘आशीर्वाद का दीया’ या राजनीतिक व्यक्तिपूजा की नई परिपाटी?

भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने 17 सितंबर को घरों में ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की अपील की थी। पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सफलता की कामना से जोड़ा। हरियाणा सरकार की ओर से भी इसी अभियान को आगे बढ़ाते हुए लोगों से दीया जलाने और प्रधानमंत्री के लिए शुभकामना करने की अपील की गई। दिल्ली सरकार ने तो 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाने की घोषणा की, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों और विकास परियोजनाओं को भी जोड़ा गया। सरकार और भाजपा इसे सेवा कार्यक्रम बता सकते हैं। स्वास्थ्य शिविर, रक्तदान, स्वच्छता और पौधरोपण जैसे कार्यक्रम अपने आप में सार्वजनिक हित के काम हैं। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब इन गतिविधियों की केंद्रीय पहचान किसी निर्वाचित पदाधिकारी के व्यक्तिगत जन्मदिन से जुड़ जाए। प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल के नेता भी हैं और देश के प्रधानमंत्री भी। पार्टी अपने नेता का जन्मदिन मनाए, यह राजनीतिक गतिविधि है। लेकिन सरकारी मशीनरी उसी आयोजन का हिस्सा बने तो नागरिक यह पूछने के हकदार हैं कि सार्वजनिक संसाधनों और राजनीतिक प्रचार के बीच सीमा कहां खिंची है।

काशी से वडनगर तक 500 बाइक, जन्मदिन का राजनीतिक विस्तार

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जन्मदिन समारोह का विस्तार विशेष रूप से दिखाई दिया। काशी से वडनगर तक मोटरसाइकिल यात्रा निकाली गई। रिपोर्टों के अनुसार करीब 500 बाइक इस यात्रा से जुड़ी थीं। यात्रा का उद्देश्य प्रधानमंत्री की जन्मभूमि वडनगर से कर्मभूमि काशी को जोड़ना बताया गया। 17 सितंबर को वाराणसी में भाजपा के कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सहयोगी दलों के नेता भी शामिल हुए। 76 युवा पुजारियों द्वारा विशेष पूजा और गंगा अभिषेक भी कार्यक्रम का हिस्सा रहा।
यात्रा में कितनी राशि खर्च हुई, पेट्रोल का भुगतान किस स्रोत से हुआ, वाहनों की व्यवस्था किसने की और अन्य लॉजिस्टिक खर्च कैसे पूरा हुआ। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सार्वजनिक होना चाहिए, खासकर यदि किसी स्तर पर सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल हुआ हो। यदि पूरा खर्च पार्टी या निजी सहयोग से हुआ है तो उसका विवरण भी सार्वजनिक करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यही पारदर्शिता लोकतंत्र को मजबूत करती है। सवाल पूछना प्रधानमंत्री का विरोध नहीं है। सवालों से बचना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर जरूर करता है।

देश के हिस्से बाढ़ में, दीयों की चमक के बीच दर्द भी दिखाई दे 

इसी समय बिहार भारी बाढ़ से प्रभावित है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 15 जिलों में करीब 49.74 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए हैं। केंद्र की टीम नुकसान का आकलन करने पहुंची है। ऐसे संकट के बीच प्रधानमंत्री का जन्मदिन मनाना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में संवेदनशीलता का सवाल इससे अलग है। सत्ता में बैठे व्यक्ति की प्राथमिकताएं उसके प्रतीकों से भी दिखाई देती हैं। यही कारण है कि विपक्ष या नागरिक समाज यह पूछ सकता है कि क्या जन्मदिन के विशाल राजनीतिक आयोजनों की जगह राहत और पुनर्वास को अधिक प्रमुखता नहीं दी जा सकती थी। बिहार के संकट के बीच भाजपा ने मुख्यमंत्री राहत कोष में 51 लाख रुपये देने की घोषणा की और भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपनी तीन महीने की सांसद वेतन राशि राहत के लिए देने की घोषणा की। इससे तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आता है कि सरकार और राजनीतिक दल राहत कार्यों में योगदान कर रहे हैं। इसलिए पूरी तस्वीर को केवल उत्सव बनाम संकट के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि राजनीतिक उत्सव और मानवीय संकट के बीच संतुलन कितना दिखाई देता है।

मणिपुर के राहत शिविरों की 640 मौतें, बालाघाट के बच्चे और दिल्ली का मलबा

मणिपुर से सामने आई तस्वीर और भी गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई जानकारी के मुताबिक आठ जिलों के राहत शिविरों में 640 मौतें दर्ज की गईं। इनमें 34 मौतों को अप्राकृतिक बताया गया और केवल 20 मामलों में पोस्टमार्टम होने की जानकारी अदालत के सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है कि 640 मौतों को सभी हिंसक मौतें मान लेना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। अदालत के समक्ष रखे आंकड़ों में 34 मौतों को अप्राकृतिक बताया गया है। बाकी मौतों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन राहत शिविरों में इतनी बड़ी संख्या में मौत और संदिग्ध मौतों की जांच को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की चिंता अपने आप में गंभीर सार्वजनिक प्रश्न है। दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी इमारत गिरने की घटना ने भी शहरी सुरक्षा और भवन नियमन पर सवाल खड़े किए। हादसे के बाद दिल्ली में बड़ी संख्या में पीजी भवनों का सर्वे हुआ और कई संपत्तियों पर सीलिंग तथा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
मध्यप्रदेश के बालाघाट में भी आदिवासी बच्चों की मौतों ने स्वास्थ्य, पोषण और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्टों में करीब 30 बच्चों की मौत का उल्लेख है, जबकि सरकारी स्वास्थ्य सर्वे में बड़ी संख्या में बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी सामने आई।

लोकतंत्र में नेता देवता नहीं, जवाबदेह जनप्रतिनिधि

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जन्मदिन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति है। किसी नेता के समर्थक उसके जन्मदिन पर दीये जलाएं, शुभकामनाएं दें या सेवा कार्यक्रम चलाएं। यह राजनीतिक स्वतंत्रता के दायरे में आता है। लेकिन जब किसी नेता की प्रशंसा सरकारी कार्यक्रमों का केंद्रीय तत्व बनने लगे तो सवाल उठना भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है। इतिहास में इसके उदाहरण भी मिलते हैं। 2008 में मुंबई आतंकी हमले के बाद सोनिया गांधी ने अपना जन्मदिन नहीं मनाया था। 2019 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के बीच उन्होंने फिर जन्मदिन नहीं मनाने का फैसला किया। राहुल गांधी ने 2020 में कोविड महामारी और गलवान में सैनिकों की मौत के बीच जन्मदिन समारोह न करने का फैसला किया। 2021 में भी उन्होंने कोविड महामारी के बीच जन्मदिन नहीं मनाया और 2022 में अग्निपथ के खिलाफ युवाओं के विरोध के दौरान कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों से जश्न नहीं मनाने की अपील की। इन उदाहरणों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी नेता का जन्मदिन मनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि सार्वजनिक जीवन में संवेदनशीलता का पैमाना क्या होना चाहिए। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर भाजपा ने जिस पैमाने पर आयोजन किए, वह उनकी राजनीतिक केंद्रीयता को दिखाता है। दिल्ली में सरकारी अभियान, हरियाणा में ‘आशीर्वाद का दीया’, वाराणसी से वडनगर तक बाइक यात्रा और देशभर में सेवा कार्यक्रम इस आयोजन को व्यक्तिगत जन्मदिन से कहीं बड़ा राजनीतिक अभियान बनाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा उत्सव किसी नेता का जन्मदिन नहीं, नागरिक की आवाज होना चाहिए। यदि कोई नागरिक दीया जलाना चाहता है तो वह जलाए। यदि कोई सेवा करना चाहता है तो करे। इन आयोजनों में सरकारी धन कितना लगा, किस विभाग ने कितना खर्च किया, किस प्रक्रिया से खरीद हुई और सरकारी संस्थानों की भागीदारी क्यों हुई तो उसे भी जवाब मिलना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देश में हजारों-लाखों दीये जल सकते हैं। रोशनी अच्छी चीज है। मगर लोकतंत्र में रोशनी केवल दीयों से नहीं आती।

* 76 वर्ष के हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा ने शुरू किया महीने भर का ‘सेवा संकल्प अभियान’
* ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने की भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की अपील
* वाराणसी से वडनगर तक करीब 500 बाइक की यात्रा
* बिहार में करीब 49.74 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए
* मणिपुर के आठ जिलों के राहत शिविरों में 640 मौतों का आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष
* बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों पर स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था सवालों के घेरे में
* सत्य निकेतन हादसे के बाद पीजी भवनों की सुरक्षा पर देशव्यापी बहस

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