मोदी व शाह ने लोकतंत्र का कर दिया बंटाधार सत्ता के अहंकार पर विपक्ष का करारा प्रहार!
सवाल पूछने वालों को हिरासत में लेकर लोकतंत्र नहीं, सत्ता का डर उजागर हो रहा है

- भूमिका: सत्ता की ताकत बनाम संविधान की ताकत
- विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
- शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कानून-व्यवस्था की समस्या बनने से पहले संवाद के जरिए संभालना चाहिए।
- पुलिस कार्रवाई निष्पक्ष, अनुपातिक और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।
- लोकतांत्रिक असहमति को सरकार के खिलाफ अपराध की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज सुनने का धैर्य बचा है? सत्ता का असली इम्तिहान चुनाव जीतने और सरकार चलाने में ही नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने में भी होता है। जब विपक्षी सांसद चुनाव आयोग से मिलने और अपनी शिकायतें रखने की कोशिश करते हैं, तब उनके रास्ते रोकना, उन्हें हिरासत में लेना और विरोध की आवाज को दबाना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इंडिया गठबंधन का चुनाव आयोग तक पहुंचने का प्रयास केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में मोदी-शाह की सरकार को विपक्ष को निशाना बनाने के बजाय उसके सवालों का जवाब देना चाहिए।

1. विपक्ष को रोककर आखिर क्या साबित करना चाहती है सरकार?
लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं, बल्कि व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा होता है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और इंडिया गठबंधन के सांसदों के विरोध प्रदर्शन को लेकर जिस तरह पुलिस कार्रवाई और हिरासत की खबरें सामने आईं, उससे सरकार की लोकतांत्रिक संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
2. राहुल गांधी की हिरासत से खत्म नहीं होगी राजनीतिक लड़ाई
राहुल गांधी लगातार चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और सरकार की जवाबदेही से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं। उनके विरोध के तरीके से किसी को असहमति हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में असहमति का जवाब पुलिसिया दबाव नहीं, राजनीतिक तर्क होना चाहिए।
राहुल गांधी को हिरासत में लेने की कार्रवाई पर उठ रहे सवालों का जवाब केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को देना चाहिए। यदि किसी कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जांच नियमानुसार होनी चाहिए। लेकिन किसी नेता की राजनीतिक पहचान के कारण उसके साथ अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए।
मोदी-शाह के लिए चुनौती यही है कि वे आलोचना को अपनी सत्ता के खिलाफ साजिश मानना छोड़ें। लोकतंत्र में मजबूत नेतृत्व वह नहीं जो विरोधियों को चुप करा दे, बल्कि वह है जो आलोचना के बीच भी अपने फैसलों का बचाव कर सके।
3. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल, जवाबदेही जरूरी
चुनाव आयोग लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने पर उन सवालों का तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब दिया जाना चाहिए। यदि विपक्ष चुनाव आयोग से मिलना चाहता है, तो मुलाकात की प्रक्रिया, समय और नियम स्पष्ट होने चाहिए।
चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग की भूमिका पर उठने वाले सवालों का समाधान टकराव से नहीं, संवाद से निकल सकता है। आयोग का काम केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि जनता के बीच चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना भी है।
यहां केंद्र सरकार की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर संदेह बढ़े, तो सरकार को आरोप लगाने वालों को खारिज करने के बजाय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
4. अनुच्छेद 19: लोकतंत्र में विरोध का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि इन अधिकारों पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं होना चाहिए।
पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और भाजपा सरकार में मंत्री रहे आर.के. सिंह ने भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी का सवाल उठाया है। यह बहस किसी एक दल तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि पुलिस कानून के प्रति जवाबदेह रहेगी या राजनीतिक दबाव के आगे झुकेगी?
– कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
– प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था, दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
– प्रतिबंध आवश्यक हों तो उनका कानूनी आधार स्पष्ट होना चाहिए।
– पुलिस की कार्रवाई की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अमित शाह केंद्रीय गृह मंत्री हैं। इसलिए दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था को लेकर उठने वाले गंभीर सवालों पर जवाबदेही की मांग स्वाभाविक है।
5. भोजन की मेज पर भी बन सकती है राजनीतिक रणनीति
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा विपक्षी सांसदों को भोजन पर आमंत्रित करने को लेकर भाजपा की ओर से किए गए कटाक्ष ने राजनीतिक बहस को एक अलग दिशा देने की कोशिश की। लेकिन राजनीति में भोजन का मेन्यू महत्वपूर्ण है या लोकतांत्रिक रणनीति, यह जनता खुद तय कर सकती है।
विपक्षी नेताओं का एक साथ बैठना, चर्चा करना और साझा कार्यक्रम तय करना संसदीय राजनीति का हिस्सा है। राहुल गांधी ने क्या खाया, किस रेस्तरां में गए या भोजन शाकाहारी था अथवा मांसाहारी—इन मुद्दों पर बहस करने से चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मूल सवालों का समाधान नहीं होगा। देश को राजनीतिक चुटकुलों से ज्यादा संस्थागत जवाबदेही की जरूरत है।
6. एफआईआर और हिरासत से नहीं दबेगी असहमति
प्रदर्शन के बाद नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की खबरों ने राजनीतिक टकराव को और तीखा किया है। किसी भी मामले में आरोपों की जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए। न किसी नेता को कानून से ऊपर रखा जा सकता है और न ही किसी को राजनीतिक विरोध के कारण कानून के अनुचित इस्तेमाल का निशाना बनाया जाना चाहिए।
यदि राहुल गांधी कहते हैं कि उनके खिलाफ दर्ज मामले उनके संघर्ष के तमगे हैं, तो यह राजनीतिक संदेश भी है कि कार्रवाई से उनका विरोध समाप्त होने वाला नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि हर टकराव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।
निष्कर्ष: सत्ता स्थायी नहीं, संविधान सर्वोपरि है
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष को पराजित करने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने की है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता, दिल्ली पुलिस की जवाबदेही और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार जैसे मुद्दों पर सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी बड़ी हो सकती है, गृहमंत्री की ताकत व्यापक हो सकती है, लेकिन संविधान इन दोनों से ऊपर है। जनता ने सरकार को शासन करने का अधिकार दिया है, असहमति को कुचलने का असीमित अधिकार नहीं।
याद रखिए, लोकतंत्र में सवाल पूछना कमजोरी नहीं, नागरिक का अधिकार है। विपक्ष को रोकने से सरकार मजबूत नहीं होती; सरकार तब मजबूत होती है जब वह अपने आलोचकों के सवालों का जवाब देने का साहस दिखाती है।
मोदी-शाह को यह समझना होगा कि सत्ता का स्वाद कितना भी मीठा क्यों न हो, लोकतंत्र की कसौटी पर जवाबदेही से बचना हमेशा महंगा पड़ता है।




