
– मोदी सरकार ने विरोध के बावजूद हसदेव में दी पेड़ काटने की छूट
– अदानी की खदान से निकला कोयला राजस्थान को बिजली देगा
– हसदेव जंगल को कहा जाता है छत्तीसगढ़ का फेफड़ा
– कई दुर्लभ जीवों और हाथियों का घर है हसदेव का जंगल
– एक पेड़ मां के नाम लगाने का कहकर एनडीए सरकार लाखों पेड़ कटवा रही है

नई दिल्ली/रायपुर। एक पेड़ मां के नाम लगाने का नारा देने वाले भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कैबिनेट की बैठक में देश के लोगों को प्रचंड गर्मी से खुद को बचाने और खूब पानी पीने की सलाह दी। लेकिन, उन्होंने यह नहीं बताया कि देश के 75 फीसदी हिस्से में साल-दर-साल बढ़ती गर्मी के पीछे उनकी ही अपनी सरकार की वह नीति है, जिसमें वे अदानी जैसे अपने दोस्तों को माइनिंग के लिए जंगल कटवाने की अनुमति दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की इस हिदायत का जमकर मजाक उड़ाया गया। लोगों ने कहा कि देशवासियों को इस तरह की सलाह देने से पहले पीएम मोदी को खुद अपनी सरकार की ओर देखना चाहिए, जिसकी जंगल उजाड़ने की नीति के कारण ही देश में गर्मी बढ़ रही है।

लोगों ने गलत कुछ भी नहीं कहा
केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में उद्योगपति गौतम अदानी के केंते कोयला खदान के विस्तारीकरण के पहले चरण को मंजूरी दे दी है। कोयला खदान के लिए 1742 एकड़ में फैले घने जंगल को काट दिया जाएगा। इसके लिए 4.48 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी मिल गई है। हसदेव अरण्य को छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहा जाता है। राज्य के सरगुजा जिले में स्थित यह घना जंगल पूरे राज्य को भीषण गर्मी से बचाने के साथ ही ऑक्सीजन देने का भी काम करता है। गौतम अदानी अब इन पांच लाख पेड़ों को काटकर कोयला निकालेंगे, जिसका उपयोग देश के दूसरे कोने में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम बिजली बनाने के लिए करेगा। ऐसे में सोशल मीडिया पर लोगों ने पीएम मोदी के इस वक्तव्य को पाखंड कहकर कुछ भी गलत नहीं किया है, क्योंकि जो काम केंद्र सरकार नहीं कर पा रही है, उसकी नसीहत लोगों को देने का कोई मतलब नहीं है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को हसदेव अरण्य में यह कोल ब्लॉक 2015 में मिला था। छत्तीसगढ़ से कोयला राजस्थान ले जाकर उसे छाबड़ा और सूरतगढ़ के कोयला प्लांट में डंप किया जाएगा। हसदेव से कोयला निकालने का ठेका अदानी के पास है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की सलाहकार समिति ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम की ओर से अदानी को जंगल काटने की अनुमति 8 मई को दे दी गई। केंद्र सरकार ने इसके लिए भूमि के उपयोग को बदलने का आदेश बाकायदा दिया गया है। इसमें कहा गया है कि काटे जाने वाले पांच लाख पेड़ों को छत्तीसगढ़ में कहीं और जगह लगाया जाएगा।
बेतुकी दलीलों से हो गया खेला
केंद्रीय बिजली प्राधिकरण ने 2035-36 तक राजस्थान की बिजली की जरूरतों को बहुत ज्यादा बताते हुए उसे 20,532 मेगावाट से घटाकर 16,561 मेगावाट कर दिया। उसने कहा कि राजस्थान सरकार अपने प्रोजेक्ट के विस्तारीकरण के लिए जितनी बिजली के उत्पादन की मांग कर रही है, वह अतिश्योक्तिपूर्ण है। राजस्थान के दावे से यही लगता है कि वह अपने कुछ और हित पूरे करना चाहती है और लोगों की बिजली की जरूरत की तरफ उसका कोई खास ध्यान नहीं है। इसके बाद प्राधिकरण ने वन भूमि के उपयोग को बदलने के केंद्र सरकार के आदेश की खिलाफत भी की। वन संरक्षण एवं संवद्र्धन अधिनियम 1980 के तहत जंगल को बचाने के लिए सबसे पहले गैर वनीकृत जमीन के उपयोग की सलाह दी गई है। अगर गैर वनीकृत जमीन उपलब्ध न हो तो राजस्व भूमि पर नए पेड़ लगाकर जंबल उगाने की बात कही गई है। नए पेड़ उसी जगह लगाने होंगे, जो जंगल की परिभाषा में नहीं आते हों। इस साल मार्च में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 3,236 हेक्टेयर क्षेत्र में जंगल उगाने की बात कही थी। अदानी की कोयला खदान के लिए काटे जाने वाले पेड़ों के कारण हुए नुकसान की भरपाई के रूप में इन पेड़ों को लगाया जाना है। कोयला परियोजना के तहत इनमें से 1051 हेक्टेयर जमीन को मध्यम दर्जे का जंगल माना जाएगा। यानी केंद्र सरकार अदानी के लिए हसदेव जैसा घना जंगल काटकर मध्यम दर्जे का जंगल लगाएगी। चूंकि मामला अदानी से जुड़ा है, इसलिए ऐसी बेतुकी और खोखली दलीलें देकर केंद्र सरकार ने जंगल काटने की अनुमति दे दी।
केवल जंगल नहीं, पशुओं का घर है हसदेव
छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों के दायरे में आने वाले हसदेव अरण्य को साल के ऊंचे घने पेड़ों का जंगह माना जाता है। इन जंगल में तेंदुए, रीछ और हाथियों का घर भी है, जिन्हें वन्य जीव कानून में सबसे ज्यादा सुरक्षा हासिल है। यही जंगल हसदेव नदी और बांगो डैम का भी उद्गम स्थल है, जो कि बाघों का गलियारा माना जाता है।पेड़ कटने और कोयला खदान से मंदिरों को खतरा
हसदेव में पारसा ईस्ट केते बेसिन के ओपन कास्ट खदान का आवंटन कांग्रेस नीत यूपीए राज में हुआ था। 2014 के बाद आई एनडीए सरकार के दौरान राजस्थान ने दावा किया उसे ज्यादा बिजली चाहिए और उसके लिए उसे केते बेसिन का विस्तारीकरण करना है। इससे उसे कोयले की ज्यादा सप्लाई हो सकती है। राजस्थान की यह मांग छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के प्रतिनिधियों के उन दावों के विपरीत है, जिसमें राजस्थान को कोयला आधारित बिजली की जरूरत कम बताई गई है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता हसदेव अरण्य को बचाने के लिए काफी समय से आंदोलन कर रहे हैं। इस बीच, पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कहा कि इस खदान से रामगढ़ पहाड़ और राम मंदिर पर खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विधानसभा के संकल्प की अनदेखी करते हुए एक कंपनी विशेष को लाभ पहुंचाने यह मंजूरी दी गई है। सिंहदेव ने कहा कि राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में 99 प्रतिशत हिस्सा हसदेव अरण्य के संरक्षित और घने वन क्षेत्र का है, जहां 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी। सिंहदेव ने कहा कि यह वन क्षेत्र सरगुजा के ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ से लगा हुआ है। कोल परियोजना से रामगढ़ के मुख्य मंदिर की दूरी 8 किमी की दूरी पर है। यहां अन्य कोल परियोजनाओं के कारण लगातार रामगढ़ की पहाड़ धराशायी हो रही है। सिंहदेव ने कहा कि छत्तीसगढ़ की मौजूदा भाजपा सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा केते एक्सटेंशन को मंजूरी देना रामगढ़ की ऐतिहासिक पहचान और वहां मौजूद प्रभु श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान सहित अन्य मंदिरों के अस्तित्व के लिए खतरा है। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में रामगढ़ पहाड़ या वहां के मंदिर को नुकसान होता है, वह टूटता है या वहां जाने का रास्ता बंद हो जाता है, तो इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव, केंद्रीय वन सलाहकार समिति, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप और मंत्री राजेश अग्रवाल जिम्मेदार होंगे।




