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भाजपा यूपी में बंगाल मॉडल का करेगी प्रयोग 2027 में क्या बन पाएगा योगी के सत्ता का योग

अगले साल बंगाल मॉडल पर चुनाव लड़कर यूपी का सिंहासन जीतेगी भाजपा

– पीडीए को मात देने के लिए बनाई त्रिस्तरीय रणनीति; यहां जानें जीत का रोडमैप
– यूपी की 1.60 लाख बूथ स्तरीय समितियों में नया जोश भरने की तैयारी
– पिछले लोकसभा चुनाव में निष्क्रिय और बागी हो चुके कार्यकर्ताओं को बदला जाएगा
– बंगाल में भाजपा की जीत के हीरो सुनील बंसल यूपी में संगठन की कमान संभालेंगे
– संघ की सलाह पर संगठन को मजबूत बनाकर सरकार बनाने की पुख्ता रणनीति
– पीडीए की लहर का भाजपा बंगाल मॉडल की तरह ही करेगी सामना

लखनऊ। कहते हैं कि भाजपा हमेशा चुनाव के मोड में रहती है। बंगाल में भाजपा की जीत को अभी 72 घंटे भी पूरे नहीं हुए हैं कि पार्टी ने आगामी यूपी विधानसभा के चुनाव की रणनीति तैयार कर ली है। भाजपा की रणनीति के बारे में जानकारी सखने वाले एक जाने-माने नेता के अनुसार, पार्टी ने यूपी का सिंहासन उसी बंगाल मॉडल पर जीतने का प्लान बनाया है, जिसने 15 साल तक राज करने वाली ममता सरकार को पश्चिम बंगाल से उखाड़ फेंका है।

उन्होंने बताया कि भाजपा की पश्चिम बंगाल में जीत का मूल मंत्र राज्य के 80 हजार बूथ तक पहुंचना था, जो वह 2016 में बंगाल में एंट्री के बाद से नहीं कर सकी थी। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में बीते 3 बार से भाजपा के हारने का कारण यही था कि उसकी पकड़ जिस स्तर तक ही थी। लेकिन 4 मई को आए नतीजों से यह साफ हो गया कि भाजपा ने जिले से निकलकर गांव तक में अपनी जमीन मजबूत की है। इस कारनामे के पीछे बूथ स्तर पर पार्टी की मजबूती पकड़ का बेहद अहम योगदान रहा है। अब इसी फॉर्मूले पर भाजपा यूपी में सत्ता विरोधी लहर और विपक्षी समाजवादी पार्टी के पीडीए- यानी पिछड़ा, दलित और आदिवासी फैक्टर का सामना करने जा रही है।

निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को हटाने का काम जारी

उत्तरप्रदेश में बूथ स्तर पर भाजपा की 1.6 लाख कमेटियां हैं। यानी बंगाल से दोगुना ज्यादा। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से इन बूथ स्तरीय कमेटियों में छंटाई का काम नहीं हो पाया है। इन बूथ स्तरीय समितियों में ऐसे कई कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में क्रॉस कैम्पेनिंग की, जिसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिला। माना जा रहा है कि ऐसे निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को इस बार बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी है। उनकी जगह युवा, उत्साही और नए चेहरों को मौका देने पर विचार हो रहा है। फिलहाल, बूथ स्तरीय समितियों के सत्यापन में आरएसएस की सलाह पर ऐसे लोगों को जगह देने की तैयारी है, जिनकी राजनीतिक पहुंच समाज में गहरे तक हो। हालांकि, नई नियुक्तियों को अभी तक भाजपा आलाकमान से मंजूरी नहीं मिली है। सत्यापन का काम पूरा होने के बाद जैसे ही नए चेहरों को नियुक्त करने की मंजूरी मिलेगी, भाजपा नरेंद्र मोदी और यूपी में योगी सरकार की उपलब्धियों को नैरेटिव बनाकर बूथ समितियों के प्रशिक्षण और उनमें ऊर्जा डालने का काम शुरू करेगी।

सुनील बंसल को मिल सकती है यूपी की जिम्मेदारी

बंगाल में भाजपा की जीत के सूत्रधार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल को अब यूपी का चुनाव जीतने की बड़ी जिम्मेदारी मिलने की पूरी संभावना है। बंसल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भरोसेमंद माना जाता है। भाजपा के इन दो सबसे कद्दावर नेताओं की केमिस्ट्री भी काफी मेल खाती है। दोनों ने मिलकर पार्टी को बंगाल में बूथ स्तर तक पहुंचाया और इसी के कारण भाजपा अपने घोषणापत्र के वादों और केंद्र सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचा पाई। खासतौर पर महिला आरक्षण बिल को लेकर तृणमूल कांग्रेस के विरोधी रुख को, जिसने महिला वोटरों को भाजपा के पक्ष में मोड़ दिया। भाजपा सूत्रों का कहना है कि परदे के पीछे पार्टी की यह सारी रणनीति सुनील बंसल ने ही अमित शाह के साथ मिलकर बनाई थी और अब इसी रणनीति को यूपी मं आजमाने की तैयारी है। सुनील बंसल खुद भी 2017 में यूपी विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के मुख्य सूत्रधार रहे हैं। इस नाते वे राज्य की राजनीतिक स्थिति को करीब से जानते हैं। बंसल उस समय पार्टी के यूपी के प्रभारी थे। इस नाते बंसल को यूपी में भाजपा के संगठन का ताकत का बखूबी पता है। माना जा रहा है कि हाल ही में यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी के संगठनात्मक बदलाव के रूप में जिन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी हैं, उनकी लिस्ट भी सुनील बंसल को भेज दी गई है, ताकि वे अपनी रणनीति तैयार कर सकें। यूपी बीजेपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि पार्टी आलाकमान से हरी झंडी मिलने के बाद बूथ स्तर की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

ऐसे लड़ेगी भाजपा पीडीए फैक्टर से

पंकज चौधरी की ओर से बनाई गई यूपी की अंदरूनी रिपोर्ट में उस एंटी इंनकम्बेंसी, या सत्ता विरोधी लहर का भी जिक्र है, जो राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति, बेरोजगारी और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर लोगों के गुस्से के कारण पार्टी के भविष्य को नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विपक्ष, मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी इस सत्ताविरोधी लहर का फायदा उठा रही है। इसे रोकने के लिए आरएसएस ने भाजपा को पिछली समाजवादी सरकार और योगी सरकार की उपलब्धियों के अंतर को लोगों तक पहुंचाने को कहा है। इसमें मुख्य रूप से योगी सरकार के पिछड़े, दलित और आदिवासियों के लिए किए गए कामों को रेखांकित करते हुए लोगों को उनके फायदों की जानकारी देने की रणनीति तैयार की गई है। यहां भाजपा वैसे ही खेलना चाहती है, जैसे उसने बंगाल की सत्ता में न होते हुए भी ममता की पार्टी के खिलाफ खेला है। बंगाल के जनमानस में इसका भाजपा को बड़ा लाभ मिला है। इसी को ध्यान में रखते हुए आरएसएस ने भाजपा को वही रणनीतिक दोहराने की सलाह दी है। सूत्रों के अनुसार, इस योजना में पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ की केंद्र व राज्य सरकारों की उपलब्धियों को प्रचारित किया जाएगा। दूसरी तरफ विपक्ष, खास तौर पर समाजवादी पार्टी और उसकी सहयोगी कांग्रेस की कमियों को बेनकाब किया जाएगा। बीजेपी महिलाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए विपक्ष की महिला विरोधी मंशा उजागर करेगी। यानी वह लोगों को बताएगी कि विपक्ष ने कैसे महिलाओं को आरक्षण देने वाले संवैधानिक विधेयक को रोकने की कोशिश की थी।

3 एस की रणनीति

भाजपा सूत्रों के अनुसार, आगामी विधानसभा चुनाव में यूपी की गद्दी तक पहुंचने के लिए भाजपा ने तीन एस की रणनीति भी बनाई है। यहां 3 एस का मतलब संघ, सरकार और संगठन से है। यानी भाजपा संगठन को दिशा देने के लिए संघ के निर्देशों पर अमल करेगी और उसका अंतिम लक्ष्य सरकार बनाने का होगा। संघ चाहता है कि भाजपा उसकी योजना के अनुसार संगठन में अपनी जमावट करे और मोदी सरकार की नीतियों का लाभ और योगी सरकार की विकसित उत्तरप्रदेश की नीति को समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाए। इसे एक बहु स्तरीय चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें राजनीतिक लामबंदी, शासन का नैरेटिव और वैचारिक मजबूती, ये तीनों एक साथ मिलकर काम करेंगे।

अखिलेश ने आई-पैक से नाता तोड़ा

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेष यादव ने मंगलवार को प्रशांत किशोर के संगठन आई-पैक से औपचारिक रूप से नाता तोड़ लिया। पार्टी का कहना है कि चूंकि उत्तरप्रदेश में काम करने के लिए आईपैक ज्यादा पैसा मांग रही है और इतना पैसा पार्टी के पास नहीं है, इसलिए वह नाता तोड़ रही है। हालांकि, अंदरखाने के सूत्र बताते हैं कि आई-पैक की फंडिंग को लेकर इस समय जारी ईडी की जांच के घेरे में आने से बचने के लिए समाजवादी पार्टी ने उससे नाता तोड़ा है। आई-पैक इससे पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को परामर्शसेवाएं दे रही थी और इसके एवज में संस्थान को सालाना 2700 करोड़ रुपए दिए जा रहे थे। हालांकि, ईडी का कहना है कि ममता सरकार कोयला घोटाले के कालेधन को इस फंडिंग के माध्यम से सफेद कर रही थीं।

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