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सूबे के पुलिस प्रमुख राजीव कृष्ण का डिजिटल कट्टरता पर बड़ा प्रहार, सोशल मीडिया नेटवर्क रडार पर नजर रखेंगे जिम्मेदार

डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश के बाद ऑनलाइन नफरत अभियानों पर कड़ी निगरानी

  • फर्जी वीडियो और सांप्रदायिक अफवाह फैलाने वालों पर शिकंजा कसने की तैयारी
  • यूपी में साइबर अपराध के खिलाफ हाईटेक अभियान, एआई तकनीक का होगा इस्तेमाल
  • एन्क्रिप्टेड चैनलों से चल रहे डिजिटल गिरोहों पर पुलिस की पैनी नजर
  • सोशल मीडिया से फैल रही अशांति रोकने के लिए यूपी पुलिस का नया डिजिटल सतर्कता मॉडल
  • पेपर लीक से फेक टिकट तक, संगठित डिजिटल अपराध पर उत्तर प्रदेश पुलिस सख्त
  • मोबाइल स्क्रीन से कानून व्यवस्था तक ऑनलाइन अपराध के खिलाफ यूपी पुलिस का निर्णायक संघर्ष

लखनऊ। उत्तर प्रदेश अब कानून व्यवस्था की लड़ाई को केवल सड़कों और चौक-चौराहों तक सीमित नहीं मान रहा। बदलते समय के साथ अपराध का स्वरूप भी तेजी से बदला है और अब समाज को अस्थिर करने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में डिजिटल कट्टरता, सोशल मीडिया आधारित नफरत अभियान, फर्जी प्रचार तंत्र और संगठित साइबर नेटवर्क शामिल हो चुके हैं। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बड़े और व्यापक अभियान की तैयारी शुरू कर दी है। पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण के सख्त निर्देशों के बाद राज्यभर में सोशल मीडिया नेटवर्कों, फर्जी खातों, एन्क्रिप्टेड चैनलों और डिजिटल अपराध से जुड़े संगठित गिरोहों पर निगरानी और कार्रवाई को और मजबूत किया जा रहा है। पुलिस मुख्यालय से जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी जिलों की पुलिस, साइबर सेल, विशेष जांच इकाइयों और खुफिया एजेंसियों को उन डिजिटल नेटवर्कों की पहचान करने के लिए सक्रिय किया गया है जो धार्मिक उन्माद, सांप्रदायिक तनाव, फर्जी वीडियो, मॉर्फ तस्वीरें, अफवाहें और भड़काऊ संदेशों के जरिए सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। हाल के वर्षों में प्रदेश के अनेक जिलों में ऐसी घटनाएं सामने आईं जिनमें सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री ने स्थानीय तनाव को बड़े विवाद और हिंसा में बदल दिया। पुलिस मुख्यालय का मानना है कि आने वाले समय में अपराध का सबसे संवेदनशील मोर्चा डिजिटल प्लेटफॉर्म ही होंगे। राज्य पुलिस अब डिजिटल सतर्कता मॉडल को और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसके तहत सोशल मीडिया की निगरानी, डिजिटल फॉरेंसिक जांच, ई-साक्ष्य संग्रह, डेटा विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाएगा। पुलिस विभाग का मानना है कि आज अधिकांश नफरत फैलाने वाले अभियान बंद समूहों, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और फर्जी खातों के जरिए संचालित किए जाते हैं। कई बार पुराने वीडियो, दूसरे राज्यों की घटनाओं अथवा मॉर्फ सामग्री को नया बताकर वायरल किया जाता है, जिससे अचानक तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदी और मिश्रित भाषाओं में लिखे जाने वाले पोस्टों में कट्टरता और आक्रामकता की पहचान करना तकनीकी रूप से जटिल है। इसी कारण देशभर में इस विषय पर शोध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली पर तेजी से काम हो रहा है। उत्तर प्रदेश पुलिस भी इसी दिशा में अपनी क्षमता बढ़ा रही है ताकि डिजिटल अपराध और संगठित ऑनलाइन अभियानों की समय रहते पहचान की जा सके। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में साइबर अपराधों के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। ऑनलाइन निवेश ठगी, डिजिटल लोन ऐप, पहचान चोरी, फर्जी नौकरी पोर्टल, पेपर लीक गिरोह और नकली टिकट रैकेट जैसे अपराध अब ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। कई मामलों में अपराधी राज्य के बाहर अथवा विदेशी सर्वरों से संचालित नेटवर्कों का इस्तेमाल करते पाए गए। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि आधुनिक अपराध अब केवल आर्थिक धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक दुष्प्रचार और संगठित डिजिटल उन्माद का भी रूप ले चुका है। इसी पृष्ठभूमि में डीजीपी राजीव कृष्ण ने तकनीक आधारित पुलिसिंग को मजबूत करने पर विशेष बल दिया है।

सोशल मीडिया नेटवर्कों पर बढ़ेगी निगरानी

उत्तर प्रदेश पुलिस ने ऑनलाइन कट्टरता, संगठित साइबर अपराध और सोशल मीडिया आधारित नफरत अभियानों के खिलाफ अब बड़े स्तर पर व्यापक रणनीतिक कार्रवाई शुरू करने की तैयारी कर ली है। पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण के निर्देशों के बाद राज्यभर में साइबर निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जा रहा है। पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों का दुरुपयोग कर समाज में अस्थिरता फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ कठोर और तकनीक आधारित कार्रवाई की जाएगी। सूत्रों के अनुसार सभी जिलों की पुलिस इकाइयों को ऐसे खातों और नेटवर्कों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं जो लगातार भड़काऊ सामग्री, धार्मिक उन्माद, सांप्रदायिक अफवाहें और फर्जी वीडियो प्रसारित कर रहे हैं। पुलिस विशेष रूप से उन बंद समूहों और एन्क्रिप्टेड चैनलों पर नजर रख रही है जहां संगठित तरीके से नफरत फैलाने वाले संदेश प्रसारित किए जाते हैं। राज्य पुलिस का मानना है कि कई बार छोटे स्तर की अफवाहें सोशल मीडिया के जरिए तेजी से फैलकर कानून व्यवस्था की बड़ी चुनौती बन जाती हैं। यही कारण है कि अब डिजिटल निगरानी को स्थानीय पुलिसिंग से जोड़ने की रणनीति तैयार की गई है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण पर जोर

पुलिस विभाग अब एआई आधारित विश्लेषण प्रणाली के इस्तेमाल को भी बढ़ाने जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया पर प्रतिदिन लाखों संदेश प्रसारित होते हैं, जिनमें संदिग्ध और भड़काऊ सामग्री की पहचान करना पारंपरिक तरीके से संभव नहीं है। इसी कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं जो संदिग्ध पैटर्न, आक्रामक भाषा और समन्वित डिजिटल गतिविधियों की पहचान कर सकें। विशेषज्ञ बताते हैं कि हिंदी और मिश्रित भाषा वाले पोस्टों की निगरानी तकनीकी रूप से कठिन होती है। कई बार संकेतात्मक शब्दों और सांकेतिक संदेशों का उपयोग किया जाता है, जिससे सामान्य फिल्टर उन्हें पकड़ नहीं पाते। उत्तर प्रदेश पुलिस अब इस दिशा में तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ले रही है।

कानपुर हिंसा ने बढ़ाई चिंता

वर्ष 2022 में कानपुर में जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा ने सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। जांच एजेंसियों ने पाया था कि बड़ी संख्या में भड़काऊ पोस्ट और वीडियो वायरल किए गए थे। कई संदेश राज्य के बाहर संचालित खातों से प्रसारित हुए थे। पुलिस ने अनेक डिजिटल उपकरण जब्त किए और कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया था।
इस घटना के बाद राज्य पुलिस ने महसूस किया कि भविष्य की कानून व्यवस्था में डिजिटल निगरानी सबसे महत्वपूर्ण तत्व बनने जा रही है।

गैंगस्टर नेटवर्क और डिजिटल प्रचार

माफिया अतीक अहमद से जुड़े मामलों की जांच में भी सोशल मीडिया की भूमिका सामने आई थी। जांच एजेंसियों को ऐसे कई खाते मिले थे जो गैंगस्टर नेटवर्क के समर्थन में प्रचार चला रहे थे। पुलिस को धमकी, दुष्प्रचार और संगठित समर्थन अभियानों की भी जानकारी मिली थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अब अपराधी गिरोह केवल जमीन या हथियारों के जरिए ही प्रभाव नहीं बनाते, बल्कि डिजिटल प्रचार के जरिए भी भय और प्रभाव पैदा करने की कोशिश करते हैं।

धार्मिक अफवाहें और मॉर्फ वीडियो बड़ी चुनौती

बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ जैसे जिलों में कई बार धार्मिक अफवाहों और मॉर्फ वीडियो के जरिए तनाव फैलाने की कोशिशें हुईं। बाद की जांच में कई वायरल वीडियो पुराने अथवा दूसरे राज्यों के पाए गए। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में समय रहते तथ्य सामने लाना और फर्जी सामग्री को रोकना अत्यंत आवश्यक होता है। इसी कारण अब जिलास्तर पर साइबर मॉनिटरिंग टीमों को और सक्रिय किया जा रहा है।

नकली आईपीएल टिकट गिरोह का खुलासा

हाल ही में लखनऊ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फर्जी आईपीएल टिकट बनाने वाले गिरोह का भी खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि गिरोह डिजिटल डिजाइन सॉफ्टवेयर और नकली क्यूआर कोड का उपयोग कर रहा था। यह मामला दर्शाता है कि अपराधी अब अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में डीपफेक वीडियो, एआई आधारित धोखाधड़ी और डिजिटल पहचान चोरी जैसे अपराध और तेजी से बढ़ सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा साइबर अपराध

उत्तर प्रदेश पुलिस के आंकड़ों के अनुसार साइबर अपराध अब महानगरों तक सीमित नहीं हैं। ऑनलाइन निवेश ठगी, डिजिटल लोन ऐप, पहचान चोरी और फर्जी नौकरी पोर्टल जैसे अपराध ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल चुके हैं। कई मामलों में ग्रामीण और बुजुर्ग लोग सबसे आसान लक्ष्य बन रहे हैं। पुलिस अब साइबर जागरूकता अभियान भी बढ़ाने की योजना बना रही है ताकि लोग डिजिटल ठगी से बच सकें।

डिजिटल फॉरेंसिक क्षमता होगी मजबूत

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस डिजिटल निगरानी को लेकर नागरिक अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नफरत फैलाने वाले अभियानों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन वैध आलोचना और लोकतांत्रिक असहमति को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। कानूनी जानकारों के अनुसार पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक मानकों का पालन इस पूरी प्रक्रिया में अत्यंत आवश्यक होगा।

* ऑनलाइन कट्टरता और डिजिटल अपराध पर यूपी पुलिस का बड़ा अभियान
* डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश पर सोशल मीडिया निगरानी तेज
* फर्जी वीडियो, मॉर्फ तस्वीर और नफरत अभियान पर विशेष नजर
* एआई आधारित विश्लेषण और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम होगा मजबूत
* एन्क्रिप्टेड चैनलों और फर्जी खातों की पहचान पर फोकस
* कानपुर हिंसा और सांप्रदायिक अफवाहों के बाद बढ़ी सतर्कता
* पेपर लीक, डिजिटल ठगी और नकली टिकट गिरोहों पर कार्रवाई तेज
* तकनीक आधारित पुलिसिंग बनेगी भविष्य की कानून व्यवस्था का केंद्र

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