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विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे का भ्र्ष्टाचार, उच्च न्यायालय का करारा प्रहार

हाईकोर्ट का नोटिस, सत्ता के गलियारों में हलचल प्रमुख सचिव की कुर्सी पर उठे गंभीर सवाल

  • क्या नियमों को ताक पर रखकर बढ़ाई गई सत्ता की उम्र
  • 70 की दहलीज पर भी कुर्सी से चिपके रहने का अधिकार किसने दिया
  • विधानसभा भर्ती घोटाले की परतें खोलने पहुंचा मामला हाईकोर्ट
  • लोक सेवा आयोग को किनारे कर किसने संभाली नियुक्तियों की कमान?
  • सेवा नियमावली में संशोधन या सत्ता का निजी संविधान?
  • कर्मचारियों के उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या तक के आरोपों की गूंज
  • ‘सार्वजनिक पद नहीं’ वाली दलील पर कानूनी हलकों में हैरानी
  • हाईकोर्ट में आधे घंटे की बहस ने हिला दिए सत्ता के गलियारे

सवाल सिर्फ एक अफसर का नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव पद को लेकर शुरू हुई कानूनी लड़ाई अब केवल एक नियुक्ति विवाद नहीं रह गई है। यह मामला सत्ता, जवाबदेही, संवैधानिक मर्यादाओं, प्रशासनिक पारदर्शिता और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच खड़ी उस व्यवस्था का आईना बन गया है, जहां वर्षों से उठते सवाल जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लखनऊ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा याचिका स्वीकार कर नोटिस जारी किए जाने के बाद विधानसभा सचिवालय से लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों तक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह द्वारा दायर याचिका में विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार, भर्ती प्रक्रियाओं, नियमावली संशोधनों तथा प्रशासनिक निर्णयों को चुनौती दी गई है। याचिका में लगाए गए आरोप गंभीर हैं और यदि इनमें सत्यता पाई जाती है तो यह मामला केवल एक व्यक्ति की वैधानिकता का नहीं बल्कि विधानसभा सचिवालय की कार्यप्रणाली पर भी बड़े प्रश्न खड़े कर सकता है। सुनवाई के दौरान न्यायालय की कथित टिप्पणी बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोग 65 वर्ष के बाद विदा हो जाते हैं, आप 70 की उम्र तक बने हुए हैं, क्या 80 तक रहने का विचार ने बहस को और तीखा बना दिया। हालांकि अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के निर्णय के बाद ही सामने आएगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मामला आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक चर्चा का विषय बनने वाला है। हाईकोर्ट ने स्वीकार की याचिका, नोटिस जारी लखनऊ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रमुख सचिव की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका को प्रारंभिक स्तर पर सुनवाई योग्य मानते हुए विधानसभा अध्यक्ष तथा प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दिया। करीब आधे घंटे चली बहस में याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मामला विधानसभा जैसे संवैधानिक संस्थान के सर्वोच्च प्रशासनिक पद से जुड़ा हुआ है, इसलिए न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है।

क्या नियुक्ति प्रक्रिया में हुईं गंभीर अनियमितताएं?

याचिका में आरोप लगाया गया है कि विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर कई वर्षों से विवाद बना हुआ है। याचिकाकर्ता का दावा है कि प्रमुख सचिव स्तर से ऐसे निर्णय लिए गए जिनसे नियुक्ति प्रक्रिया का स्वरूप बदल गया और पारंपरिक संस्थागत नियंत्रण कमजोर हुआ। इन्हीं आरोपों की जांच और न्यायिक परीक्षण की मांग अदालत से की गई है।
लोक सेवा आयोग की भूमिका पर उठे सवाल याचिका में कहा गया है कि नियुक्ति संबंधी प्रक्रियाओं में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भूमिका प्रभावित हुई। आरोप यह भी है कि कुछ नीतिगत बदलावों पर हस्ताक्षर किए गए और उन्हें लागू किया गया। इन आरोपों की सत्यता अभी न्यायिक जांच के अधीन है, लेकिन इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर याचिका में नियुक्ति की वैधता को चुनौती दी गई है।

70 वर्ष की आयु और सेवा विस्तार का विवाद

मामले का सबसे चर्चित पहलू आयु और सेवा विस्तार को लेकर है। याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क है कि जब अनेक संवैधानिक और प्रशासनिक पदों पर आयु सीमा निर्धारित है, तब प्रमुख सचिव पद पर लंबे समय तक बने रहने के आधार और वैधानिकता स्पष्ट की जानी चाहिए। इसी आधार पर अधिकार-पृच्छा याचिका दाखिल की गई है।

भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर आरोप

याचिका में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी की नियुक्तियों पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न हुए। हालांकि इन आरोपों पर अभी
तक किसी सक्षम न्यायिक या जांच एजेंसी की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन्हें याचिका का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।

नियमावली संशोधन पर विवाद

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि विधानसभा की नियमावली में संशोधन किए गए और उन्हें सदन के समक्ष विधिवत प्रस्तुत नहीं किया गया। यदि यह आरोप सिद्ध होता है तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं रहेगा बल्कि विधानसभा की संस्थागत कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

‘सार्वजनिक पद नहीं’ वाली दलील पर बहस

सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष ने कथित तौर पर यह तर्क रखा कि प्रमुख सचिव सार्वजनिक पद की श्रेणी में नहीं आते। इस तर्क ने कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि जब कोई अधिकारी सरकारी खजाने से वेतन प्राप्त करता है, नियुक्ति प्रक्रियाओं में भाग लेता है और प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करता है, तो वह निश्चित रूप से सार्वजनिक पदधारी है।

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक शिकायत का दावा

याचिकाकर्ता पक्ष ने न्यायालय को बताया कि इस विषय में मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री तक शिकायतें भेजी गईं। जब किसी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, तब न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। हाईकोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 6 जुलाई को निर्धारित की है।
आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि न्यायालय अंतरिम राहत के प्रश्न पर क्या रुख अपनाता है और याचिका की सुनवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है। यह लड़ाई किसी व्यक्ति और पद के बीच नहीं, बल्कि जवाबदेही और अधिकार के बीच खड़े उस प्रश्न की है जो लोकतंत्र की हर संस्था से पूछता है यदि नियम सबके लिए हैं, तो क्या सत्ता के सबसे प्रभावशाली गलियारों में बैठे लोगों के लिए भी वही नियम लागू होंगे? अब निगाहें हाईकोर्ट पर हैं, जहां यह तय होगा कि आरोप केवल राजनीतिक शोर हैं या फिर व्यवस्था के भीतर छिपे किसी बड़े सच की दस्तक।

● प्रमुख सचिव की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने स्वीकार की।
● विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी।
● अगली सुनवाई 6 जुलाई को निर्धारित।
● सेवा विस्तार, नियुक्तियों और नियमावली संशोधन पर सवाल।
● अधिकार-पृच्छा याचिका के जरिए पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती।
● भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं के आरोप।
● लोक सेवा आयोग की भूमिका कमजोर किए जाने का आरोप।
● कर्मचारियों के उत्पीड़न और प्रशासनिक अनियमितताओं की जांच की मांग।
● प्रतिवादी पक्ष ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल उठाए।
● अंतिम सत्य न्यायालय के निर्णय और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा।

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