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योगी सरकार में कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल:विपक्ष काट रहा बवाल

क्या उत्तर प्रदेश में सरकारी दावों और जनता के अनुभव के बीच बढ़ती जा रही है दूरी ?

अचूक संघर्ष योगी सरकार में कानून-व्यवस्था एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। दिनभर विभिन्न घटनाओं और विपक्षी दलों के बयानों के बाद यह सवाल तेज हो गया कि क्या सरकार के दावे वास्तव में ज़मीनी हकीकत से मेल खाते हैं। सरकार लगातार बेहतर कानून-व्यवस्था, अपराध पर नियंत्रण और त्वरित कार्रवाई का दावा करती है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि आम नागरिक आज भी असुरक्षा, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी महसूस कर रहा है।

लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी कसौटी केवल बड़ी परियोजनाएँ या निवेश नहीं, बल्कि नागरिक की सुरक्षा होती है। यदि आम व्यक्ति अपने घर, सड़क, बाज़ार या कार्यस्थल पर स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करता, तो विकास के बड़े-बड़े दावे उसके लिए महत्व खो देते हैं। जनता का पहला अधिकार भयमुक्त जीवन है और इसी आधार पर सरकार का मूल्यांकन भी होना चाहिए।

विपक्ष ने आज कई घटनाओं का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि अपराध की घटनाओं के बाद प्रशासन अक्सर सक्रिय होता है, जबकि अपराध रोकने की व्यवस्था उतनी प्रभावी दिखाई नहीं देती। विपक्ष का कहना है कि पुलिस की त्वरित कार्रवाई स्वागतयोग्य हो सकती है, लेकिन उससे पहले अपराध क्यों हुआ, यह अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि हर बड़ी घटना के बाद केवल गिरफ्तारी और जांच की घोषणा ही व्यवस्था की पहचान बन जाए, तो यह शासन की सफलता नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरी का संकेत भी माना जा सकता है।

सरकार इन आरोपों को पूरी तरह राजनीतिक बताती है। उसका कहना है कि अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा रही है, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ा है और अपराध नियंत्रण के लिए पुलिस को पहले से अधिक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं। सरकार का दावा है कि कानून सबके लिए समान है और किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा।

लेकिन जनता की चिंता इससे आगे जाती है। नागरिक पूछ रहा है कि यदि व्यवस्था इतनी मजबूत है तो बार-बार ऐसी घटनाएँ क्यों सामने आती हैं जिनसे लोगों में भय का वातावरण बनता है? आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक कमियाँ हैं जिनके कारण अपराध होने के बाद ही पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय दिखाई देती है? क्या स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है? क्या पुलिस बल पर कार्यभार इतना अधिक है कि रोकथाम की क्षमता प्रभावित हो रही है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिल सकते।

विशेषज्ञों का मानना है कि कानून-व्यवस्था केवल पुलिस का विषय नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया, सामाजिक विश्वास, स्थानीय प्रशासन, खुफिया तंत्र और जवाबदेही से जुड़ा व्यापक प्रश्न है। यदि इनमें से किसी एक कड़ी में भी कमजोरी आती है तो उसका असर पूरे तंत्र पर पड़ता है। इसलिए केवल अपराधियों पर कार्रवाई की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ भी समाप्त करनी होंगी जिनमें अपराध पनपते हैं।

जनता का एक और बड़ा सवाल प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर है। किसी भी गंभीर घटना के बाद अधिकारियों के स्थानांतरण, निलंबन या जांच की घोषणा अक्सर होती है, लेकिन क्या इससे व्यवस्था में स्थायी सुधार आता है? यदि वही समस्याएँ बार-बार सामने आती रहें, तो यह संकेत है कि सुधार की प्रक्रिया अपेक्षित परिणाम नहीं दे रही। शासन की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब घटनाएँ घटें ही नहीं, न कि केवल उनके बाद कार्रवाई होती दिखाई दे।

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक लोगों की अपेक्षा है कि पुलिस आम नागरिक के प्रति अधिक संवेदनशील बने, शिकायतों का समय पर समाधान हो और किसी भी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव कानून के निष्पक्ष पालन में बाधा न बने। लोकतंत्र में कानून का सम्मान तभी बढ़ता है जब जनता को विश्वास हो कि न्याय बिना भेदभाव के मिलेगा।

विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सरकार अपने कार्यों का बचाव कर रही है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह नागरिक है जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य पर है। जनता न तो राजनीतिक आरोपों से सुरक्षित होती है और न ही केवल सरकारी दावों से। उसे परिणाम चाहिए—ऐसे परिणाम जो उसके दैनिक जीवन में भय कम करें और विश्वास बढ़ाएँ।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना निस्संदेह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन यही चुनौती सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। यदि जनता को बार-बार यह महसूस होने लगे कि उसकी सुरक्षा राजनीतिक बहस का विषय बन गई है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। सरकार के लिए सबसे बड़ा उत्तर राजनीतिक प्रतिवाद नहीं, बल्कि ऐसा प्रशासन है जिस पर नागरिक बिना किसी संदेह के भरोसा कर सके।

अंततः लोकतंत्र में सरकार की शक्ति उसके बहुमत से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से मापी जाती है। यदि नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और सुना हुआ महसूस करे, तभी शासन सफल कहा जा सकता है। अन्यथा कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल केवल विपक्ष के आरोप नहीं रह जाते, बल्कि वे समाज की उस बेचैनी का प्रतिबिंब बन जाते हैं जिसे किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं होना चाहिए।

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