नरेन्द्र मोदी का राक्षसराज, देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था का बिगाड़ दिया साज
आजाद भारत के विनाशक व सत्यानाशी पीएम के रूप में ये हमेशा जाने जाएंगे

हमारे देश में समाज के एक हिस्से या विभिन्न जनसमूहों में राक्षसभाव पहले से था।ये ही लोग हैं जिनको राम मंदिर,हिंदुत्व , गऊ रक्षा ,एंटी मुस्लिम प्रचार आदि के नाम पर आरएसएस -भाजपा-बजरंग दल आदि ने गोलबंद किया उनको दक्षिणपंथी मुखौटा प्रदान किया है ।

इस राक्षसभाव के पास राष्ट्रीय पहचान देने वाले दल और बडे नेता का अभाव था ,उस अभाव की पूर्ति सांगठनिक तौर पर आरएसएस ने की और उनको राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करके भाजपा आदि संगठनों का मुखौटा प्रदान किया। असल में समाज में व्यापक स्तर पर व्याप्त इस राक्षस भाव को इतने सुव्यवस्थित राजनीतिक कार्यक्रम के तहत कभी किसी दल ने बाँधने की कोशिश नहीं की थी , अन्य दलों का इस राक्षस भाव के साथ केजुअल, तात्कालिक और मांग पूर्ति का संबंध रहा है।
मसलन् दंगा करना है तो भाडे पर लोग जुगाड कर लो। मतदान केन्द्र लूटने हैं तो गुण्डे जुगाड कर लो।देवराला सतीकांडके समर्थन में रैली करनी है तो भीड जुटा लो , आपातकाल का समर्थन करना है तो गुंडे जुटाओ आदि घटनाएँ हमारे समाज के राक्षस भाव बोध और समाज के एक बडे अंश के जंगलीपन के नमूने हैं । रीयलसेंस में हमने इसे कभी चुनौती ही नहीं दी। केजुअल प्रतिवाद जरूर किए ।
इसी तरह मार्क्सवाद को नापसंद करने वालों में एक वर्ग है जो दैनंदिन राजनीति में राक्षस भाव का समर्थक है। इनमें वे लोग हैं जो साम्प्रदायिक हैं,दूसरे वे भी हैं जो लिबरल हैं,लेकिन विचारधारा के आधार पर मार्क्सवाद को नापसंद करते हैं, तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो व्यक्तिगत-आत्मगत कारणों से मार्क्सवाद को नापसंद करते हैं।मार्क्सवाद विज्ञान है,विश्वदृष्टिकोण है। यह पसंद-नापसंद से परे मानव समाज के मुक्ति का मार्ग है।
भारत की सामाजिक अवस्था को हम जीतना गहराई से जानेंगे उतनी ही गहराई में जाकर जन संघर्षों की प्रासंगिकता और मार्क्सवाद की आवश्यकता को महसूस करेंगे।मार्क्सवाद कोई किताबी ज्ञान नहीं है,यह सामाजिक मुक्ति का विज्ञान है।यदि आपकी सामाजिक मुक्ति के लक्ष्य में आस्था है तो निश्चित तौर पर मार्क्सवाद को अपने दृष्टिकोण के करीब पाएंगे।
अनेक फेसबुक दोस्त हैं जो मार्क्सवाद का नाम सुनकर भड़कते हैं। कुछ हैं जिनके अंदर संघी फेक राष्ट्रवाद ,हिन्दुत्व आदि के कारण जाग पड़े हैं।कुछ हैं जो बिना सोचे ही लिख देते हैं,इन सभी से एक सवाल है समाज में किसका वर्चस्व हो ? किसान-मजदूर का या पूंजीपतिवर्ग ?अथवा किसी का भी वर्चस्व न हो ? तो कैसे ?
जो लोग कूपमंडूक,अकर्मण्य , अंधविश्वासी और संकीर्ण हैं उनमें मार्क्सवाद विरोधी रूझान तेजी से पनपते हैं।विज्ञानसम्मतचेतना का जहां सामान्य वातावरण है वहां मार्क्सवाद विरोधी भावनाएं कम दिखती हैं। यह भी कह सकते हैं नॉनसेंस , अंधविश्वास और मार्क्सवाद विरोध जुड़वां भाई हैं।
मध्यवर्ग-निम्नमध्यवर्ग में कूपमंडूकता और अंधविश्वासों से लड़ने की शक्ति नहीं होती जिसके कारण वह ज्यादा अंधविश्वासी-ईश्वरभक्त और मार्क्सवाद विरोधी होता है। इसके अलावा चाटुकारिता,पुश्तैनी भ्रष्टाचार ,चरित्रहीनता और दीनता से ग्रस्त नजरिया भी मार्क्सवाद विरोधी बनाता है।जिसके कारण वे सत्ता और शासकवर्गों पर आश्रित होते हैं। सवाल उठता है मध्यवर्ग में कूपमंडूकता और अंधविश्वास कैसे खत्म हो ?
धर्म-निरपेक्षता और धर्मनिरपेक्ष लोगों से आरएसएस वाले चिढ़ते हैं और उनके खिलाफ अहर्निश विषवमन करते हैं, सवाल यह है देश को सबसे ज्यादा कमाकर धर्मनिरपेक्ष लोग दे रहे हैं या फंडामेंटलिस्ट या संत-महंत या साम्प्रदायिक लोग दे रहे हैं ?भारत की बौद्धिक संपदा के विकास में धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों-वैज्ञानिकों का सबसे बड़ा योगदान है या आरएसएसपंथी कूपमण्डूक और अंधविश्वासी बौद्धिकों का ?
भारत के निर्माण में धर्मनिरपेक्ष लोगों की केन्द्रीय भूमिका रही है।अतः उनको गाली देने या नीचा दिखाने का अर्थ है भारत को नीचा दिखाना।भारत की श्रेष्ठ मानवीय परंपराओं पर कीचड़ उछालना।
जिस देश में दुनिया के सबसे ज्यादा कंगाल ,बीमार,असहाय,अपाहिज,अपराधी रहते हों, वहां के शासक अमीर हों,बडे़ पैमाने पर निहित स्वार्थी और भ्रष्ट मध्यवर्ग और पूंजीपति हों,उस देश में विकास की बातें करना वैसे ही है जैसे कोई कहे कि गर्म तवे पर नाचो!
विगत 12साल में सड़क-बिजली-पानी -शिक्षाआदि विकास के मुद्दे नहीं बन पाए।यह है मोदी सरकार का सबसे बड़ा योगदान।मोदी सरकार आने के बाद संघ और भाजपा ने जो उल्लेखनीय काम किए हैं, वे हैं, मुसलमानों को खोजो और नफरत करो,हिन्दुओं को खोजो और पूजा करो,प्रेम करने वालों को खोजो और हमले करो,गाय को खोजो और असहाय छोड़ो,बाबाओं को धंधा दो,बेकारों को अपराधी बनाओ और संघ का मित्र बनाओ। अमीरों को सब्सीड़ी दो,किसानों को मौत के हवाले करो।कांग्रेस को गालियां दो,नेहरू का अपमान करो,सोनिया गांधी को बेइज्जत करो,राहुल गांधी का उपहास करो।आरएसएस को महान बताओ,दंगों को पुण्यकार्य बताओ।दंगाईयों को सम्मानित करो।धर्मनिरपेक्षता पर हमले करो।छात्रों की छात्रवृत्ति काटो,वि.वि. में अशांति रखो। शिक्षा को नष्ट करो।बैंकों की लूट को वैध बनाओ।यही वह परिदृश्य है जो विगत 12साल में सचेत रूप से मोदी सरकार ने निर्मित किया है। यह परिदृश्य राक्षसभाव की सुसंगत अभिव्यक्ति है।



