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बिजली विभाग के कार्यकारी अधिकारी रमाशंकर पर एमडी शम्भू कुमार मेहरबान,योगी की नीतियां भ्र्ष्टाचार पर हुई कुर्बान

  • तबादलों का तंत्र या भ्रष्टाचार का ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’?
  • पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में ‘सेटिंग’ का चल रहा खेल
  • पत्नी के नाम फर्म, अधिकारी के हाथ ठेके—शासकीय हितों के टकराव का खुला खेल
  • जांच के नाम पर लीपापोती कार्रवाई की जगह कागजी खानापूर्ति
  • 10 महीने में 3 तबादले सिस्टम की कमजोरी या सत्ता की मेहरबानी
  • मिर्जापुर से सोनभद्र और फिर वापसी पोस्टिंग बनी ‘कमाई का चक्र’
  • एमडी के ‘सारथी’ का खेल बिना पद के भी सबसे ज्यादा ताकत
  • स्वास्थ्य कारण या बहाना हर तबादले के पीछे नया तर्क
  • ‘बाहुबली संस्कृति’ का आरोप योगी सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त दावे पर बड़ा सवाल

वाराणसी। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में सरकारी तंत्र के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार, संरक्षण और ‘सेटिंग’ के खेल की एक ऐसी परत सामने आई है, जो न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था की साख पर सवाल खड़े करती है, बल्कि मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावों को भी कठघरे में खड़ा कर देती है। मामला पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड से जुड़ा है, जहां एक कार्यकारी अधिकारी रमाशंकर पाल का नाम इन दिनों सुर्खियों में है लेकिन उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि आरोपों और संदिग्ध तबादलों के सिलसिले के कारण। आरोप बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि रमाशंकर पाल ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी के नाम पर एक फर्म खड़ी की और उसी के माध्यम से विभागीय ठेकेदारी का खेल शुरू कर दिया। यानी एक ही व्यक्ति, दो भूमिकाओं में एक तरफ अधिकारी, दूसरी तरफ अप्रत्यक्ष ठेकेदार। यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सीधे-सीधे हितों के टकराव का मामला भी बनता है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि आरोप लगे बल्कि यह है कि आरोपों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। विभाग ने सिर्फ एक औपचारिक पत्र जारी कर यह दिखाने की कोशिश की कि मामला देखा गया है। अधिष्ठान से संबंधित सूचना गलत भेजने का हवाला देकर फाइल को लगभग बंद कर दिया गया। यानी गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप को एक तकनीकी गलती बनाकर हल्का कर दिया गया। जून 2024 के स्थानांतरण सत्र में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। जब मामला दोबारा उठा, तब कथित तौर पर भारी दबाव और लंबी मशक्कत के बाद जुलाई 2025 में रमाशंकर पाल का तबादला मिर्जापुर कर दिया गया। लेकिन यह तबादला भी सजा नहीं, बल्कि ‘इनाम’ जैसा माना गया क्योंकि मिर्जापुर को विभाग में ‘कमाई वाली पोस्टिंग’ के रूप में देखा जाता है। इसके बाद जो हुआ, वह और भी चौंकाने वाला है। महज एक महीने के भीतर रमाशंकर पाल ने अपना तबादला सोनभद्र करा लिया और फिर अगले ही महीने वापस मिर्जापुर लौट आए। यह पूरा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि तबादले अब प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा बन चुके हैं। सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल के पीछे पूर्वांचल के एक प्रभावशाली आईएएस अधिकारी और निगम के प्रबंध निदेशक शंभू कुमार की भूमिका बताई जा रही है। विभाग के अंदर उन्हें ‘बाहुबली’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह सिर्फ आरोप हैं, लेकिन विभागीय सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके एक करीबी ‘सारथी’ के माध्यम से तबादलों और पोस्टिंग का पूरा नेटवर्क संचालित होता है।

भ्रष्टाचार का नया मॉडल ‘इन-हाउस ठेकेदारी’ का खतरनाक ट्रेंड

पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में सामने आया यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की कथित अनियमितता नहीं, बल्कि एक खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है जहां अधिकारी खुद ही ठेकेदार बन बैठते हैं। सूत्रों के अनुसार, रमाशंकर पाल ने अपनी पत्नी के नाम से फर्म बनाकर विभागीय कार्यों में भागीदारी सुनिश्चित की। यह मॉडल इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार को पकड़ना बेहद कठिन हो जाता है। कागजों में सब कुछ वैध दिखता है फर्म अलग, अधिकारी अलग लेकिन फैसले और लाभ का केंद्र एक ही व्यक्ति होता है।
यह ‘इन-हाउस ठेकेदारी’ सरकारी तंत्र के उस मूल सिद्धांत को ध्वस्त करती है, जिसमें पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है।

जांच की आड़ में ‘मैनेजमेंट’ फाइलों में दफन हुआ सच

इस पूरे प्रकरण में सबसे संदिग्ध पहलू है जांच का तरीका। एक तरफ गंभीर आरोप, दूसरी तरफ महज एक पत्र जारी कर खानापूर्ति। अधिष्ठान से संबंधित सूचना गलत भेजने का हवाला देकर मामले को तकनीकी गलती में बदल दिया गया। सवाल यह नहीं है कि जांच हुई या नहीं बल्कि यह है कि जांच को किस स्तर पर रोका गया। क्या विभागीय सतर्कता को शामिल किया गया, बैंक खातों और लेन-देन की जांच हुई, फर्म के लाभार्थियों की पहचान की गई। अगर इन बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया, तो यह साफ तौर पर जांच के नाम पर मैनेजमेंट का मामला बनता है।

तबादला उद्योग पोस्टिंग बनी ‘प्रॉफिट सेंटर’

सरकारी सेवा में तबादला एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, लेकिन यहां यह एक ‘इंडस्ट्री’ का रूप ले चुका है। रमाशंकर पाल का केस इसका जीता-जागता उदाहरण है। जुलाई 2025 में मिर्जापुर तबादला, एक माह बाद सोनभद्र फिर एक माह बाद वापसी मिर्जापुर। यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘पोस्टिंग मैनेजमेंट’ का संकेत है।
सूत्र बताते हैं कि इन जिलों में बड़े स्तर पर विद्युत परियोजनाएं, मरम्मत कार्य, ट्रांसफॉर्मर आपूर्ति और लाइन विस्तार जैसे काम होते हैं, जिनमें करोड़ों का बजट शामिल रहता है। ऐसे में पोस्टिंग खुद में ‘कमाई का केंद्र’ बन जाती है।

‘सारथी’ सिस्टम बिना पद के सत्ता का संचालन

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रहस्यमयी और चिंताजनक पहलू है ‘सारथी’ की भूमिका। सूत्रों के मुताबिक, विभाग में एक ऐसा व्यक्ति सक्रिय है जो आधिकारिक पद पर नहीं है, लेकिन उसकी पहुंच और प्रभाव इतना मजबूत है कि वह तबादलों से लेकर ठेकों तक को प्रभावित करता है। यह एक समानांतर सत्ता संरचना की ओर इशारा करता है। जहां फैसले फाइलों में नहीं, बल्कि ‘नेटवर्क’ में होते हैं। अगर यह सच है, तो यह प्रशासनिक ढांचे के लिए बेहद खतरनाक संकेत है, क्योंकि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को खत्म कर देता है।

‘बाहुबली’ संस्कृति डर और दबाव में चलता विभाग

पूर्वांचल विद्युत निगम के अंदर ‘बाहुबली’ संस्कृति की चर्चा कोई नई नहीं है, लेकिन यह मामला उसे और मजबूत करता है। जब एक अधिकारी पर गंभीर आरोप हों और फिर भी वह लगातार अपनी पसंद की पोस्टिंग हासिल करता रहे, तो यह संदेश साफ होता है कि सिस्टम में नियम नहीं, रसूख चलता है। ऐसे माहौल में ईमानदार अधिकारी हाशिए पर चले जाते हैं और भ्रष्टाचार को खुली छूट मिल जाती है।

स्वास्थ्य कारण सुविधा का नया हथियार

रमाशंकर पाल के एक तबादले में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मेडिकल बोर्ड ने इसकी पुष्टि की, बीमारी इतनी गंभीर थी कि तत्काल तबादला जरूरी हो गया और अगर थी, तो फिर इतनी जल्दी दोबारा तबादला कैसे संभव हुआ।
अगर स्वास्थ्य कारणों का इस्तेमाल सिर्फ सुविधा के लिए किया गया, तो यह न केवल नियमों का दुरुपयोग है, बल्कि उन कर्मचारियों के साथ अन्याय भी है, जिन्हें वास्तव में चिकित्सा आधार पर राहत की जरूरत होती है। इतने गंभीर आरोपों और संदिग्ध घटनाक्रम के बावजूद न तो विभागीय स्तर पर कोई सख्त कार्रवाई दिखी, न ही राजनीतिक स्तर पर कोई प्रतिक्रिया।
यह चुप्पी कई संभावनाओं को जन्म देती है। क्या मामला दबा दिया गया, क्या उच्च स्तर पर संरक्षण मिला हुआ है या फिर सिस्टम इतना जटिल हो चुका है कि कार्रवाई संभव ही नहीं है।

बड़ा सवाल क्या यह है ‘टिप ऑफ द आइसबर्ग’

सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल यही है क्या यह सिर्फ एक मामला है, या फिर पूरे सिस्टम का एक छोटा सा हिस्सा। अगर एक अधिकारी इस तरह 10 महीनों में 3 बार तबादला करवा सकता है, तो कितने और अधिकारी इसी नेटवर्क का हिस्सा हैं। कितने ठेके इसी मॉडल पर दिए जा रहे हैं और कितना सार्वजनिक धन इस ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’ में बह रहा है। यह मामला एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है, जहां भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका है। विद्युत विभाग सीधे तौर पर आम जनता से जुड़ा होता है। बिजली आपूर्ति, बिलिंग, कनेक्शन हर स्तर पर आम नागरिक इसका उपभोक्ता है। जब ऐसे विभाग में इस तरह के आरोप सामने आते हैं, तो इसका असर सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी होता है। अब सवाल सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। क्या विभाग खुद निष्पक्ष जांच कर सकता है, राज्य सरकार इस पर संज्ञान लेगी या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाएगी। अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, तो यह मान लेना चाहिए कि सिस्टम ने खुद को जवाबदेही से मुक्त कर लिया है। तबादले अब सजा नहीं, सौदे बन चुके हैं। जांच अब सच्चाई नहीं, औपचारिकता बन चुकी है। और प्रशासन अब सेवा नहीं, नेटवर्क का खेल बन चुका है। अगर इस पर अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह मान लेना चाहिए कि पूर्वांचल में ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’ कोई आरोप नहीं, बल्कि सरकारी संरचना का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।

* रमाशंकर पाल पर पत्नी के नाम फर्म बनाकर ठेके लेने का आरोप
* जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिक कार्रवाई
* 10 महीने में 3 संदिग्ध तबादले
* मिर्जापुर और सोनभद्र जैसी ‘कमाई वाली पोस्टिंग’ पर पकड़
* विभाग में ‘सारथी’ के जरिए अनौपचारिक सत्ता संचालन के आरोप
* स्वास्थ्य कारणों का बार-बार इस्तेमाल
* राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चुप्पी
* भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावों पर बड़ा सवाल

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