मोदी-शाह संसद से क्यो रहे फरार,क्या विपक्ष के सवाल से भाग रही सरकार
मानसून सत्र में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की गैरमौजूदगी पर विपक्ष के तीखे सवाल

- महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा चाहता विपक्ष, सरकार पर जवाबदेही से बचने का आरोप
- छात्र-युवा प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में घमासान
- राहुल गांधी का सवाल प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई का आदेश किसने दिया
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने पुलिसिया सख्ती पर बहस को और धार दी
- बिना व्यापक बहस विधेयक पारित कराने को लेकर संसदीय परंपराओं पर सवाल
- ऑपरेशन सिंदूर, एथेनॉल, कानून-व्यवस्था, बाढ़ और राममंदिर चढ़ावे जैसे मुद्दों पर विपक्ष हमलावर
- सवाल यह नहीं कि कौन संसद में है, सवाल यह कि सरकार जनता के सवालों का सामना क्यों नहीं कर रही
नयी दिल्ली। संसद देश की वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है, जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, नीतियों पर बहस होती है और जनता की ओर से चुने गये प्रतिनिधि सत्ता से जवाब मांगते हैं। इसलिए संसद के मानसून सत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की लगातार अनुपस्थिति को लेकर विपक्ष का सवाल केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि संसदीय जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न बन गया है। विपक्ष का कहना है कि जब देश के सामने गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे हों और सरकार के दो सबसे शक्तिशाली चेहरे सदनों में मौजूद न हों, तो संसद में सार्थक बहस का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। विपक्ष विशेष रूप से उन मुद्दों पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से जवाब चाहता है, जिनका सीधा संबंध सरकार की नीतियों, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से है। छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई, परीक्षा संबंधी विवाद, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था, ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े सवाल, देश के विभिन्न हिस्सों में कानून-व्यवस्था की स्थिति, असम की बाढ़ तथा अन्य जनहित के मुद्दे संसद में चर्चा के केंद्र में हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार उन विषयों पर बहस से बच रही है, जिन पर उसे सीधे जवाब देना पड़ सकता है। संसद में गतिरोध कोई नया नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव भारतीय संसदीय राजनीति का हिस्सा रहा है। लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब हंगामे के बीच विधायी कामकाज आगे बढ़ता रहे और विपक्ष जिन विषयों पर चर्चा की मांग कर रहा हो, उन पर पर्याप्त बहस न हो। विपक्ष इसी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ विरोधाभास बता रहा है। प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर विपक्ष का राजनीतिक हमला इसलिए भी तीखा है क्योंकि उसका आरोप है कि जब राहुल गांधी या विपक्ष के अन्य प्रमुख नेता सदन में सरकार से सीधे सवाल पूछते हैं, तब प्रधानमंत्री अक्सर सदन में मौजूद नहीं रहते। गृह मंत्री अमित शाह को लेकर भी विपक्ष ने अब यही सवाल उठाया है कि यदि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों में गृह मंत्रालय की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं तो गृह मंत्री सदन में आकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करते। हालांकि सरकार की ओर से संसद में अनुपस्थिति के अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक कारण हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। यदि जनता को यह संदेश जाने लगे कि सरकार कठिन सवालों से बच रही है, तो यह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई का मामला अब न्यायपालिका तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने भी इस बहस को नया आयाम दिया है। अदालत ने हिंसक प्रतिक्रिया को समाधान नहीं बताते हुए संवाद और लोगों की बात सुनने को महत्वपूर्ण बताया। इससे विपक्ष को सरकार पर और अधिक दबाव बनाने का अवसर मिला है।

संसद में सवाल, सरकार की खामोशी
मानसून सत्र में विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यही है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। विपक्ष की मांग है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सदन में उपस्थित रहें और उन सवालों का जवाब दें जिनका संबंध सीधे सरकार की नीतियों तथा प्रशासनिक फैसलों से है। संसदीय लोकतंत्र में सरकार का बहुमत उसे कानून बनाने की शक्ति देता है, लेकिन विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सत्ता पक्ष यदि हर विरोध को हंगामा बताकर खारिज कर दे और विपक्ष हर सरकारी कार्रवाई को लोकतंत्र विरोधी कहे, तो दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक घेरे में बंद हो जाते हैं। वास्तविक लोकतंत्र वहां दिखाई देता है जहां असहमति के बीच भी संवाद होता है। विपक्ष का कहना है कि सदन में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौजूदगी इस संवाद को अधिक प्रभावी बना सकती है। विशेषकर गृह मंत्रालय से जुड़े किसी मुद्दे पर गृह मंत्री का उत्तर राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण होता है और प्रशासनिक रूप से भी।
छात्रों के प्रदर्शन ने बढ़ाया दबाव
छात्रों और युवाओं से जुड़े प्रदर्शन का मुद्दा इस समय विपक्ष के सबसे बड़े हथियारों में है। परीक्षा व्यवस्था, कथित अनियमितताओं और युवाओं की शिकायतों को लेकर लंबे समय तक चले विरोध के बाद संसद तक इसका असर पहुंचा। विपक्ष का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर बढ़ने के दौरान पुलिस ने अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया। कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने और गिरफ्तारी के आरोपों ने मामले को और गंभीर बनाया। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को संसद के बाहर भी उठाया और सरकार से पूछा कि प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई का आदेश किस स्तर से दिया गया था। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पुलिस कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी थी। यदि गृह मंत्रालय या दिल्ली पुलिस के अधिकार क्षेत्र से जुड़े किसी निर्णय पर सवाल हैं तो गृह मंत्री की ओर से स्पष्ट जवाब अपेक्षित है। विपक्ष इसी जवाब की मांग कर रहा है। हालांकि प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई से संबंधित आरोपों और उनकी परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि तथा न्यायिक जांच अलग विषय है। लेकिन संसद में इन आरोपों पर सरकार का पक्ष सामने आना लोकतांत्रिक रूप से आवश्यक है।
राहुल गांधी का सीधा हमला
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस मुद्दे पर सरकार को लगातार घेर रहे हैं। उनका तर्क है कि गृह मंत्री को यह बताना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई किसके निर्देश पर हुई। उनका राजनीतिक हमला दोधारी है। यदि गृह मंत्री को कार्रवाई की जानकारी थी तो जवाबदेही तय होनी चाहिए और यदि उन्हें जानकारी नहीं थी तो प्रशासनिक नियंत्रण पर सवाल उठेंगे। राजनीति में ऐसे सवालों का जवाब नारों से नहीं, तथ्यों से दिया जाना चाहिए। यही कारण है कि विपक्ष प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों की संसद में मौजूदगी चाहता है। सत्ता पक्ष के पास यदि कार्रवाई को सही ठहराने के तथ्य हैं तो संसद से बेहतर मंच कोई नहीं। वहां सरकार आधिकारिक रूप से अपना पक्ष रख सकती है, दस्तावेज सामने रख सकती है और विपक्ष के आरोपों का जवाब दे सकती है। लेकिन यदि बहस ही नहीं होगी तो आरोप अपनी जगह बने रहेंगे और संदेह और मजबूत होगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से बहस तेज
प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़ा मामला न्यायपालिका तक पहुंचने के बाद राजनीतिक बहस को संवैधानिक और कानूनी आयाम भी मिल गया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान हिंसक प्रतिक्रिया को समाधान न बताते हुए संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत की टिप्पणियों में यह संदेश था कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की बात सुनी जानी चाहिए और राज्य की शक्ति का इस्तेमाल अत्यधिक आक्रामक तरीके से नहीं होना चाहिए। यह टिप्पणी विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि अदालत की टिप्पणियों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इससे यह बहस जरूर तेज हुई है।
सवालों की फेहरिस्त लंबी
विपक्ष का कहना है कि संसद के सामने केवल छात्र आंदोलन का मुद्दा नहीं है। अयोध्या में राममंदिर से जुड़े चढ़ावे और कथित चोरी के आरोपों से लेकर एथेनॉल मिश्रित ईंधन, कानून-व्यवस्था, असम की बाढ़ और रोजगार तक अनेक विषय हैं जिन पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। जनता के लिए सवाल बहुत सीधे हैं।
महंगाई कितनी है, रोजगार की स्थिति क्या है, युवाओं की परीक्षा व्यवस्था कब सुधरेगी, बाढ़ से प्रभावित राज्यों के लिए क्या ठोस राहत है, कानून-व्यवस्था पर सरकार की जवाबदेही क्या है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अभियानों पर आधिकारिक जानकारी क्या है। इन सवालों का जवाब संसद में होना चाहिए।
मोदी-शाह की अनुपस्थिति पर विपक्ष का निशाना
प्रधानमंत्री की संसद में उपस्थिति को लेकर विपक्ष पहले भी सवाल उठाता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि कई महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रधानमंत्री संसद के बजाय विदेश यात्राओं, चुनावी कार्यक्रमों या अन्य राजनीतिक गतिविधियों में दिखाई दिए। यह आरोप लगाया गया कि कि जब राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता सदन में सक्रिय होते हैं, तब प्रधानमंत्री की मौजूदगी कम दिखाई देती है।
इन आरोपों को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके देखना कठिन है। प्रधानमंत्री का हर दिन संसद में उपस्थित रहना व्यावहारिक रूप से आवश्यक नहीं है। लेकिन जब विपक्ष किसी ऐसे मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री से जवाब मांग रहा हो जो राष्ट्रीय महत्व का हो, तब उनकी उपस्थिति राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हो जाती है। गृह मंत्री की स्थिति और भी अलग है। गृह मंत्रालय कानून-व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा और अनेक संवेदनशील विषयों से जुड़ा है। इसलिए यदि किसी पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष सीधे गृह मंत्री की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है तो गृह मंत्री का संसद में जवाब देना राजनीतिक रूप से सरकार के लिए बेहतर हो सकता है।
सरकार को बहस से डर क्यों
विपक्ष का सबसे तीखा सवाल यही है कि यदि सरकार के पास हर आरोप का जवाब है तो वह सदन में बहस से क्यों बच रही है। यह सवाल सत्ता पक्ष को असहज कर सकता है, लेकिन लोकतंत्र में इसका उत्तर देना जरूरी है। सरकार के पास बहुमत है। वह विपक्ष के प्रस्तावों को खारिज कर सकती है। वह अपने आंकड़े रख सकती है। वह विपक्ष के आरोपों को गलत साबित कर सकती है।
लेकिन यह सब तभी होगा जब सदन में बहस होगी।
संसद में विपक्ष का काम सरकार को गिराना नहीं, सरकार से सवाल पूछना भी है। इसी तरह सरकार का काम केवल कानून बनाना नहीं, अपने निर्णयों का औचित्य समझाना भी है। यदि विपक्ष सवाल पूछता है और सरकार जवाब देती है, तो लोकतंत्र मजबूत होता है।
‘चाणक्य’ की राजनीति की असली परीक्षा
अमित शाह को अक्सर भाजपा का रणनीतिकार और ‘चाणक्य’ कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक शैली को भी निर्णायक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन किसी भी नेतृत्व की असली परीक्षा आसान परिस्थितियों में नहीं होती।
असली परीक्षा तब होती है जब विपक्ष सवालों की बौछार कर रहा हो, सरकार पर आरोप लग रहे हों और जनता जवाब चाहती हो। यदि नेतृत्व मजबूत है तो उसे सवालों से भागने की जरूरत नहीं। संसद में आना चाहिए और विपक्ष को सुनना व आरोपों का जवाब देना चाहिए और यदि विपक्ष गलत है तो उसे तथ्यों के साथ गलत साबित करना चाहिए।




