ब्रिक्स की मेज पर बदली दुनिया की चाल,मोदी के लिये बनी जी का जंजाल

- महाशक्तियों के दबाव के बीच ग्लोबल साउथ का बड़ा संदेश
- युद्ध, टैरिफ और ऊर्जा संकट के बीच नई दिल्ली में जुटी दुनिया की बड़ी ताकतें
- ब्रिक से ब्रिक्स तक का सफर, 11 देशों के मंच ने बढ़ाया वैश्विक दायरा
- मोदी-शी की मुलाकात से रूस-ईरान तक, भारत की कूटनीति की फिर परीक्षा
- पहलगाम का जिक्र, पाकिस्तान गायब आतंकवाद पर सख्त शब्दों के बीच कूटनीतिक संतुलन
- टैरिफ पर निशाना बिना नाम के, गाजा और पश्चिम एशिया पर भी संयम की भाषा
- बहुध्रुवीय दुनिया का दावा बड़ा, अब घोषणापत्र को जमीन पर उतारना असली चुनौती

दुनिया इस समय युद्ध, ऊर्जा असुरक्षा, व्यापारिक तनाव, आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने ऊर्जा और समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है, जबकि व्यापार में टैरिफ और दूसरे प्रतिबंधात्मक उपायों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई अनिश्चितताएं खड़ी की हैं। इसी पृष्ठभूमि में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं रहा, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की दिशा पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच बना। आधिकारिक घोषणापत्र में ब्रिक्स नेताओं ने बहुध्रुवीयता, बहुपक्षवाद, वैश्विक दक्षिण की अधिक भागीदारी और संयुक्त राष्ट्र तथा वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत दोहराई। 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास थी। अब इस समूह में 11 पूर्ण सदस्य ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात हैं। इन देशों की संयुक्त आबादी दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत और वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत बताई गई है। नई दिल्ली घोषणापत्र के 140 बिंदुओं में आतंकवाद, व्यापार, ऊर्जा, गाजा, पश्चिम एशिया, वैश्विक शासन, वित्तीय संस्थाओं के सुधार और ग्लोबल साउथ की भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं। घोषणापत्र ने 22 अप्रैल 2025 के जम्मू-कश्मीर आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए 26 लोगों की मौत का उल्लेख किया, लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। यही वह जगह है जहां सम्मेलन की कूटनीति और राजनीतिक संदेश दोनों को एक साथ पढ़ना जरूरी हो जाता है।

युद्ध और आर्थिक उथल-पुथल के बीच ब्रिक्स की बड़ी परीक्षा
आज दुनिया की सबसे बड़ी चिंता केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है। किसी एक क्षेत्र में संघर्ष शुरू होता है तो उसका असर तेल, गैस, समुद्री परिवहन, बीमा, खाद्य आपूर्ति, व्यापार और महंगाई तक पहुंचता है। पश्चिम एशिया में तनाव के बीच ब्रिक्स घोषणापत्र ने ऊर्जा और वैश्विक व्यापार के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने पर जोर दिया है। नेताओं ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद, कूटनीति और मध्यस्थता को प्राथमिकता देने की बात कही। यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स का विस्तार अब उसे केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक मंच तक सीमित नहीं रखता। ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का एक ही मंच पर होना पश्चिम एशिया की जटिल शक्ति-संरचना को भी इस समूह के भीतर ले आता है। इसके बावजूद घोषणापत्र में पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव पर अधिकतम संयम, नागरिकों और नागरिक ढांचे की सुरक्षा तथा संवाद-कूटनीति के जरिए दीर्घकालिक समाधान की अपील की गई। ऊर्जा के मोर्चे पर भी ब्रिक्स ने बाजार की स्थिरता, विविध स्रोतों से ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति और महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा को आवश्यक बताया है। इसका सीधा संबंध उन देशों से है जिनकी अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात और वैश्विक समुद्री आपूर्ति पर निर्भर है।
चार देशों के ब्रिक से 11 देशों के ब्रिक्स तक
ब्रिक्स की कहानी भी बदलती विश्व व्यवस्था की कहानी है। 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ इसका प्रारंभ हुआ। दक्षिण अफ्रीका के 2011 में जुड़ने के बाद इसका नाम ब्रिक्स हुआ। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया के जुड़ने से इसका दायरा 11 पूर्ण सदस्यों तक पहुंचा।
2026 का सम्मेलन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण था कि यह ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर हुआ। नई दिल्ली घोषणापत्र ने वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने, विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़ाने तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग दोहराई। भारत ने सम्मेलन में ब्रिक्स को विकास और समाधान केंद्रित मंच के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। चार सौ से अधिक बैठकें और कार्यक्रम भारत के 30 शहरों में आयोजित होने का उल्लेख घोषणापत्र में किया गया है। इसका अर्थ यह है कि ब्रिक्स अब केवल सालाना नेताओं की बैठक नहीं रह गया है, बल्कि व्यापार, स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक, कृषि, ऊर्जा और वित्त सहित कई क्षेत्रों में काम करने वाला विस्तृत सहयोग तंत्र बन चुका है। सम्मेलन में पूर्ण सदस्य देशों के अलावा पार्टनर और आमंत्रित देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। यूएई की ओर से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी रही। इसके अलावा मलेशिया, बेलारूस, क्यूबा, कजाकिस्तान, वियतनाम, बहरीन, बुरुंडी, नाइजीरिया, युगांडा, उरुग्वे और अन्य आमंत्रित प्रतिनिधिमंडलों की भागीदारी हुई।
मोदी-शी मुलाकात और भारत-चीन रिश्तों की नई कूटनीतिक खिड़की
सम्मेलन का एक बड़ा राजनीतिक पक्ष भारत-चीन संबंध रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 12 सितंबर को नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक की। भारतीय पक्ष के अनुसार दोनों नेताओं ने संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टि से देखने, सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने तथा मौजूदा समझौतों और व्यवस्थाओं का पालन करने पर जोर दिया। दोनों पक्षों ने सीमा विवाद के उचित, तर्कसंगत और परस्पर स्वीकार्य समाधान की दिशा में काम जारी रखने की बात भी कही। यह मुलाकात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गलवान के बाद भारत-चीन संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हुआ था। अब दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ाने की प्रक्रिया दिखाई दे रही है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि सीमा विवाद समाप्त हो गया या दोनों देशों के मतभेद खत्म हो गए। स्वयं भारतीय पक्ष ने सीमा क्षेत्रों में शांति और मौजूदा समझौतों के पालन को द्विपक्षीय संबंधों के विकास की बुनियादी शर्त बताया है। यही भारत की कूटनीतिक चुनौती भी है एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक एवं आर्थिक रिश्ते, दूसरी तरफ रूस के साथ पुरानी रणनीतिक साझेदारी, ईरान के साथ क्षेत्रीय और आर्थिक हित तथा चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद दोनों। ब्रिक्स का मंच इन सभी रिश्तों को एक साथ संभालने की भारतीय क्षमता की परीक्षा भी बन गया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने भारत-रूस संबंधों को भी प्रमुखता दी। सम्मेलन से पहले और उसके दौरान मोदी-पुतिन मुलाकात में ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मौजूदगी भी पश्चिम एशिया की पृष्ठभूमि में खास रही। भारत पहले ही ईरान के साथ संवाद और कूटनीति के जरिए क्षेत्रीय तनाव कम करने की जरूरत दोहरा चुका है।
पहलगाम पर कड़ी निंदा, मगर पाकिस्तान का नाम नहीं
नई दिल्ली घोषणापत्र का सबसे संवेदनशील हिस्सा आतंकवाद से संबंधित रहा। घोषणापत्र के बिंदु 40 में 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की गई और कहा गया कि इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई तथा कई लोग घायल हुए। इसके साथ ही आतंकवाद के सभी रूपों, सीमा पार आतंकवाद, आतंकवादी वित्तपोषण और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने के खिलाफ प्रतिबद्धता दोहराई गई। लेकिन घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं है। यह तथ्य आधिकारिक दस्तावेज की प्रति में स्पष्ट है कि उसमें ‘पाकिस्तान’ और ‘पहलगाम’ शब्द भी नहीं मिलते, जबकि हमले की तारीख और मृतकों की संख्या का उल्लेख किया गया है।
यहीं कूटनीति की वह भाषा सामने आती है जिसमें घटना की निंदा की जाती है, आतंकवाद के नेटवर्क और वित्तपोषण के खिलाफ प्रतिबद्धता व्यक्त की जाती है, लेकिन किसी देश को सीधे नामित नहीं किया जाता। भारत ने अलग-अलग द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाया है। लेकिन ब्रिक्स जैसे सर्वसम्मति आधारित मंच पर 11 देशों के बीच साझा भाषा तैयार करना अलग प्रकार की कूटनीतिक चुनौती है। इसलिए यह कहना कि पाकिस्तान का नाम न लेने के पीछे किसी एक नेता या देश का दबाव ही था, उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों से सिद्ध नहीं होता।
घोषणापत्र का असली संदेश बहुध्रुवीयता का दावा और बड़ी चुनौती
नई दिल्ली घोषणापत्र में ‘बहुध्रुवीयता’ और वैश्विक दक्षिण की अधिक प्रभावी भागीदारी पर साफ जोर दिया गया है। ब्रिक्स नेताओं ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और न्यायसंगत बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज बढ़ाने की मांग भी दोहराई गई। यही ब्रिक्स का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश दिखाई देता है। समूह खुद को किसी एक देश के नेतृत्व वाला सैन्य या राजनीतिक गठबंधन घोषित नहीं करता। इसकी निर्णय प्रक्रिया सर्वसम्मति पर आधारित है और सदस्य देशों के बीच कई गंभीर मतभेद भी हैं। फिर भी यही मंच उन देशों को एक साथ बैठाता है जिनकी विदेश नीतियां कई मुद्दों पर एक-दूसरे से काफी अलग हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि इस मंच को केवल कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय इसे ठोस आर्थिक और रणनीतिक परिणामों में कैसे बदला जाए। व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान, वित्तीय सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर घोषणापत्र में अनेक प्रस्ताव हैं। लेकिन घोषणाओं की वास्तविक परीक्षा उनके क्रियान्वयन से होगी। ब्रिक्स ने दुनिया को यह संदेश जरूर दिया है कि वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
* 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास रही।
ब्रिक्स में 11 पूर्ण सदस्य हैं और वे संयुक्त रूप से विश्व की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* नई दिल्ली घोषणापत्र में कुल 140 बिंदु हैं। 22 अप्रैल 2025 के जम्मू-कश्मीर आतंकी हमले की निंदा और 26 मौतों का उल्लेख किया गया, लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया।
* आतंकवाद के साथ सीमा पार आतंकवाद, आतंकवादी वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई।
* एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर चिंता जताते हुए वीटो आधारित व्यापार व्यवस्था मजबूत करने की बात कही गई।
* पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम, संवाद और कूटनीति का आह्वान किया गया।
* गाजा में युद्धविराम, निर्बाध मानवीय सहायता और फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन के विरोध की बात घोषणापत्र में है।
* भारत-चीन संबंधों में सीमा पर शांति, संवाद और मौजूदा समझौतों के पालन पर मोदी-शी वार्ता में जोर रहा।
* भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर मोदी-पुतिन वार्ता में जोर दिया गया।




